रहरी-रहरी चहेटे वालन के रहरी-रहरी दउड़हूं के पड़ेला
- टीम अंजोरिया

रहरी-रहरी चहेटे वालन के रहरी-रहरी दउड़हूं के पड़ेला

पिछला दिने राजस्थान में एगो स्कूल के निरीक्षण करे चहुँपल तेलचट्टन पर लोग हिट मार दिहल आ तेलचट्टा सभ एह बात पर बिलबिला गइल बाड़न स। आज के लेख ओही लोग के ई समुझावे खातिर लिखत बानी कि—‘जइसन रहबऽ हो कुटुम्ब, तइसन पइबऽ हो कुटुम्ब।’ भोजपुरी के एगो अउर कहावत तेलचट्टन के सुन लेबे के चाहीं—‘परीकऽ हो बिलार, एक दिन खइबऽ मूसरी के मार!’

अगर तूं बिना अधिकार दोसरा के परिसर में घुसबऽ, ओकरा से सवाल-जवाब करबऽ आ अपना के निरीक्षक मान लेबऽ, त सामने वाला से हमेशा स्वागत-सत्कार के आस काहे राखबऽ? पहिले ई बतावऽ लोग कि बिना पूछले, बिना इजाजत कवनो स्कूल में घुस जाए के अधिकार तोहरा लोग के दिहल के बा?

तोहरे लोगन के एगो प्रवक्ता सौरभ दास अदालत के शरण लिहले बाड़न कि कुछ पत्रकार जबरिया उनुका घर में घुस अइलें आ उनुकर अता-पता जगजाहिर कर दिहलें। उनुकर शिकायत गलत नइखे। हर आदमी के निजता आ सुरक्षा के अधिकार बा। बाकिर जे अधिकार रउरा अपना खातिर माँगत बानी, उहे अधिकार दोसरो के देबे के पड़ी।

ई कहला भर से काम ना चली कि उनुकर घर निजी जगह ह आ स्कूल सार्वजनिक संस्थान। सार्वजनिक संस्था होखला के मतलब ई त ना नू होखी कि—‘गरीब के जोरू, भर गाँव के भउजाई।’ सार्वजनिक स्कूलो में घुसे, कैमरा चलावे आ तथाकथित निरीक्षण करे के कुछ नियम-कायदा होखेला।

अगर सवाल स्कूलन के हालात आ व्यवस्था पर बा त संबंधित अधिकारियन का लगे जा लोग। सवाल उठावऽ, जवाब माँगऽ आ अधिकारियन का साथे निरीक्षण करे जाए के प्रयास करऽ। बाकिर अपना मन से निरीक्षक बन के कहीं घुस गइल आ रोकला पर उत्पीड़न के शोर मचावल कवन पत्रकारिता ह?

वइसे निरीक्षण जइसन एगो अउर परंपरा हमनी का इलाका में होले—कन्या निरछनी। आ कन्या निरछनियो केहू अपना मन से ना कर लेव। एकरा खातिर परिवार आ परंपरा से तय अधिकार होखेला। तोहरा लोगन का लगे स्कूल के निरीक्षण करे के कवन अधिकार, योग्यता भा अनुभव बा? कबो कवनो स्कूल बनवले बाड़ऽ लोग? कवनो स्कूल चलवले बाड़ऽ लोग? अगर एह सवाल के जवाब हँ में बा त बतावऽ लोग कि ऊ स्कूल कवन ह।

देखे में आवत बा कि तोहरा लोगन के मनसा एकदम साफ बा—कवनो तरह भाजपा के बदनाम करे के बा। भाजपा के आलोचना करे आ ओकरा से सवाल पूछे के अधिकार तोहरा लोगन के बा। बाकिर हर जगह मोरी खोजे वाला तेलचट्टा-सुभाव से सवाल कम आ मनसा बेसी लउके लागेला।

एहघरी सोशल मीडिया पर एगो घटना देखे के मिल रहल बा, जवना में तू लोग अइसन स्कूल में चल जात बाड़ऽ जहाँ के विधायक, सांसद आ ग्राम प्रधान कांग्रेस से जुड़ल बाड़ें। तबहियों तू लोग ओहनी के निरपराध बतावत सगरी दोष राज्य सरकार भा केन्द्र सरकार पर डालत जात बाड़ऽ लोग। अगर सचमुच मकसद स्कूलन के दशा सुधारल बा त झारखंड जाए के योजना बा कि ना? भा निरीक्षणो खातिर सरकार आ दल देख के जगह चुनल जाला?

कहत बाड़ऽ लोग कि पुलिस का मौजूदगी में तोहरा लोगन के कूटल गइल आ पुलिस देखत रह गइल। पुलिस के तमाशा ना देखे के चाहत रहे। ओकर काम कानून-व्यवस्था कायम राखल ह। जे मारपीट कइलस, ओकरा पर कार्रवाई होखे के चाहीं। बाकिर जे बिना अधिकार दोसरा के परिसर में घुसल, ओकरो जिम्मेदारी तय होखे के चाहीं। कानून खाली एक पक्ष पर लागू ना हो सकेला।

तोहरा लोगन के माँग रहेला कि पुलिस लाठीचार्ज ना करे, लोगन पर अधिकई ना करे आ अभिव्यक्ति के आजादी में दखल ना देव। बात ठीक बा। बाकिर अभिव्यक्ति के आजादी के मतलब अराजकता के आजादी ना होला। अपना खातिर कानून, मर्यादा आ निजता माँगत घरी दोसरा के कानून, मर्यादा आ निजतो के सम्मान करे के पड़ेला।

रहरी-रहरी दोसरा के चहेटत रहबऽ त कबो ना कबो रहरी-रहरी दउड़हूं के पड़ी। काँटा बो के फूल के फसल नइखे काटल जा सकत। कबीर कहले रहन—‘जो तोको काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।’ बाकिर दुनिया हमेशा कबीर के राहे चले, एकर भरोसा मत रखऽ लोग। आजु के व्यवहार त कई बेर इहे कहत लउकेला—‘जो तोको काँटा बुवे, ताहि बोव तू भाला।’

 

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