तोरा कवरे के आस, मोरा बतिसो दुआर
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-56
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

तोरा कवरे के आस, मोरा बतिसो दुआर

पड़ोस में भोरहीं से करकरहटि भइल रहे। काकी नकिया गइल रही। तले लभेरन पहुँचले। अतने में काकी के नतियो गेङ सुनिके आ गइले सन आ काकी से बतावे लगलन स कि बहुरा मउसी चिचिया-चिचिया के कहत रहली हा कि ‘तोरा कवरे के आस, मोरा बतिसो दुआर।’
काकी के बड़का नतिया पुछलसि कि एकर माने का भइल मइया? काकी बतवली- ‘कवर’ भोजन का ग्रास के कहल जाला। माने तोहार उमेदि त खाली एकहीं कवर प टिकल बा बाकिर हमरा खातिर त बत्तीसो दुआर खुलल बा। लभेरन तनी अउर साफ करत कहले- “भोजपुरी का लोक प्रयोग में एह कहाउत के व्यंग अउर गम्हिराह हो जाला। एकर ईहो माने लगावल जाला कि तोहार गुजर-बसर त एक जगहा का कवरे का आसे बड़ुए, बाकिर हमरा सामने रोजी-रोटी के बहुत रास्ता खुलल बा।
छोटका नतिया के दिमाग बतिसो दुआर पर अँटकल रहे। ऊ पुछलसि- “बतिसो दुआर खातिर घर कतना बड़ होत होई, कतना लोग रहत होइहें ओहमें?” अतना पर बड़का नतिया हँसे लागल आ छोटका के मन मउरा गइल, तब लभेरन स्पष्ट कइले- एहिजा बत्तिस दुआर सहिए में बत्तिस गो दुआर ना हटे। एकर माने ढेर दुआर भा ढेर गो राहि भा ढेरन अवसर होला, अउरी स्पष्ट करीं त रोजगार भा सहायता मिले के संभावना होला। अब एह पूरा कहाउत के अर्थ हइसे समुझऽ- “तहरा एगहीं कवर के आस बा, बाकिर हमरा लगे त अन्न भा रोजगार के बहुते रास्ता खुलल बा।”
काकी पुछली- “ई कहाउत भोजपुरिए में बाटे कि संसकिरितो (संस्कृतो) में मिलेला?”
लभेरन कहले- ई त संस्कृत के बहुत पुरान सूक्ति हटे।
कवलोऽपि लभ्यते यत्र तत्र धावति कुक्कुरः।
मार्जारो हि गृहं त्यक्त्वा सर्वतो लभते सुखम्॥
ई श्लोक हितोपदेश आ पंचतंत्र का परंपरा में संस्कृत नीति-साहित्य में खूब प्रसिद्ध भइल। लोककथा में कुक्कुर आ बिलारि का सुभाव के दरसावे खातिर एकर प्रसंग आ श्लोक सुनावल जात रहे। लोक में जवन कहाउत नियन सूक्ति प्रसिद्ध भइल, ऊ रहे- ‘श्वानः ग्रासार्थं तिष्ठति, मार्जारस्य द्वात्रिंशत् द्वाराणि विवृतानि सन्ति।’ माने कुक्कुर एगो कवर खातिर दुआर अगोरले रहेला बाकिर बिलारि खातिर बत्तिस गो दुआरि खुलल रहेले।”
अब त दूनो नतिया कुक्कुर-बिलारि के कहानी सूने खातिर नधिया गइले सन। तब लभेरन नीति साहित्य के ऊ कहानी सुनावे शुरू कइले।
गाँव का एगो दलान में एगो कुक्कुर आ एगो बिलारि बइठल रहे। कुकुरा के दीठि हरदम मालिक का हाथ अउर थरिया पर टिकल रहत रहे। मालिक जइसहीं एगो सुक्खल रोटी के टुकड़ा फेंकिहें कि कुकुरा आपन पोंछि हिलावत, जमीन पर लोट-पोट होके ओकरा के लपकि ली। कबो-कबो त रोटी का फेरा में ओकरा गारी का सङे-सङे लाठियो-डंडा सहे के परत रहे, बाकिर तबो ऊ ओह दुआर के छोड़ के कहीं अउर जाए के ना सोचे। ई सभ देखि के बिलरिया मने-मन मुस्कात रही। ऊ त अपना मर्जी के मालिक रहे। कबो एह छत पर त कबो ओह मचान पर; कबो एह घर में दूध का हाँड़ी पर डीठि गड़वले, त कबो ओह परोसिया का रसोई में छान्ही पर ढूका लागल।
एक दिन कुकुरा बिलरिया से कहलसि- “ए मउसी, तू अतना दुआर-दुआर भटके वाली जिनिगी काहें जीयत बाड़ू? हमरे अइसन कवनो एगो मालिक के गोड़ पकड़ि ल। दिन-रात ओकरे दुआर पर पहरा देत रहिहऽ आ बिना चोरी-चाटी के आराम से रोटी खात रहिह। एह तरे कब ले डेराइ-डेराइ आ कूदि-फानि के टाइम कटबू?”
बिलरिया ओकरा के नीके निहरलसि आ गंभीर भाव से कहलसि- “ए कुक्कुर भाई! तोहरा आ हमरा में ईहे फरक बा। तोहरा मन में बस एगो कवर के आस बा। ओही एगो कवर खातिर तू आपन आन-बान, शान आ आजादी- सभ मालिक का गोड़ पर गिरवी ध देले बाड़। ऊ लात मारेला तबो पोंछि हिलावेलऽ, ऊ डाँटेला तबो ओही चउखट पर मूड़ी गड़ावेल। तोहरा त बस ओही एगो दुआर का कवर के असरा बा, बाकिर हमरा खातिर त बतीसो दुआर खुलल बा। एह घर में ढक्कन बंद मिली त अगिला घर में छींका लटकल बा। बाकिर हम पराधीन हो के जिए वाला जीव ना हईं। हमरा अपना बुद्धि आ पंजा पर भरोसा बा। जहवाँ आजादी नइखे, ओहिजा के अमिरितो हमरा खातिर बिखिए बरोबर बा।”
अब लभेरन समुझावे लगले- एह लोक कथा के मूल भाव ई हटे कि जे चाटुकार आ गुलाम मानसिकता के होला, ऊ छोटहन सहारा खातिर आपन स्वाभिमान बेच देला बाकिर जे स्वाभिमानी आ काबिल होला, ओकरा खातिर दुनिया के हर डहर आ हर दुआर हमेशा खुला रहेला।
ओहमें काकी जोरत बोलली- “एह कहाउत के सीख खाली धने-दउलत के ना हटे। एकरा माध्यम से मनुष्य के निर्भरता आ आत्मनिर्भरता के अंतर बतावल गइल बा। एगो कवर का आस में एगो दुआर देखला से नीमन बा कि आदमी अपना खातिर कई गो दुआर खोलि लेइ। एह कहाउत का भीतर के सबसे नीमन बात त ई बा कि जिनगी में एगो दुआर बंद हो जाइ त निराश ना होखे के चाहीं, कोशिश करे के चाहीं कि अपना सामने बतिसो दुआर खुलल रहे।”

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