परिच्छेद, अनुच्छेद आ अध्याय : बतकुच्चन – 232
— तीनों अलग कि एके घर के सदस्य?

मूल विषय त इहे सोचले रहनी बाकिर जब एह बारे में सोचे लगनी त मामला अझुराए लागल आ याद आ गइलीं लक्ष्मीनारायण लाल। एक बेर हमरा मौका मिलल रहल उहाँ के एगो संबोधन सुने के। लक्ष्मीनारायण लाल जी हिंदी के बहुमुखी साहित्यकार, नाटककार, एकांकीकार, कथाकार अउर समीक्षक रहनी। उहाँके जनम 4 मार्च 1927 का दिने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिला के जलालपुर में भइल रहल आ निधन 20 नवंबर 1987 का दिने दिल्ली में भइल रहल। लालजी अपना सम्बोधन में एगो बात कहनी जवना के भाव कुछ अइसन रहल… ‘सझुरावल से आसान होला अझुरावल। सझुरावे खातिर योग्यता के जरुरत होला जबकि अझुरावे ला कौशल चाहेला।’
आ हम परिच्छेद, अनुच्छेद आ अध्याय के सझुरावे का चक्कर में अउर अझूरात चल गइनी। विज्ञान के विद्यार्थी रहला का चलते साहित्य आ खासकर के व्याकरण से हमरा संबंध बहुत कुछ भवह-भसुर वाला रहल बा।आ उहो नयका जमाना वाला ना, पुरनका जमाना वाला। त फेर जे बहुते लोग करेला से हमहूं कइनी आ चैट जीपीटी से चैट कर के एह विषय के सझुरावे के कोशिश कइनी। साधुवाद चैट जीपीटी के जे हमरा खोचाह आदत के अनदेखा कर के हमार हर अझुरावल सझुरावे के कोशिश करत रहेला।
अब एतना भूमिका बन्हला का बाद आवत बानी मूल विषय पर –
कवनो लिखल सामग्री पढ़त घरी केहू कह दे कि, “दूसरका अनुच्छेद फेर से पढ़ीं”, त शायद कवनो दिक्कत ना होखे। हम समझ जाइब कि ऊ दूसरा पैराग्राफ पढ़े के कहत बा। बाकिर उहे आदमी अगर कहे कि, “दूसरका परिच्छेद फेर पढ़ीं”, तब?
तब तनिका माथा खुजाए के पड़ सकेला। परिच्छेद माने दूसरा पैराग्राफ कि किताब के दूसरा खंड? आ अगर परिच्छेद किताब के एगो खंड ह त अध्याय का ह?
बस, आजु के बतकुच्चन एही से शुरू होत बा।
अनुच्छेद के आज के प्रचलित अर्थ बहुत हद तक साफ बा। कवनो एक विचार भा ओकर कवनो अंग के लेके लिखल वाक्यन के समूह के अनुच्छेद कहल जाला। अनुच्छेद के अंग्रेजी वाला paragraph मान लीहल जाव त काम आसान हो जाई। बाकिर परिच्छेद ?
इहाँ मामला तनिका गड़बड़ा जाला। परिच्छेद के मूल भाव विभाजन, अलग कइल भा सीमा तय कइल ह। बाकिर ग्रंथ के मामला में शब्दकोश एकरा के अइसन स्वतंत्र विभाग बतावत बा जवना में मुख्य विषय से जुड़ल कवनो विषय के विवेचन होखे। ओकरा साथे ‘अध्याय’ शब्दो अर्थ में दिहल बा।
एहिजा हमरा लागल कि जब कवनो अनुच्छैद भा दू-तीन गो जुड़ल अनुच्छेद के अगर एक साथ अलगा से कहल जाव त ओकरा के परिच्छेद कहल जा सकेला। प्रस्तुति में ई बहुत कुछ blockquote का तरह लिखा सकेला। जबकि blockquote असल में उद्धरण होला। आ अगर एकरा के extract का रूप में देखी त उहो गलत हो जाई काहे कि extract कवनो पाठ के जस के तस चुनल हिस्सा के कहल जाला। जइसे कवनो फल से फाँक निकालल जाव. ऊँख के पेर के निकाल रस ना ।
हमरा बुझाइल बात ई बा कि शब्दन के इतिहास से झगड़ा करे के जरूरत नइखे। एके शब्द अलग-अलग समय आ अलग-अलग ग्रंथ में अलग स्तर खातिर इस्तेमाल भइल हो सकेला। बाकिर आज लिखत घरी पाठक के अझुरावे से बचावल लेखक के जिम्मेदारी ह। एहसे अपना लिखाई में हम अध्याय के किताब के बड़ विषयगत विभाग, खंड के ओकर भीतर जरूरत भर के विभाग, आ अनुच्छेद के paragraph खातिर इस्तेमाल कइल बेहतर मानब। अब रउरा आपन राय दीं। (जानत बानीं कि राउर राय बहुते अमूल्य होला आ रउरा एकरा के जँहें-तँहे केहू से साझा कइल अपना इज्जत पर चोट मानीलें। बाकिर हमरा लागेला कि निहोरा कइला में का हरज बा!)
अब सवाल बा कि एह प्रोटोकाल में परिच्छेद के कहाँ राखल जाव?
ओकरा के निकाल बाहर करे के कवनो जरूरत नइखे। ऊ पुरान आ प्रतिष्ठित शब्द ह। बाकिर ओकरा के अनुच्छेद आ अध्याय के बीच एगो निश्चित कुरसी देबे के जिद काहे? भाषा में हर आदमी के नाम एगो कुरसी पर लिखल जरूरी नइखे।
अनुच्छेद सामान्य paragraph रही। बाकिर कवनो खास अनुच्छेद, भा आपस में जुड़ल दू-तीन अनुच्छेदन के समूह, जवना के लेखक मुख्य लेख से तनिका अलग करके पाठक के खास ध्यान खातिर पेश करे—ओकरा के परिच्छेद कहल जा सकेला। रूप-रचना में ऊ blockquote जइसन अलग लउक सकेला। तब एगो सहज व्यवस्था निकलत बा:
अध्याय — बड़ विषयगत विभाग
अनुच्छेद — सामान्य विचारगत इकाई
परिच्छेद — कवनो खास अनुच्छेद भा अनुच्छेदन के समूह, जवना के विशेष महत्त्व के चलते मुख्य प्रवाह से अलग पहचान दिहल गइल होखे।
आ चलत-चलत इहो कहल सही लागत बा कि हमरा मन में आइल पहिलेवाला सवाल “परिच्छेद के निश्चित कुरसी देबे के जिद काहे?” का जगहा ई कहल अधिका सही रही कि —
“जब कुरसी खालीए बा, त परिच्छेद के एगो काम काहे ना दे दीहल जाव?”


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