यह लै अपनी लकुटि कमरिया यह ले अपनी सोटी
तेरी बहुत चराई गइया खा कर बासी रोटी।

वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान,
विडम्बक वहीं पास में खड़ा छेड़ता होगा उल्टी तान।
एही अन्दाज में आजु के मथैला सूरदास जी के लिखल प्रसिद्ध कविता पर आधारित बावे। पूरा कविता नीचे दे रहल बानी काहे कि कविता के हर लाइन से हम ऊ बात कहल चाहब जवन कहल चाहत बानी –
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो |
भोर भयो गैयन के पाछे, मधुवन मोहिं पठायो ।
चार पहर बंसीबट भटक्यो, साँझ परे घर आयो ॥मैं बालक बहिंयन को छोटो, छींको किहि बिधि पायो ।
ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो ॥तू जननी मन की अति भोरी, इनके कहे पतिआयो ।
जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो ॥यह लै अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो ।
‘सूरदास’ तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो ॥– सूरदास
अबकी खबर पक्का बा कि भाजपा के प्रवक्ता शहजाद पूनावाला भाजपा के सदस्यता छोड़ दिहलन. प्रवक्ता पद से इस्तीफा पिछलको महीना दिहले रहलन बाकिर तब ओकरा के सकारल ना गइल रहल। अब ऊ दुबारा इस्तीफा दे दिहले बाड़न आ अबकी भाजपा के प्राथमिक सदस्यते से। अबकी के इस्तीफा में ऊ सकारे भा नकारे के विकल्प नइखन छोड़ले।
अब एही प्रकरण के चरचा हम सूरदास जी के कविता के लाइनन से करे जा रहल बानी। ‘यह लै अपनी लकुटी कमरिया बहुतही नाच नचायो’ का बदले उनकर जवन भाव सामने आवत बा ऊ हमरा विचार से –
यह लै अपनी लकुटि कमरिया, यह ले अपनी सोटी।
तेरी बहुत चराई गइया खा कर बासी रोटी।
के बा। बासी रोटी के लिखले त नइखन बाकिर इस्तीफा के कारण में आर्थिक कारणो के उल्लेख कइले बाड़न शहजाद पूनावाला। ऊ भाजपा के माथ के बतावे के कोशिश कई बेर कइलन कि ‘ग्वाल बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो‘। अब मुँह पर माखन थोपे का जगहा हो सकेला कि कवनो अइसन बात उनुका पर थोपे के कोशिश करे में कुछ लोग लागल होखे जवन ऊ कबो कहबे ना कइले होखस।
लिखले बाड़न कि इस्तीफा के कारण ‘व्यवस्था’ बा ‘व्यक्ति’ भा ‘विचार’ ना। आ उनुकर एह बात के रेघरियावे ला उनुकर कुछ नया एक्सप्रेशन (ट्वीटर पर ट्वीट कइल जात रहल, X पर एक्सप्रेशन) देखल जा सकेला।
आ एही सब के चलते हमरा सूरदास जी के ई कविता मन पड़ गइल। आ साथही अइसने एगो अउर कविता के कुछ लाइनो बतावे से रोक नइखीं पावत –
का हो भईया, तोहरा चाहीं, हमरा ना चाहीं ?
संगही पढ़नी संगही खेलनी, संगही कइनी छलछन्दर।
ओतना बतिया हमहूं जानी जतना तुहूं जानऽ।
हमरा पासो पर आफत बा तोहरा बावे चानी,
का हो भईया तोहरा चाहीं हमरा ना चाहीं?मिलल भोज के नेवता तब जब हमनी के बादशाही,
हम चोन्हर बाते में फँसनी तू चभलऽ बलुशाही!
का हो भईया तोहरा चाहीं हमरा ना चाहीं?
अब एह लाइनन के अर्थ बतावे के जरुरत नइखे।

इहो नइखे कि भाजपा में व्यक्तिवाद नइखे। कुछ लोग के ई पसन्द ना होला कि केहू दोसर चैनल तूड़ के सीधे ऊपर बतियावे लागे भा चहुँप बना ले। शहजादो का साथे अइसने भइला के नकारल ना जा सके। अब असल कारण त समय का साथे सामने आ पाई तबले हमनी के तिकवत रहे के बा।
चलत-चलत इहो बतवले जात में हरज नइखे कि शहजाद एक्स (प्रेशन) पर एगो नया प्रोफाइल बनवले बाड़न “khandan karo” का नाम से। रउरो उहे बुझाइल होखी कि ‘खानदान करो’। बाकिर शहजाद कहे चाहत रहलन खण्डन करो आ एकरे के रोमन में लिखला से बात के अर्थ बदलल लागत बा। शब्द के महत्व ओकरा वर्तनियो पर निर्भर करेला। कवनो शब्द कवना तरह से लिखल जाव एह बारे में भोजपुरी वर्तनी पर काम चल रहल बा। भोजपुरी के मानक वर्तनी के कवनो सर्वमान्य रूप मौजूद नइखे। आ हमार कोशिश व्याकरण लिखे भा नियम बनावे के नइखे। हम बस कुछ अनुशंसा करब। मानीं चाहे मत मानीं। नियम बनावे जोग हमरा ना त बेंवत बा ना औकात!


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