झीमी-झीमी बूनी बरिसावेले बदरिया
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-54
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

झीमी-झीमी बूनी बरिसावेले बदरिया

काकी पलानी में बइठि के गावत रही आ दूनो नतिया ढोलक नियन चौकी बाजावत रहन स-
सावन का महीना, पवन करे शोर
जिअरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर।
अतने में लभेरन चहुँपि गइले। काकी उनुकर हाल-चाल पूछे लगली। बड़का नतिया के पानी पियावे के कहली। उहनी के एह घरी लभेरन के आइल नीक ना लागल। पानी पिअवला का बाद छोटका नतिया मइया के हाथ हिलाके जइसे जगवलसि कि अब आगेवाला गाव। अब काकी गीत के अंतरा कढ़वली-
मौजवा करे क्या जाने, हमको इशारा
जाना कहाँ है पूछे, नदिया की धारा
मरजी है तुम्हारी, ले जाओ जिस ओर
रामा गजब ढाए, ये पुरवइया
नइया सँभालो कित, खोए हो खिवइया
पुरवइया के आगे, चले ना कोई जोर
काकी कहली कि सावन आवते ई गीत अनासे फूटे लागेला सभका मन में। चल, ऊ सभ पर बाद में बात होई, पहिले लइकन के सावन का बारे में कुछु बताव।
लभेरन बतावे शुरू कइले।
सावन का नाँवे भर से मन में तसबीर बने लागेला घनघोर बदरा आ बिजुरी का चमक के , पुरवइया के झोंका आ भींजल आम का पतई के, ताल-तलइया में उठत लहर के, खेत में हरियर-हरियर धान के आ आम का डाढ़ि पर डोरि से लगावल झूला पर झूलत लइकिन के कजरी गवला के। साँच त ई बा कि सावन खाली एगो महीना ना ह,  ई भारतीय जीवन में प्रकृति प्रेम आ कृषिगीत के उत्सव हटे। एहमें अनासे पारिवारिक संबंध एके सङे जागल लउके लागेला। एक परिवार का झुलते टोला-मोहाला का लइकिन के लाइन लागि जाला झूले खातिर। एकदम फगुआ नियन संबंध आ ऊहे नशा!
अब सवाल ई बनत बा कि सावन आखिर एतना खास काहें हटे? भारत का जलवायु में मानसून के बहुत महत्त्व बा। जेठ-असाढ़ का गरमी से धरती त जइसे जरि जाली। नदी-पोखरा, खेत-खरिहान, फेंड़-बिरिछ सभ पानी के बाट जोहत रहेला। अइसना में जब सावन में बादर घुमड़ि-घुमड़ि के आवेला आ रिमझिम-रिमझिम फुहार पड़े लागेला, त फेरु त धरती के रूपे अद्भुत हो जाला। सूखल आ दरार फाटल माटी में हरियरी के आगम हो जाला। धान के रोपनी शुरू हो जाला। घास-पात, लता-पतई, फेंड़-बिरिछ सभके नया जीवन मिल जाला। अतने ना पसुओ पक्षी के बेवहार बदल जाला। मोर नाचे लागेला, पपीहा बोले लागेलन आ बेङ टर्राए लागेले सन। एकर माने ई भइल कि सावन का आगमन के असली मतलब हटे तपस्या का बाद तृप्ति, प्रतीक्षा का बाद मिलन आ सुखरख का बाद हरियरी।
सावन के ई फिल्मी गीत असहीं लोकप्रिय ना हो गइल रहे-
झिलमिल सितारों का आँगन होगा,
रिमझिम बरसता सावन होगा।
ईहे त सावन के मनोहर रूप हटे।
रामरक्षा मिश्र विमल जी के एगो भोजपुरी गीत के तनी आनंद लीं-
झीमी-झीमी बूनी बरिसावेले बदरिया
लागेला नीक ना।
हँसे सगरी बधरिया लागेला नीक ना।
सरग बहावेला पिरितिया के नदिया
छींटे असमनवा से चनवा हरदिया
धरती पहिरि लिहली हरियर चुनरिया
लागेला नीक ना।
नील रंग के किनरिया लागेला नीक ना।
बरिसि-बरिसि घन पात-पात धोवे
कवि आ रसिक सभ सुध-बुध खोवे
झूमि-झूमि गावेलिन झूमर सभ सुंदरिया
लागेला नीक ना।
चले देली ना डगरिया लागेला नीक ना।
नाचे लगले मोरवा मोरिनिया के संगवा
मनवा गोताए लागल नेहिया के रंगवा
गगन मगन भइले झरली फुहरिया
लागेला नीक ना।
देखि छबि के बजरिया लागेला नीक ना।
अवते सवनवा ना होखे, के मगनवा
खनकि खनकि उठे गोरी के कंगनवा
फाटि जाले बदरी का मन के अन्हरिया
लागेला नीक ना।
खुले प्रीत के डगरिया लागेला नीक ना।
पहिल पानी परते जवन सोन्ह गंध माटी से उठेला, ऊहे त असली संगीत हटे सावन के। ओकरे बाद त जब धरती तनी रसगर हो जाली त लोककंठ में कजरी फूटे लागेले। ओकरा बाद त भदो में ठाँय-ठाँय बरखा शुरू हो जाला आ ओकर प्रभाव तकलीफदेह होला। विमल जी का एगो भोजपुरी गीत में रउआँ बरसात में बिरहिन के छटपटाहट अउर दर्द के साफ सुन सकत बानी-
कब ले निहारीं पिया तहरो डगरिया
घेरि-घेरि आवे असमान में बदरिया।
दिन में चएन नाहीं रतिया खा निनिया
रहि-रहि काटे पिया चढ़ली जवनिया
बटिया तहार जोहे सुधि के नजरिया।
गड़-गड़ गरजेला बदरा गगनवा
जीव धड़केला मूँदि लींला दूनो कनवा
गिरि जाले मनवा प कवनो बजरिया।
आन्ही-पानी आवेले कि दिल दहलावेले
भादो के अन्हरिया जियरवा डेरावेले
रेडनी का कॉट नीयन चभके सेजरिया।
काकी बहुत खुश भइली आ कहली- “सावन में कवना काम से परहेज करे के चाहीं, ओहू प तनी प्रकाश डाल।”
लभेरन कहले- सावन में पत्तेदार साग ना खाए के चाहीं- सावने वर्जयेच्छाकं,  काहेंकि एहमें कीड़ा-मकोड़ा आ बैक्टीरिया के डर जादे रहेला। बरखा में पानी के संक्रमण जल्दी फइलेला, एहसे पानी खउला के आ छान के पीए के चाहीं, एह मौसम में पाचन शक्ति कमजोर हो जाले, एहसे जादे तेल-मसाला भा बासी खाना से परहेज करे के चाहीं। घर का जरी जलजमाव ना होखे देबे के चाहीं, एहसे मच्छर का सङे-सङे डेंगू-मलेरिया जइसन बेमारियो से बचाव हो सकेला।
काकी जोरली- हमनियो का बचपन में खूब सुनले रहलीं हा जा- “सावन साग नु भादो दही।”

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