नागपूजा के लोक परम्परा

सभ्यता के सुरूआते से, संसार का हर देस में ‘सुरुज’आ ‘सर्प’ के पूजे आ अराधे के प्रचलन रहल बा। अपना भारत में त वैदिक काल के पहिलहीं से नागपूजा होत आइल बा। साहित्य, कला, संगीत, धर्म आ लोकसंस्कृति कूल्हि में ‘नाग’ आ उनका ‘पूजा’ के कवनो ना कवनो रूप (स्पष्ट भा प्रतीकात्मक) मिलिए जाई । भारतीय धर्म-विधान में चाहे आर्य होखे भा अनार्य ‘भय’ अ ‘कल्यान’ से मिलल भाव से अनेक नाग-प्रतीकन आ मिथकन के सृष्टि भइल बा । वैदिक काल में ‘नाग’ के दिव्य शक्ति संपन्न आ कल्यानकारी रूप के चर्चा वा । ऋग्वेद में उल्लेख बा । ओह नाग के नमन; जे पृथ्वी के परिकरमा करेलन, जे आकाश के जोति बाड़न, जल तरंगन में बाड़न, सोना के ढँकले बाड़न’। महाभारत से लगायत पुराणन आ अनेक धार्मिक ग्रन्थन में नागन के दिव्यरूप आ अलौकिक करतूत के जिकिर भइल बा ।
सर्वजीववाद के आदिम धर्म-स्तर पर, अनेक कारनन से मनुष्य एह जीव के ‘देवत्व’ के भाव दिहलस । एके रहस्यमय प्रतीकन आ मिथकन से जोरलस, आ ए देवरूप के पूजा आचार; ब्रत, उत्सव, कथा-वार्ता आ गीत-गायन में मुखर कइलस । आगे चलि के एकर प्रतीक लोक परंपरा के मान्यता पाके कई कई कथा कहानियन से जुड़ि गइल । नाग आ ओकरा रहस्यमय दिव्य रूप के महातम, लोकजीवन में अइसन समाइल कि ओकर पूजा अरचा होखे लागल । नागपंचमी एगो त्यौहारे हो गइल । नाग शक्ति आ ओकरा महात्म्य के बरनन पुराकथा आ लोककथा में अइसहीं नइखे होत आइल । भारत के विभिन्न अंचलन के पुराकालीन जीवित आ मृत दूनों संस्कृतियन से एकर पुष्टि होले । नाग के अलौकिक आ देवयोनि में मान के ओकर महातम के बखान आर्य संस्कृति में सुभाविक वा । विषुवत रेखा का आसपास घन बरखा आ दुर्गम बन जंगल वाला सघन इलाकन भा मैदानी क्षेत्रन में ‘सर्प’ जाति के मान्यता मिले का कारन बन क्षेत्र, भा खेतिहर जातियन में ‘नाग पुजइया’ के प्रचलन भइल होई ।
आर्य होखे भा अनार्य, मनुष्य के हर जातियन में साँपन से बाँचे खातिर कुछ ना कुछ उपचार भा उपक्रम; जतन भा बिधि-बिधान बनल होई । बिवश आ लचार भयग्रस्त मानव, संकट से त्राण पावे खातिर एह विशिष्ट जोनि का जीव के पूजा अरचा सुरू कइले होइर्। बाद में ‘अक्षय’-प्राप्ति आ ‘कल्याण’ का इच्छा से पूजा-परब के रेवाज चलि गइल होई । नागन का प्रति खाली ‘याचना’ आ भये के बात होखे अइसन नइखे, पाताल लोक के निवासी भइला का नाते उन्हनीं के धरती का उपजाऊ शक्ति (उर्वरा शक्ति) के प्रतीकात्मता प्राप्त भइल होई । वैदिक-पौराणिक आख्यान आ मंत्रन में नाग आ ओकरा दिव्य शक्ति के बखान भइल बा । अंगरेज विद्वान मैक्समूलर क कहनाम त ई बा कि बेदन में अनिष्टकारी पशु भा जीव-जन्तुअन क जतना उल्लेख मिलेला ओमें सबसे बेसी ब्यवहार सरपे के बा । संस्कृत का संहितन में गन्धर्व, यक्ष, किन्नरन का साथे सर्पो अर्द्ध-दिब्य वर्ग में आइल बाड़न । ऋग्वेद आ अथर्ववदे में एकर स्तुति चरचा बा बहुत वैदिक ‘वृत्र ।’ (वृत्रासुर) सर्पे क शक्तिशाली रूप रहे। आदिवासी आ पुराकालीन मानब जातियन में फइलल आस्था के कारन रहे कि आर्यो एकरा से प्रभावित भइलन सऽ । सिन्धु घाटी के सभ्यता में ‘प्रान्त-अवशेष’ ओह काल के नाग पूजा का परंपरा के पुष्टि करेलन स । बौद्ध आ जैन धर्मो में नाग के पवित्र स्थान मिलल बा । जइसे भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा से ले जात खा घनघोर बरखा से बचावे खातिर कवनो नाग अपना फन के छतरी (छत्र) उनका पर तान देले रहे, ओइसहीं भगवान बुद्ध के तपस्या करत खा मुलिचंद नामक नाग, बरखा, घाम, सीत से बचावे खातिर उनका पर फन के छतरी तनले रहे आ ओइसहीं जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ के बारे में कहल जाला। पार्श्वनाथ का प्रतिमा पर आजो सर्प के छत्र प्रतिमा अंकित मिलेले । देश में जवन स्थापत्य कला के प्रमाण मिलेलन सऽ ओमे अर्द्धमानव आ आ अर्द्ध-नाग के आकृति मिलेले ।
ईसापूर्व के बनावल नाग के एगो विशाल पत्थर- प्रतिमा आजो दक्षिण भारत के कनाड जिला में मिलि जाई । अजन्ता के गुफा में नागपूजा से संबंधित आकृति मिलेली सन । भारत में अनेक स्थानन पर, नाग देवता के मन्दिर बा जहाँ नियमित पूजा होले । एही तरे अगर संसार के अउर देसन में अउर सभ्यतन में ‘नाग’ आ ओकरा महातम के उल्लेख मिलेला। मिश्र के ईस्वी सन 2000 पहिले के इतिहास सर्प के देवत्व का परिकल्पना क प्रमान बा । ओह जुग में लोग अपना घर में साँप पाले आ ओकर पूजा करे । मिश्र में ‘इजो’ नामक नगर के बुद्धि के देवता मानल जात रहे । मेसोपोटामिया आ यूनानों में नाग के शक्ति आ कल्यान के प्रतीक मानल जात रहे । जापान में त ओके बरखा क देवता मान के पूजा करे क रेवाज रहे।
चीन का लोक-संस्कृति में साँप कृषि के देवता मानल जात रहे । चीन का राजधानी बीजिंग में आजो एगो प्रसिद्ध नाग मन्दिर बा । रोमन संस्कृति में नाग के पूजनीय माने क पुष्टि एसे होला कि उहाँ के लोग ‘ज्यूस’ के पूजा सर्पदेवता के रूप में करत रहल। रोम के हिरा मन्दिर में नागपूजा उत्सव का रूप में कइल जाला । एशिया का लगभग हर देश में चाहें सीरिया होखे या बेबीलोनिया भा तिब्बत, सर्प भा नाग के अलौकिक दैवी रूप प्राप्त बा। अफ्रिका, आस्ट्रेलिया स्वीडन, लिथुवानिया आदि देशन में नागपूजन के परब के रूप में मिलल बा । पड़ोस के देस नेपाल में आजो नाग देव के बरखा आ कृषि-उपज के देवता मानल जाला । एसे ई बात सिद्ध हो जाता कि ‘नाग पूजा’ खाली हिन्दुवे धरम मे नइखे बलुक सभत्तर बा । हमन किहाँ पावस में नागपंचमी मनावे के परम्परा बा।
महाराष्ट्र के एगो लोककथा बा, जेमे एगो किसान अपना खेत में हर जोतत खा नागिन के छोट बच्चन के मुवा देलस । नागिन खीसि में ओकरा सगरी परिवार के डँसि लिहलस । ओ किसान के दोसरा गाँव बियहल बेटी के काटे खातिर जब ऊ पहुचल त ओकरा के नाग का पूजा में लीन देखि के ओकर खीसि बुता गइल। जब लइकी ओकरा आगा दूध का कटोरा धइके हाथ जोरलस त ऊ खुश होके ऊ ओकरा परिवार के लोगन के बीख घींचि के फेरु जिया दिहलस। एह् लोककथा क पुष्टि एसे हो जात बा कि नाग-पंचमी का दिने हिन्दू आ अउरी खेतिहर बनवासी जाति आरन हर-फार, कुदार ना निकाले । मिर्जापरु के ‘कोल’ आ ‘बिआर’ जाति में इहे मान्यता बा ।
