भीख आ दान के फरक
- टीम अंजोरिया

भीख आ दान के फरक

(बतकुच्चन -234)

आदमी आपन इच्छा पूरा करे खातिर कवनो वस्तु, धन भा पद हासिल करे के कई तरह के जुगत कर सकेला। सबले नीमन तरीका इहे होला कि ऊ अपना श्रम, ज्ञान, योग्यता भा संसाधन का बल पर ओकरा के अर्जित करे। अपना सामर्थ्य से पावल उपलब्धि आदमी के खाली सुखे ना देवे, ओकर आत्मसम्मानो बढ़ावेले।

बाकिर कई बेर अइसनो होला कि आदमी लगे ना पर्याप्त सामर्थ्य रहेला, ना संसाधन। अइसन हालात में ऊ दोसरा तरीका से आपन आवश्यकता पूरा करे के कोशिश करेला। एह तरीका में छल-साजिश कर के छीन लिहल, याचना कर के पावल आ चुपचाप एह आसरा में बइठल कि केहू दया कर के कुछ दे दी—सब शामिल कइल जा सकेला।

एह तीनों में साजिश कर के हासिल करे के कोशिश निस्संदेह सबले निकृष्ट होला। साजिश में आदमी ना खाली अपना योग्यता के कमी छिपावेला, बलुक दोसरा के अधिकारो पर चोट पहुँचावेला। याचना में कम से कम अतना साफ रहेला कि माँगे वाला आपन आवश्यकता जाहिर कर रहल बा। ऊ अपना स्वाभिमान के कुछ हिस्सा दाँव पर लगा के सही, बाकिर आपन जरूरत पूरा करे खातिर कवनो प्रयास त करत बा।

सामर्थ्यहीन मनई कई बेर आपन संकोच आ स्वाभिमान छोड़ के याचक बन जाला। ऊ हाथ पसारेला, आपन अभाव बतावेला आ याचना से मिलल वस्तु भा धन के उपभोग करेला। आम भाषा में एकरे के भीख माँगल कहल जाला।

एही जगहा आज के बतकुच्चन के मथैला सामने आ जाला—भीख माँगल अधिक खराब बा कि एह इन्तजार में बइठल रहल कि केहू अपने से कुछ दान दे जाव?

देखे में भीख आ दान एके सिक्का के दू पहलू लाग सकेला। दुनु में एगो देवे वाला होला आ एगो लेवे वाला। बाकिर दुनु के बीच एगो बारीक अन्तर बा। भीख माँगे वाला अपना आवश्यकता के पूर्ति खातिर याचना करेला। ओकरा जवन मिलेला, ओकरा में ओकर याचना आ प्रयासो के भूमिका होला। एह अर्थ में कहल जा सकेला कि ऊ भीख के उपार्जित कइलस। ओकर उपार्जन सम्मानजनक भले ना होखे, बाकिर ओहमें ओकर एगो सक्रिय भूमिका जरूर बा।

दान में मिले वाला वस्तु भा पद के कहानी कुछ अलग होला। एहिजा पावे वाला के इच्छा से बेसी महत्त्व देवे वाला के इच्छा के होला। दाता के मन भइल त दिहलस, जतना मन भइल ओतना दिहलस आ जेकरा के मन भइल ओकरा के दिहलस। पावे वाला के भूमिका महज स्वीकार करे भर के रह जाले। एहसे दान में मिलल वस्तु के प्राप्ति त कहल जा सकेला, उपार्जन ना।

दान अपने में खराब काम नइखे। भूखल के भोजन, रोगी के दवाई, विद्यार्थी के पढ़ाई भा विपत्ति में पड़ल आदमी के सहायता खातिर दान देवे वाला आदर के अधिकारी होला। बाकिर दाता के उदारता आ प्राप्तकर्ता के उपलब्धि एके बात नइखे। दान देवे वाला पुण्य कमा सकेला, बाकिर दान पावे वाला ओकरा के आपन कमाई ना कह सके। एह अन्तर के बुझल जरूरी बा।

