ई ना पढ़नीं त कुछ ना पढ़नीं
- शिलीमुख

ई ना पढ़नीं त कुछ ना पढ़नीं

भोजपुरी दिशा-बोध के पत्रिका पाती के अगस्त 2026 अंक से साभार लिहल गइल ई चार गो कविता झँझोर के रख दिहें स। शिलीमुख के छद्मनाम से लिखल एगो प्रतिष्ठित साहित्यकार के ई चारो कवितन के समय-काल के जानकारी हमरा नइखे। हमरा बस इहे जानकारी बा कि उहाँ के अपना शुरुआती समय में शिलीमुख का नाम से रचना लिखत रहनी। शिलीमुख जी के असल नाम हम ना बताएब। जब अतना प्रतिष्ठित पत्रिका में ई नाम आइल बा त अतने मान लिहल जाव कि शिलीमुख जी का मुख से निकलल बानी भोजपुरी के नवके ना पुरनको लिखनिहारन का करेजा पर तीर जइसन लागी अतना त तय बा।

शिलीमुख जी बताइलें कि — देश में जब इन्दिरा जी का आदेश से अचानक इमरजेंसी लागल त ओह दौरान खाली विरोधी राजनेते ना सरकार के आलोचना करे वाला लोगन का मुँहे जाबी डाले खातिर धरो-पकड़ो-जेल में ठूँसो अभियान चला के जनता में भय आ आतंक फइलावल रहे। का साहित्यकार, का पत्रकार, का कलाकार, का संचार बेवस्था सब के सब अवाक रहे।अभिव्यक्ति का स्वतन्त्रता पर संकट रहे। तवना घरी कुछ साप्ताहिक अखबारन में शिलीमुख कालम लिखत रहले। आगा आ बहुत आगा चल के ऊ भोजपुरियो में कबित्त लिखे लगले , भोजपुरी के पत्रिका ” पाती” का पछिला कुछ अंकन में उनकर कुछ छिटपुट कबित्त आइल बा। एह बेरी, पाती का नवका अंक (अगस्त ’26) में एकट्ठे कई गो कबित्त देखे के मिलल।

अतना भूमिका काफी बा। अब कविता के आनन्द लीं। आ हो सके त एक दू लाइन के आपन टिप्पणिओ टीपत जाईं।

शिलीमुख के कविता

(एक)

नवजुग के बुधिगर

उबिछल हो जइसे गड़हिया क पानी
हम त चिहाइ गइनी सुनि ओछ बानी।

ढेर दूर गाँव नइखे राउर इहाँ से
छीछिल बिचार-बोल सिखलीं कहाँ से
गँउवो जवरवा के का नासऽ तानी।
हम त चिहाइ गइनी सुनि ओछ बानी।

भेद भाव अतना कि मन गुरमुसा जाव
भितरी के मइला सड़क पर ले आ जाव
बुधिगर होइयो के का करत बानी।
हम त चिहाइ गइनी सुनि ओछ बानी।

पोंछिटा खुलल बाकि छाती उतान बा
देखि राउर छरकल जमाना हरान बा
जोम भरल उमगल ई कइसन जवानी।
हम त चिहाइ गइनी सुनि ओछ बानी।

पीढ़ा दे ऊँच हम आपन बनवनी
रउआ त हमरे के हेठा देखवनी
चिन्हलीं ना गिरगिट के हमरे नदानी।
हम त चिहाइ गइनी सुनि ओछ बानी।

रउरो के समय कबो नीचे धसोरी
रउरा के, रउरे मन भितरे खँखोरी
कहियो तऽ लोग बदी-नेकी के जानी।
हम त चिहाइ गइनी सुनि ओछ बानी।

(दू)

हम का बानी

राउर बोली राउर बानी
रोज बनेले चटक कहानी
रउरा आगा हम का बानी।
हम का बानी।

गजरघँइंठ अस अइंठ कड़ा बा
पइठ गहिर आ पहुँच बड़ा बा
नँउंवें राउर सोनजड़ा बा
बुधि बल बेंवत अछइत हम त
मुँहदुब्बर जस किकुरल बानी।
हम का बानी।

हिन्दी में ढकचीं अँगरेजी
चीनी में पगुराईं
उर्दू के फलेवर डालीं आ
भोजपुरी चभुलाईं
जेतना उप्पर छउँकत बानी
दुगुना नीचा लुढुकत बानी।
रउरा आगा हम का बानी।
हम का बानी।

सब ढकेलाई हेठा-खाला
आई गर में रउरे माला
रउरे तसला डभकी चाउर
मंचासीन ऊँच पर राउर
घाघ नियर घड़ियार पटाइल
पानी के सबले बड़ ग्यानी।
रउरा आगा हम का बानी।
हम का बानी।

(तीन)

दोहा लेखा कुछ

तुलसी ना बन्हले कबों आपन कवनो गोल
कहले कहाँ कबीर, तूँ पीटऽ फुटहा ढोल।

ब्यर्थ ठकुरई, मान, जस, ब्यर्थ हाड़ आ चाम
भल होखे भाखा-भनिति, भल हो सभकर काम।

भरल रहे सन्तोख धन, रहें सहायक राम
लगल रहे मन कर्म में, अतने में सुखधाम।

जाति बरग में बाँटि के, कुटिल करी जब राज
केहू के कल्यान ना बाँटी सकल समाज।

सकल देश में बैद बनि, बँटलस पियरी रोग
तप के ताप रुचे कहाँ, शठ भावे हठजोग।

इरिखा डाह भरल हिया, कुटिल शकुनि के चाल
खेदि हंस दुनिया लखे काग गरे जयमाल।

कुमति कुराग कुसंग के उपटल कइसन राग
बेसहि रार, हुलुकाइ के घरे लगावे आग।

सन्त भेख करनी उलट मरिच मृगा के चाल
उड़ी धरा से अमिय जल, सूखी सरवर ताल।

सोना के लंका जरल, छिटा गइल धन धाम
रार बेसहले राम से, बद करनी बद नाम।

फूटी घइली पाप के, जुरी क कतहूँ ठाँव
उड़ि जाई सब छार बनि, लिही न केहू नाँव।

(चार)

कुपदी

हम सिधवा अनगढ़पुर बासी।
जवन मिले ओही में तिरपित
टटका ना, भलहीं हो बासी।

ऊ महराज बिकट बैपारी
खन कीनें खन बेचें
हम अँजोर के मुँह ना देखीं
खाली उनका पेंचे
गेंडु़ली मरले छेंकले रहिहें ऊ अँजोर-धनरासी।

सुखला सावन भरला भादों
जवनो चना-चबेना
माया से उनका सरेहि में
कुछऊ कहीं बचे ना
माथ काट के बार क चिन्ता
उनकर बनल चिन्हासी।

उगिलें ऊ दिन रात प्रवंचन
सभे बइठि के घोखे
बिजुली बत्ती, ए सी, हीटर
सरद-गरम ना होखे
देखि छहन्तर नट-नौटंकी
आवे हमरा हाँसी।

खोेजि-खोजि के रोज बहेंतुआ
कोल्हुवड़-गूर खियावें
सिखा-पढ़ा, चूरन चटाइ के
उनहन के सहकावें
ना जानसु, ऊहे एकदिन बनिहें सऽ
गर के फाँसी।

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