प्राचीन लोक आ जन कथन में नाग का जरिये मनुष्य के सहायता के अनेक प्रसंग मिलेला । एमे नायक-नायिका के बिपत्ति में मदद दिहला के बरनन बा । नागराज के निवास सरोवर में बा आ ऊ अकूत धन-संपदा आ वैभव के मालिक बाड़न । उनका लगे कतने रहस्यमय दैवी शक्ति बा । इच्छाधारी, द्रुतगामी, पंखधारी, सर्वशक्ति मान नाग शक्ति का एह रूप के लोग काहें ना पूजी ? उनके खुश करे खातिर काहें ना व्रत, अनुष्ठान करी ? बौद्ध कथा में मन्दिर कई जगहा बिखधर नागन के मानव मन्दिर आ धन के रक्षा करत देखावल बा । लोककथा आ जनुश्रुि त का अनुसार नाग कन्या अति रूपवान आ सरबगुन संपन्न होली अचके में भुलात भटकत पँहुचल नायक पर आसक्त होके रीझि जाली। नाग नायक के कठिन परीक्षा लेके फेरू इन्हन के बियाह देला आ हर सुख-दुख में हर तरह के सहायता देला । महाभारत में नागकन्या उलूपी और अर्जुन के प्रणय-विवाह पश्चात् उनके उत्पन्न पुत्र के पाण्डव पक्ष से पराक्रमपूर्ण युद्ध का उल्लेख मिलता है। अंडा नियर आकार के चमकदार आ दिव्य जोति से भरल मणि होला नाग का पास । अगर केहू अइसन मणिधारी का फन पर बइठल खंजन चिरई के देखि लेब, त राजा हो जाई । जन प्रचलित खिस्सा आ कहानियन के रहस भरल रोमानी दुनिया जिज्ञासा आ रहस्य से भरल बा। दूध लावा त ए लोग के अति प्रिय अहार हइये हऽ, बाकि कहीं-कहीं मछरी माँस आ शराबो के चढ़ावा देबे के प्रचलन बा ।
लोककथन में खून पिये वाला, हिंसक, मुहँ से आगि फेंकें वाला, मानव सीर धारी नागनों के बरतन मिलेला। चीन के ‘अजदहा’ आ ड्रैगन अइसने जीव रहल होई । ई दुर्दान्त नाग फेंड़ से लटकेलन; हवा में उड़ेलन आ अग्नि बीख उगिल के केहू के झउँलि देलन । भोजन खातिर एगो न एगो अदिमी के रोज माँग करे वाला नाग दइतन के चरचा कुछ कहानियन में बा । इन्द्र, कृष्ण, भीम अर्जुन भा कई गो बीर राजकुमारन का जरिये मराये वाला नाग दइतन के कहानी हम सुनले बानी । महाभारत का ‘बन पर्व-अजगर पर्व’ में युधिष्ठिर के नाग प्रार्थना बा । ‘जातक कथा’ आ ‘कथा-सरित्सागर’ में ई नाग ‘आदि मानव’ आ दैवी रूप में प्रगट होलन, भगवान बुद्ध का प्रति आदर राखेलन । कहानियन में नाग जातियन के राज
आ राजधानियन के बरनन गहिर समुद्र भा गहिर सरोवरन का नीचे बतावल गइलबा । बचपन में गुरुकुल में शिक्षा लेत खा, जब दुर्योधन भीम के विष भरल खीर खियवला के बाद पत्थर में बांध के नदी में फेक दिहलस, त तलहटी में कुन्तिदेव के राज के नाग उनकर जहर खीच के फेर से जिया दिहलन स आ राजा कुन्तिदेव उनका के दस सह्स्र हाथियन के बल प्रदान कइलन। एसे शिद्ध होता कि नाग वंश प्रायः भूमि का नीचे नदी भा तालाब में आपन राज बनावेला । अइसना जगह अचके कवनो बीर नायक के पँहुचल होला आ कल्पना भरल रोमानी कथा रचा जाले ।
महाभारत में अर्जुन आ नागकन्या उलूपी के प्रणय-विवाह से उत्पन्न पुत्र इरावान के युद्व कौशल आ वीरता के बखान बा। कई जाति अइसन बाड़ी सन जेवन अपना के नाग बंश के मानेली सन । छत्रियन का ‘बेस’ नामक कुल में आदि पूर्वज नाग मानल जालन । उनके पुरूरूवा राजा साहिवाहन नागपुत्र मानल जालन । एहजाति में साँप भा नाग के ना मारल जाला चाहे ऊ काटिये काहें ना देव ? पोराणिक परपरा में कुछ सवर्ण हिन्दू ‘आस्तीक मुनि’ का रूप में नागपूजा करेलन । आस्तिक, जरत्कारु के पुत्र आ ‘बासुकी’ नाग के भैने रहलन । इहे जनमेजय का सर्पजज्ञ से तक्षक’ नाग के रक्षा कइले रहलन। कहीं-कहीं नाग परब का अवसर पर सावन शुक्ल चतुर्थी के गंगा स्नान कइ के घर का देवालन पर सेनरु से एकइस रेखा बनावल जाली सन आ पंचोपचार से नाग पूजा कइल जाले ।