अब एह बात के तनी अउर बढ़िया से समझे खातिर चलीं राजनीति के अखाड़ा में उतर के देखल जाव।

मान लीं कि कवनो छोट भा बड़ दल के अध्यक्ष पद खाली बा। एह पद के पावे के एगो तरीका बा कि आदमी संगठन में काम करे, कार्यकर्तन के भरोसा जीते, चुनाव लड़े आ बहुमत हासिल कर के अध्यक्ष बने। एह तरीका से पद पावे वाला कह सकेला कि ऊ पद अर्जित कइले बा। ओकरा पीछे ओकर मेहनत, जनसम्पर्क, संगठन-कौशल आ समर्थकन के विश्वास बा।

दूसरका तरीका बा कि ऊ पद खातिर खुल के दावेदारी करे। नेता लोग से मिले, समर्थन माँगे, कार्यकर्तन के मनावे आ कहे कि ओकरा के मौका मिलल चाहीं। एहमें याचना के अंश जरूर बा, बाकिर दावेदारी करे वाला आपन बात त सामने रखत बा। ओकरा में अतना साहस त बा कि ऊ कह सके—हम एह पद के योग्य बानी आ हमरा के ई जिम्मेदारी दीहल जाव।

तिसरका तरीका बा चुपचाप आलाकमान का नजर में चढ़ल आ ओकर आशीर्वाद से पद पा लिहल। ना चुनाव, ना दावेदारी, ना कार्यकर्तन के विश्वास हासिल करे के जरूरत। आलाकमान के कृपा भइल आ पद दान में मिल गइल।

हमरा विचार से राजनीतिक पद पावे के ई तरीका सबले निकृष्ट होला। अइसन अध्यक्ष संगठन के प्रतिनिधि कम, आलाकमान के नियुक्त माध्यम बेसी होला। ओकर पद के आधार कार्यकर्तन के भरोसा ना, ऊपर से मिलल कृपा होला। एहसे ओकरा में ई साहस पैदा होखल कठिन बा कि ऊ आलाकमान के मर्जी का खिलाफ कवनो फैसला कर सको।

चुनाव लड़ के पद पावे वाला अपना समर्थकन का प्रति जवाबदेह होला। माँग के भा दावेदारी जता के पद पावे वाला कम से कम अपना योग्यता के हवाला दे सकेला। ई दुनु कुछ हद ले स्वतंत्र फैसला कर सकेलें—हर बात में ना त कुछ बात में जरूर। बाकिर दान में पद पावे वाला अध्यक्ष के नजर हमेशा ऊपर टिकल रहेला। ऊ हर कदम से पहिले आलाकमान के मुँह ताकत रही कि अब का करे के बा, का कहे के बा आ कतना कहे के बा।

दान में मिलल कुरसी पर बइठल आदमी के सबले बड़ कमजोरी इहे होला कि ऊ कुरसी के आपन अधिकार ना मान सके। जे दिहले बा, ऊ वापस ले सकेला—ई डर ओकरा मन में हमेशा बनल रहेला। एहसे ऊ संगठन, कार्यकर्ता भा जनता का प्रति कम आ अपना दाता का प्रति बेसी वफादार रहेला।

भीख माँग के पावे वाला कम से कम ई कह सकेला कि ऊ मँगले रहल। दान में पावे वाला ईहो दावा ना कर सके। ओकरा लगे प्राप्ति त बा, बाकिर उपार्जन के संतोष नइखे; पद त बा, बाकिर अधिकार के भरोसा नइखे; कुरसी त बा, बाकिर फैसला करे के आजादी नइखे।

एही से भीख आ दान के अन्तर खाली माँगला आ दे दिहला के अन्तर नइखे। असली अन्तर उपार्जन आ कृपा के बा। भीख में याचक के प्रयास जुड़ल रहेला, जबकि दान में प्राप्तकर्ता के निर्भरता। आ जब दान में कवनो वस्तु ना, सत्ता के पद मिले लागे, तब दान स्वीकार करे वाला आदमी पदाधिकारी भले बन जाव, स्वतंत्र नेता शायदे बन पावे।

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