रखिया बन्हा ल भइया
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-55

आइल भोजपुरिया चिट्ठी

रखिया बन्हा ल भइया

आजु दूनो नतियन का खुसुर-फुसुर से काकी उबिया गइल रहली। अंत में पूछिए दिहली कि तहनी का का करतारऽ सन। तब लइका बतवले सन कि हमनी का यूट्यूब पर रक्षाबंधन वाला फिलिम के गाना सर्च करतानी जा। काकी पुछली कि अबहीं ले कवन-कवन गाना मिल गइल बा त लइका गिनावे लगले सन- “भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना”,  “फूलों का तारों का सबका कहना है”, “बहना ने भाई की कलाई से प्यार बाँधा है”, “मेरी बहना ये राखी की लाज तेरा भैया निभाएगा”, “धागों से बाँधा” आ “राखी के बंधन अनमोल।”
काकी कहली कि असली गाना त भुलाइए गइल बाड़ऽ लोग। सभसे फेमस गाना। अपना टाइम में हमनी का झूमि-झूमि के गावत रहीं जा-
रखिया बन्हा लऽ भइया सावन आइल, जियऽ तू लाख बरीस हो
तोहरा के लागे भइया हमरी उमिरिया, बहिना तऽ देले आसीस हो।
अब त लइका डिठारे सर्च करे में लागि गइले सन आ अतने में लभेरन चहुँपि गइले। बात राखी पर निकलि गइल। काकी लइकन ओरि अङुरी देखाके बोलली- “अब त सब कुछ बदलि गइल बा। फिल्मी गीत भा लोकगीत रेडियो से ना त भोंभा पर आ ना त घर में टेपरिकार्डर प सुनत रहे आदमी। अब त लइका पले भर में ओकर विडियो भी सर्च कलेतारे सन। कतना जमाना बदलि गइल बा लभेरन! अब त राखी, कवनो परब ना होके लइकन के एगो खेलवना हो गइल बा।”
लभेरन हुँकारी भरत कहले- “ठीके कहतानी। पहिले आ आजु में ढेरे बदलाव आ गइल बा। पहिले राखी के ‘रक्षा सूत्र’ कहल जात रहे, जवन सावन का पुरनवासी के मनावल जात रहे। ओह दिन पंडीजी आवसु आ अपना जजिमानन का गाटा पर मंत्र पढ़िके राखी बान्हसु अउर उनुका कल्याण आ रक्षा के कामना करसु। एकरा बाद भ्रामक इतिहास, विद्यालयी शिक्षा आ सिनेमा एकरा के एतना प्रभावित कइलसि कि ई मूल रूप से भाई-बहिन के प्रेम, समर्पण आ रक्षा का वचन के परब बन गइल। आज का तारीख में ई पारिवारिक आ भावनात्मक रूप से भाई-बहिन के रिश्ता तक सबसे बेसी केंद्रित हो चुकल बा।
रानी कर्णावती आ मुग़ल बादशाह का खीसा के का कहल जाउ? ऊ अभी तक अप्रमाणित बा। कहल जाला कि चित्तौड़ के रानी कर्णावती (राणा सांगा के विधवा) गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह का आक्रमण से रक्षा खातिर दिल्ली का मुग़ल बादशाह के राखी भेजले रहली। पहिल बात त ई कि ई  खीसा अकबर के ना, बलुक उनका बाबूजी हुमायूँ से जोड़ल जाला। बाकिर समकालीन फारसी भा आधिकारिक ऐतिहासिक दस्तावेज (जइसे ‘बाबरनामा’ भा ‘अकबरनामा’) में राखी भेजे के कवनो पुख्ता ऐतिहासिक सबूत नइखे मिलत। इतिहासकार लोग एकरा के बाद का काल में जेम्स टॉड (‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’) द्वारा लिखल लोकश्रुति आ भावनात्मक आख्यान मानेला।”
काकी टोकली- लोग कहेला कि भाई-बहिन वाला बात त पुराणो में बा।”
लभेरन कहले- “चाहे इंद्राणी द्वारा देवराज इंद्र के राखी बन्हला के कथा होखे भा राजा बलि आ लक्ष्मी जी के प्रसंग होखे, ओहमें ई खाली भाई-बहिन तक सीमित नइखे रहल। ई संकट का बेरा शुभचिंतक द्वारा रक्षा आ विजय के कामना खातिर बान्हे जाए वाला सूत्र रहल बा। पुरोहित-जजिमान परंपरा ई बा कि श्रावणी पर्व का दिने पुरोहित लोग जजिमान का हाथ पर एह प्रसिद्ध मंत्र के पढ़ि के रक्षा सूत्र बान्हेलन-
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
कहीं-कहीं ‘त्वाम् प्रतिबध्नामि’ पाठ भी खूब प्रचलित बा।
ई कहल ढेर सही होई कि पुरोहित-जजिमान के परंपरा एकर धार्मिक आ आध्यात्मिक आधार रहल बा, जबकि भाई-बहिन के रूप एकर सामाजिक आ पारिवारिक विस्तार हटे। दूनों परंपरा के आपन-आपन महत्त्व बा। जहाँ पुरोहित मंगलकामना के सूत्र बान्हेले, उहँवे बहिन अपना भाई के दीर्घायु आ प्रेम का अटूट बंधन के सूत्र बान्हेली।”
तब काकी आपन चिंता सुनवली- ‘’अब का कइल जाउ, बाद वाला पीढ़ी के त पतो ना चली कि राखी का तेवहार के सही स्वरूप का रहे। अब का कइल जाए के चाहीं लभेरन?”
लभेरन अपना गाल पर से हाथ हटवले आ गंभीर होके बोले लगले-
“हमनी के नई पीढ़ी के बतावे के परी कि राखी खाली ‘भाई द्वारा बहिन का रक्षा’ तक सीमित नइखे, ई आपस में सुरक्षा, संकल्प अउर शुभाशीष के परब हटे। हमनी के फेरु से ओकरा शास्त्रीय परंपरा आ लोकाचार के महत्त्व देबे के परी। ओह दिने पुरोहित जी के आदरपूर्वक घरे बोलवावे के परी। बाल-बच्चा का सङे अपनहूँ संकल्प कइके आ श्रावणी उपाकर्म का संस्कार में भाग लेके रक्षा-सूत्र बन्हवावे के परी। एह अवसर पर पूरा परिवार के जोरला से कुछ बात बनि सकत बा भविष्य में।”
लभेरन आपन बात आगे बढ़वले- “एहमें कुछ चीज और जोरि दिहल जाई त समाज हित में ढेरे ठीक हो जाई। राखी के राष्ट्र-रक्षा खातिर सैनिक के भी भेंजल-भेंजवावल जाउ, प्रकृति के रक्षा खासकर फेंड़न के बँचावे खातिर कुछ नया संकल्प लेबे के योजना भी बनावल जाउ। हमरा बिसवास बा कि एहमें सरकारो के सहजोग मिली।”

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