कल्यानकारी नागन का बारे में जवन उल्लेख लोककथन में मिलेला ओमे कहीं ऊ हितकारी, आश्रयदाताय; कृपालु आ सहायक चित्रित भइल बाड़न उत्तरी पहाड़ियन में नाग के पूजा त होले बाकि सर्प के रूप में ना । कांगड़ा (पंजाब) में ‘नागकोरो’ को ‘कैलांग नाग’ का नाँव से हँसुबा का रूप में पूजेला । नाग पूजा के गुजरात में नाग मारल ना जाला ओकरा मारि गइला पर देहि में घीउ लगा के दफना दिहल जाला । जनश्रुति बा कि अगर सर्प, ऋतुमती स्त्री के देख भा छू लेव त आन्हर हो जाला आ उ स्त्रियो बाँझ हो जाली सन भा उन्हनीं के पैदा भइल संतानो ना जियेलिसन । एही से संतानहीन मेहरारू पुत्र पावे खातिर हरेक महीना के शुक्ल पंचमी के दिने नागमूर्ति बना के दूध, जल आ फूल चढ़ा के पूजा ब्रत आ उपवास करेली सन । बँसफोर आ बहेलिया जाति के लोग धान क लावा आ दूध सर्प का बिल पर चढ़ावेला । हमनी किहाँ इहे परंपरा बा।
क्रूर आ रक्त पियेवाला नाग भा सर्पन के पूजा त लोग डर भा भय से करेला । ‘खासी’ जाति के लोग अइसने भयंकर सर्पदवेता के पूजेला। कहल जाला कि उन्हनी क कवनो बीर पूर्वज कबो कवनो नाग के गर्म लोहा से मुवा दिहलस चार दिसा में फेंकल एगो टुकड़ा जिया जन्तु का खइला से बांचि गइल । एही से ‘टलेन्स’ नाग के उत्पति भइल । धन संपत्ति आ निधियन के स्वामी, ई सर्प लोककथन में बरनन कइल कथानायकन के कई बेर मदद कइले बा ।
नागपंचमी का दिने अधिकांश पूरबी भारत में मेहरारु देवाल पर गोवर से नाग के आकृति बना के, दूध लावा चढा के भक्तिभाव से पूजा करेलीसन। गाँव के नवहा में अखाड़ा में पंचइयाँ के दिन कुश्ती लड़लस । घर में कचौडी़ आ दलपूरी, खीर-बखीर बनेला । सँपेरा गाँव-गाँव घूमि के नाग देवता के दरसन करावेलन स । अइसनों जाति बाड़ी सन, जवन धूम-धड़ाका से खाली त्यौहार मनावे ली सन । ‘खरवार’ लोग अपना पशुअन का सींग पर बेल पोतेला आ नून चटावेला।‘बियार’ मा ‘कोल’ लोग ओ दिन हर ना निकाले आ घर का चारुओर चूना से रक्षा चिन्हा लगावेला भा टोटका के रूप में चगोइठेला । एकरा अलावा मिर्जापुर के ‘धनगर’भादो मे;ं भांट, कातिक में भा नागपंचमी के पुजइया करेला लोग ।
नाग भा सर्प पूजा के एह भावना का प्रसंग में कवनो ना कवनो अइसन बिशेषता बा, जवन समान रूप में हर जगह पावल जाला । नाग के कबो नेउर (नेवला) आ कबो ‘गरूड़ से संबध जोरल जाला । आदिम धर्म भावना आ प्रतीकन में एके देखल जा सकेला । एह प्रतीकन के दार्शनिक आ लाक्षणिक ब्याख्या विद्वान लोग कइले बा । भा भारत में नाग के ऐतिहासिक, पौराणिक आ दार्शनिक अभिप्राय में अन्तर जरुर मिली, बाकि ओकरा महातम आ पूजा के परंपरा निर्विवाद बा। विष्णु भगवान, त क्षीरसागर में नाग-सेज पर सूतल पावल त देवाधिदेव एही नाग आभूषनन से अलंकृत होलन । गुजरात में ऊ दाऊक बन का नागेश्वर रूप में पूजल जालन ।


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