अरुअइला पीठा नियन
- डॉ रामरक्षा मिश्र विमल
सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-53
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

अरुअइला पीठा नियन

आजु साँझि खा लभेरन के अइला का बादो काकी के छोटका नतिया के चेहरा लटकले रहे। काकी परेशान रहली जाने के कि का बात भइल बा जेकरा चलते ओकर मन मधिमाइल बा। आखिर अंत में ऊ चिड़चिड़ाइ के पुछली-  “काहें अरुअइला पीठा नियन मुँह बनवले बाड़ऽ?”
तब जाके ओकर मुँह खिलल- “आजु इंग्लिश वाली मैडम गेम क्लास देबे के कहिके पढ़ावे लगली हा। काल्हुए कहले रही आ आजु पलटि गइली हा। आजु ढेर खिसियाइलो रहली हा।”
लभेरन कहले- “घर में भा स्कूल में जरूर कवनो अइसन बात भइल होई, जवना से उनुकर मूड खराब भइल होई। जान-बूझि के कवनो टीचर कवनो बच्चा के दिल ना दुखावेला।”
अतना में बड़का नतिया बोलि उठल- “अंकल, अरुआइल पीठा क्या होता है?”
लभेरन बतावे लगले।
भोजपुरी में “अरुअइला’ पीठा नियन मुँह” एगो लोक-प्रयोग हटे। अरुअइला भा अरुआइल माने अरुआ गइल। बासी पीठा में जब गंध आवे लागे, भा खऽट हो जाए भा ऊ पानी छोड़े लागे त मानऽ कि पीठा अरुआ गइल बा, अब खाए लाएक नइखे। ‘अरुअइला पीठा नियन मुँह’ के माने भइल कि सुस्त आ मुरझाइल बाड़ऽ, भा मुँह लटका के बइठल बाड़ऽ? जब पीठा अरुआ जाला त अइसने निस्तेज आ लटकल रूप हो जाला ओकर।
एकरा के काकी अउर स्पष्ट कइली- जइसे खट्टा आ खराब हो चुकल पीठा बेस्वाद आ बेकार लागेला, ओइसहीं जे बिना ऊर्जा के ढीला-ढाला भा बेजान मुँह बनाके बइठल रहेला, ओकरे खातिर कहाला कि “काहें अरुअइला पीठा नियन बइठल बाड़ऽ?”
अब छोटका के मन तनी बदलल। बोललसि- “अंकल, एहू पर एगो कहानी सुनाईं।”
लभेरन मुस्कइले आ कहानी सुनावे लगले।
“गाँव में एगो आदमी रहे। ओकरा हर बात में आपन बड़ाई सुने के आदत रहे। एक दिन ऊ बहुत सज-धज के गाँव का बइठकी में आपन बड़ाई सुने का इरादा से पहुँचल। ओहिजा गाँव के ढेरे लोग जमा रहे बाकिर केहूँ ओकर नोटिस ना लेत रहे। ऊ बइठि के इंतजार करे लागल कि केहू त ओकरा नया कपड़ा पर कुछ बोली। ओह दिन गाँव का कवनो बहुत जरूरी मुद्दा पर चर्चा होत रहे, एहसे ओकरा पहनावा-ओढ़ावा पर केहू के नजरे ना गइल। जब ऊ घरे लवटत रहे तब रामधियान सुकुल टोकले- का हो बसरोपन, अतना नीमन कपड़ा पहिरले बाड़ऽ एकदम हीरो नियन आ मुँह अरुअइला पीठा नियन काहें लटकवले बाड़ऽ? तब जाके उनुकर मुँह हरियराइल।”
काकी के मन अब एह शब्द का विश्लेषण खातिर मचलल। पुछली- “अरुआइल आ मरुआइल में का अंतर बा? ईहो बतावऽ कि अरुआइल सामान खा लिहला से कवनो परेशानी त ना होई नू?”
