समर्थक, प्रशंसक आ सहमत : तीन शब्दन के गोलमाल
(बतकुच्चन- 233)

राजनीति में जतना गोलमाल बा, ओकरा पीछे कुछ हाथ एह तीन गो शब्दन के गोलमालो के बा—समर्थक, प्रशंसक आ सहमत। आम तौर पर हमनी के एह तीनों के एके गठरी में बान्ह के राख देत बानी जा। केहू कवनो नेता के कवनो बात से सहमत हो गइल त ओकरा के समर्थक मान लीहल जाला। केहू ओकर कवनो गुण के प्रशंसा कर दिहलस त तुरते ओकरा माथे भक्त के टीका लगा दीहल जाला। आ केहू अपना समर्थित नेता के आलोचना कर दिहलस त कहल जाला कि ई कइसन समर्थक हवे!
जबकि तीनों शब्दन के अर्थ अलग-अलग बा।
मान लीं कि हम मोदी के समर्थक हईं। एकर मतलब ई हो सकेला कि देश चलावे खातिर मौजूद विकल्पन में हम मोदी के अधिक उपयोगी मानत बानी। उनुकर नीति, नेतृत्व भा राजनीतिक दिशा के समर्थन करत बानी। बाकिर एकर मतलब ई कतई नइखे कि हम उनुकर हर बात के प्रशंसक होखब, उनुकर हर फैसला से सहमत होखब आ उनुकर कवनो गलती हमरा लउकबे ना करी।
उलटे, समर्थक होखला का चलते हमार जिम्मेदारी अउर बढ़ जाला। जवना आदमी भा दल के हम समर्थन करत बानी, ओकर गलती देख के चुप रहब त ई समर्थन ना, चापलूसी हो जाई। समर्थक ऊ ना हवे जे हर बात पर ताली बजावे। साँच समर्थक ऊ हवे जे नीक काम पर साथ दे आ गलत काम पर सावधान करे।
अब प्रशंसक के लीं। कवनो आदमी के प्रशंसा ओकर कवनो एगो गुण खातिर कइल जा सकेला। राहुल गाँधी के कवनो बात, व्यवहार, मेहनत भा साहस के प्रशंसा करे वाला हर आदमी उनुकर समर्थक होखे, ई जरूरी नइखे। हो सकेला कि ऊ राहुल गाँधी के कवनो खास गुण से प्रभावित होखे, बाकिर उनुकर राजनीति से सहमत ना होखे। एहिजा प्रशंसा गुण के हो रहल बा, पूरा राजनीतिक व्यक्तित्व के समर्थन नइखे हो रहल।
हम कवनो खिलाड़ी के बढ़िया खेल के प्रशंसक हो सकत बानी, बाकिर ओकर टीम के समर्थक ना होखीं। कवनो अभिनेता के अभिनय पसन्द आ सकेला, बाकिर ओकर विचार से हमार घोर असहमति हो सकेले। कवनो विरोधी नेता बढ़िया भाषण दे दिहलस त ओकर भाषण के प्रशंसा कइल समर्थन में दल-बदल कइल ना हो जाला।
सहमत होखल त अउर सीमित बात हवे। सहमति आदमी से कम, ओकर कवनो खास बात भा विचार से अधिक होला। आज हम कवनो मुद्दा पर मोदी से सहमत हो सकत बानी आ काल्हु दोसरा मुद्दा पर असहमत। एही तरह राहुल गाँधी के कवनो बात सही लाग सकेले आ दोसरी गलत। एहमें कवनो विरोधाभास नइखे। विचारवान आदमी हर बात के अलग-अलग कसौटी पर परखेला। ऊ नाम देख के आपन राय तय ना करे।
समस्या तब शुरू होले जब राजनीति विचार के जगह पहचान बन जाले। तब लोग ई ना देखे कि बात का कहल गइल बा, पहिले ई देखे कि कहलस के। अपना नेता के मुँह से निकलल गलत बातो सही लागे लागेले आ विरोधी के कहल सही बातो गलत। एह माहौल में सहमति विवेक से ना, खेमा देख के तय होखे लागेले।
अंधभक्त कहाए वाला लोगनो के ध्यान से देखीं त जरूरी नइखे कि ऊ अपना नेता के हर बात से सचमुच सहमत होखे। कई बेर ऊ असहमत रहियो के विरोध ना कर पावे। ओकरा डर लागेला कि सवाल उठवला पर लोग ओकर निष्ठा पर सवाल उठा दी। धीरे-धीरे समर्थन के मतलब मौन स्वीकृति आ प्रशंसा के मतलब पूजा मान लीहल जाला।
एही से ई तीन गो बात साफ राखल जरूरी बा—
कवनो बात से सहमत होखल, ओकरा कहे वाला आदमी के समर्थक होखल नइखे।
कवनो गुण के प्रशंसा कइल, ओह आदमी के पूरा व्यक्तित्व आ राजनीति के समर्थन कइल नइखे।
आ कवनो आदमी भा दल के समर्थक होखल, ओकर हर काम के प्रशंसा कइल आ हर बात से सहमत होखल नइखे।
लोकतंत्र में समर्थक चाहीं, प्रशंसको हो सकेलें आ सहमति-असहमति त रहबे करी। बाकिर चापलूस से लोकतंत्र के कवनो भला ना होला। समर्थक सवाल पूछ सकेला, प्रशंसक आलोचना कर सकेला आ विरोधी कवनो सही बात से सहमत हो सकेला। एह सहज भेद के मान लीहल जाव त राजनीति के बहुते गोलमाल अपने सझुरा जाई।
बाकिर राजनीति के दुकानदारी चलावे वालन के एह सझुराव से फायदा कहाँ बा! उनुका त इहे चाहीं कि रउरा समर्थक हईं त आँख मून के प्रशंसा करीं, आ विरोधी हईं त आँख मून के निन्दा। बीच में विवेक खातिर जगह छोड़ दीहल गइल त भीड़ नागरिक बन जाई—आ नागरिक सवाल पूछे लागेला।


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