मुफ्तखोरी आ हरामखोरी : बतकुच्चन
सेतिहा के सेनूर, भर लिलार।

कहाउत पुरान ह, बाकिर आदमी के स्वभाव आजुओ उहे बा। आपन पइसा से सेनूर खरीदल होखे त माँग भरला में काम चल जाई। सेतिहा मिलत होखे त लिलारो काहे छोड़ल जाव!
मुफ्त के चीज में एगो अलग आकर्षण होला। जरूरत बा कि ना, ई सवाल बाद में उठेला; पहिला सवाल होला—मिलत बा कि ना?
कतहीं कलम मुफ्त बँटात बा—ले लीं। झोरा मिलत बा—ले लीं। खाना मिलत बा—खा लीं। एगो के जगह दू गो मिल सके त दू गो ले लीं। आखिर मुफ्ते त बा!
बाकिर एहिजा एगो सवाल उठेला—मुफ्तखोरी आ हरामखोरी एके चीज ह कि दुनू अलग-अलग? हमरा बुझाला कि दुनू में साफ फरक बा। मुफ्तखोरी में आदमी अइसन चीज पावेला जवना खातिर ओकरा अपना जेब से दाम ना देवे के पड़े, भा ओतना मेहनत ना करे के पड़े। बाकिर एहमें जरूरी नइखे कि ऊ कवनो कानून तोड़त होखे, केहू के हक मारत होखे भा गलत तरीका अपनावत होखे।
केहू रउरा के चाय पिआ दे आ रउरा पी लीं, कवनो अपराध नइखे। भोज में नेवता मिलल आ भर पेट खा लिहनी, कानून ना टूटल। कवनो संस्था मुफ्त में किताब बाँटत बिया आ रउरा किताब ले लिहनी—एहमें गलत का बा?
मुफ्तखोरी के सवाल कानून से कम, आदत आ मानसिकता से अधिक जुड़ल बा। जब आदमी के आदत पड़ जाव कि जहाँ बिना दाम के कुछ मिलत होखे, बटोर लीं—चाहे जरूरत होखे भा ना—त मुफ्तखोरी शुरू हो जाले।
हरामखोरी दोसरा किसिम के चीज ह। हरामखोरी में खाली बिना दाम भा बिना मेहनत के पावल सवाल नइखे। सवाल ई बा कि पावल कइसे गइल? चोरी से, घूस से, धोखा से, बेईमानी से, केहू के हक मार के, पद के गलत इस्तेमाल करके, फर्जीवाड़ा से भा कवनो अउर गलत तरीका से हासिल कइल धन भा सुविधा—ई हराम के कमाई ह। एहमें तरीका गलत होला; कई बेर गैरकानूनियो होला।
एही से दुनू के छोटहन भेद अइसन कहल जा सकेला—
मुफ्तखोर बिना दाम दिहले पावे के जुगत में रहेला; हरामखोर गलत तरीका से हासिल करे में संकोच ना करे।
मुफ्तखोरी खराब आदत हो सकेला, बाकिर हर मुफ्त चीज हराम के नइखे। हरामखोरी में चीज मुफ्त मिलल जरूरी नइखे; गलत तरीका से हासिल कइल जरूरी बा।
एगो आदमी सरकारी योजना के नियम के भीतर रह के मिलत सुविधा लेत बा। ओकरा से असहमति हो सकेला कि ओकरा ई सुविधा लेवे के चाहत रहे कि ना, बाकिर जबले ऊ झूठ बोल के, फर्जी कागज लगा के भा दोसरा के हक मार के सुविधा नइखे लेत, तबले ओकरा के हरामखोर कहल ठीक ना होई।
बाकिर जे आदमी सुविधा पावे के पात्र नइखे आ फर्जी कागज बना के ले लेत बा, मामला बदल गइल। चीज उहे बा। देवे वालो उहे बा। फरक खाली हासिल करे के तरीका में आ गइल। आ इहे फरक मुफ्तखोरी के हरामखोरी में बदल देला।
आ एगो बात अउर।
रीबी मुफ्तखोरी नइखे। मजबूरी हरामखोरी नइखे। बूढ़, बीमार, दिव्यांग, बेरोजगार भा संकट में पड़ल आदमी के सहायता दिहल समाज के जिम्मेदारी ह। सहायता पावे वाला के खाली एह आधार पर मुफ्तखोर कह दिहल कि ऊ अपना जेब से ओकर दाम नइखे दिहले, उचित ना होई।
आजु जे हाथ सहायता ले रहल बा, हो सकेला काल्हु ले उहे हाथ दोसरा के सहायता देत रहल होखे। एहसे मुफ्त मिलल आ मुफ्तखोरीओ में फरक राखे के पड़ी।
आ तब एगो तिसरका सवाल उठेला—मुफ्त आखिर मुफ्त होला कहाँ?
सरकार मुफ्त में कुछ देत बिया त ओकरा लगे रुपइया आसमान से नइखे बरिसत। जनता से आवेला। कवनो कम्पनी मुफ्त नमूना देत बिया त ओकर खरचा अपना कारोबार के हिसाब में जोड़ले रहेली। कवनो संस्था मुफ्त सेवा देत बिया त ओकर खर्चा कहीं ना कहीं से आवते बा।
मतलब साफ बा—
पावे वाला खातिर मुफ्त हो सकेला, बनावे भा देवे वाला खातिर ना। एहिजा फेर ऊ पुरान कहाउत याद आवेला—
सेतिहा के सेनूर, भर लिलार।
बाकिर सेतिहा देख के लिलार भरला से पहिले कबो-कबो ई पूछ लिहलो जरूरी बा कि सेनूर सेतिहा भइल कइसेकेहू खुशी से देत बा—लीं। कवनो व्यवस्था नियम से देत बिया—लीं। जरूरत में सहायता मिलत बा—लीं।
बाकिर अगर ओकरा खातिर झूठ बोले के पड़े, फर्जीवाड़ा करे के पड़े, केहू के हक मारे के पड़े भा कानून के आँख में धूरा झोंके के पड़े, त ऊ सेतिहा के सेनूर ना रह गइल। ऊ हराम के सेनूर हो गइल। आ हराम के सेनूर से लिलार भरला पर लिलार चमके चाहे ना चमके, दाग जरूर लाग सकेला।


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