लभेरन कहले- ‘अरुआइल’ आ ‘मरुआइल’- दूनों शब्द में ताजगी भा सजीवता का घटला के भाव त बा बाकिर माने अलग-अलग बा। अरुआइल खास करके खाद्य-पदार्थ के बिगड़े के सूचक हटे। एह अर्थ के भोजपुरी में साहित्यिको प्रयोग मिलेला। जितराम पाठक के एगो रचना ‘पटरी ना खाई’ में आइल बा-  “अरुआइल बा बात तहार…।” एहिजा ‘अरुआइल’ भोजन का अर्थ में त नइखे, बाकिर बात का अरुचिकर भा अस्वीकार्य भइला के व्यंग्य जरूर बुझा जात बा। ‘मरुआइल’ के मूल भाव मुरझाइल, कुम्हलाइल भा निस्तेज हो गइल हटे। जो कवनो फूल, पत्ता, पौधा, चेहरा, रूप, मन आदि में पहिले वाला ताजापन, जीवंतता भा चमक ना रहि जाइ त कहल जा सकेला कि ऊ मरुआ गइल बा। सूर्यदेव पाठक ‘पराग’ जी का एगो गीत ‘तार-तार मसक गइल’ में एकर देखनउक प्रयोग बाटे- “मरुआइल खुशियन के बाग!” एहिजा मरुअइला के माने बाटे खुशी के बगिया मुरझा गइल, उजड़ गइल। एही तरह से परमेश्वर दूबे ‘शाहाबादी’ का नवगीत के एगो पंक्ति बाटे- “मरुआइल चंद्रमुखी/मरुआइल रूप।”
‘अरुआइल’ शब्द के आधुनिक स्वास्थ्य-विज्ञान से जोड़ के देखल जाई त एकर बहुत रोचक आ सार्थक व्याख्या निकल सकऽता। अरुअइला के मतलबे ई भइल कि ओकरा में जैव-रासायनिक आ सूक्ष्मजीवी परिवर्तन हो गइल बा, जेकरा चलते ओकर स्वाद, गंध, बनावट आ खाद्य-सुरक्षा सभ बदल गइल बा। भोजन में मौजूद सूक्ष्मजीव- खास करके बैक्टीरिया, फफूँद आदि उचित तापमान, नमी आ समय मिलला पर तेजी से बढ़े लागेला। एकरे कारन भोजन खट्टा, दुर्गंधयुक्त, चिपचिपा भा असामान्य होखे लागेला। अब अरुआइल खाना खइला से कतना नुकसान होई, ओकर अनुमान क लीं।
जइसे अरुआइल भोजन शरीर खातिर उपयुक्त ना रह जाला, ओइसहीं मनुष्य का जीवन में कवनो चीज के लंबा समय तक उपेक्षित छोड़ दिहला (अरुअइला) पर ऊ स्वास्थ्य के नुकसान पहुँचा सकेला। जइसे, लगातार बासी भा असुरक्षित भोजन खाइल, दूषित पानी पीअल, शरीर का साफ-सफाई के अनदेखा कइल, लगातार नींद के कमी, शारीरिक निष्क्रियता- ई सभ अलग-अलग प्रकार से स्वास्थ्य पर उल्टा प्रभाव डाल सकेला। ‘अरुआइल भोजन’ भा खराब भोजन खइला से उल्टी, दस्त, पेट में दर्द या मरोड़, मितली, बुखार, जइसन समस्या हो सकेला। कुछ सूक्ष्म जीव अइसनो विषैला पदार्थ पैदा कर सकेलन जवन खाना गरम कइला का बादो ठीक से नष्ट ना होखे। एहसे जे चीज स्वास्थ्य के अनुकूल ना होखे, ओकरा के खाली पुरान आदत, स्वाद भा सुविधा का कारन अपनवले रहल बुद्धिमानी ना कहाई।

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