लरिकाईं में अतना चोन्हा बा जवानी में ना जाने का करिहें
- टीम अंजोरिया

लरिकाईं में अतना चोन्हा बा जवानी में ना जाने का करिहें

 

एह लेख के लिखे का पीछे एहघरी वायरल हो चुकल भा वायरल होखे का कोशिश में लागल ‘भोजपुरी बवाल’ एगो कारण बा। ओकर ट्रेलर देखनी त मन में आइल कि ‘लरिकाईं में अतना चोन्हा बा त जवानी में का जाने का करिहें?’ जब ट्रेलर में भोजपुरी सब्जी में नीमक भर के बा त पूरा सीरियल में का होखी। बाकिर एकर चरचा हिन्दी अखबारन आ मीडिया में भर गइल बा।

दोसर कारण ई बावे कि हमरा पाठक-पाठिका लोगन के आपन कमेंट करे में लाज लागेला। इहां ले कि हमरा फेसबुक पेजो पर लोग कुछ कहे से बचल चाहेला। एह चलते हम आपन कवनो निष्कर्ष नइखीं निकाल पावत। त सोचनी कि काहे ना एहपर एआई (गूगल असिस्टेंट) से बात कर के देखीं।

अंजोरिया के सवाल –
हम आये दिन देखल करिलें कि भोजपुरी के बात करे वाला भोजपुरियो आपन बात आ काम हिन्दी मे कइल करेलें। नाम रहेला भोजपुरी के बाकिर सब कुछ हिन्दी में। एकरा पीछे के सोच का हो सकेला? आ एह बात के गुण दोष पर राउर राय भोजपुरी में जानल चाहत बानीं।

गूगल असिस्टेंट के जबाब –

रउआ एकदम सही आ व्यावहारिक बात पर ध्यान दियावले बानी। ई समस्या सिर्फ भोजपुरी के ना, बलुक कई गो क्षेत्रीय भाषा-बोलियन के साथ देखल जाला। लोग के मन में भोजपुरी खातिर प्रेम त रहेला, बाकिर व्यवहार में हिंदी आ जाला।

एह व्यवहार के पीछे कई गो सामाजिक, आर्थिक आ ऐतिहासिक कारण बाड़ें:

1. एह सोच के पीछे के मुख्य कारण
रोजगार आ शिक्षा के माध्यम: स्कूल, कॉलेज, कोर्ट-कचहरी आ नौकरी में मुख्य भाषा हिंदी भा अंग्रेजी बा। भोजपुरी में आधिकारिक काम ना होखे के कारण लोग अभ्यास में हिंदी के इस्तेमाल करेला।

मानकीकरण (Standardization) के कमी: भोजपुरी के क्षेत्र बहुत बड़ा बा आ अलग-अलग इलाका में बोली बदल जाला। कवनो एक गो ‘मानक भोजपुरी’ (Standard Bhojpuri) आ व्यापक रूप से प्रचलित लिपि (कैथी के इस्तेमाल अब बहुत कम होला) के अभाव में लोग हिंदी के सर्वमान्य मान लेवेला।

सामाजिक झिझक आ हीनभावना: बहुत समय से समाज में ई सोच पनप गइल बा कि सार्वजनिक मंच भा औपचारिक जगह पर हिंदी बोलल ‘पढ़ल-लिखल’ होखे के निशानी हा, जबकि क्षेत्रीय भाषा के बस घर-परिवार तक सीमित रख दिहल गइल बा।

तकनीक आ डिजिटल माध्यम: इंटरनेट, मोबाइल, आ सोशल मीडिया पर सामग्री लिखे आ पढ़े खातिर हिंदी आ अंग्रेजी बेसी सुलभ बा।

2. एह स्थिति के गुण (सकारात्मक पक्ष)
व्यापक संपर्क (Broader Connection): हिंदी के इस्तेमाल कइला से भोजपुरी भाषी लोग पूरा देश (खासकर पूरा हिंदी पट्टी) के लोग से आसानी से संवाद कर पावेला।

अवसर आ विकास: सरकारी, प्रशासनिक आ व्यावसायिक काम हिंदी में कइला से आर्थिक आ शैक्षणिक रूप से आगे बढ़े में सुविधा होला।

3. एह स्थिति के दोष (नकारात्मक पक्ष)
भाषा के अस्तित्व पर संकट: अगर बोले वाला लोग खुद अपना भाषा के लिखे-पढ़े आ सार्वजनिक काम में इस्तेमाल ना करी, त भाषा धीरे-धीरे कमजोर हो जाई आ आवे वाली पीढ़ी अपना साहित्यिक जड़ से कट जाई।

ठेठ शब्दावली के नुकसान: जब रोजमर्रा के गंभीर काम में हिंदी के इस्तेमाल होई, त भोजपुरी के समृद्ध शब्द गायब हो जाई आ भाषा खाली मनोरंजन भा लोकगीत तक सीमित रह जाई।

मान्यता के मांग में कमजोरी: जब भोजपुरी के विकास आ ओकरा के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करे के मांग करे वाला लोग खुद भोजपुरी में लिखे-बोले से हिचकिचाई, त आंदोलन के गंभीरता पर सवाल उठे लागी।

सार बात: भोजपुरी खातिर प्रेम आ व्यवहार में हिंदी के प्रयोग के पीछे व्यावहारिक मजबूरी आ समाजिक झिझक दुनों बा। भाषा तबहे समृद्ध आ जीवित रही जब ओकर प्रयोग खाली भावनिक मुद्दा ना रहे, बलुक रोजमर्रा के संवाद आ लेखन में भी ले आइल जाव।

एकरा बाद गूगल असिस्टेंट हमरा से पूछलन कि –

रउआ हिसाब से भोजपुरी के रोजमर्रा के काम, बातचीत आ लिखे-पढ़े में बेसी से बेसी इस्तेमाल करे खातिर सबसे पहिला कदम का होखे के चाहीं?

अंजोरिया के जबाब –

भोजपुरियन के चाहीं कि अपना भाषा से प्रेम करो। मानक का अभाव के बहाना बना के अपना भाषा में बोले-बतियावे, लिखे-सुनावे में भोजपुरी के इस्तेमाल करे से शरमाव लोग ना। कमाई करे खातिर भोजपुरी के नाम ले के हिन्दी वाला मीडिया आ सिनेमा अउर संगीत उद्योग भोजपुरियन से कमाई करत बा आ साथही साथे बिना साफ कहले भोजपुरियन में भोजपुरी खातिर हीन भावना पैदा करे में लागल बा। हमनी के चाहीं कि सोशल मीडिया साइट पर आपन बात भोजपुरी में कइल करीं, भलहीं ऊ सामग्री कवनो दोसर भाषा में भोजपुरी से जुड़ल होखे।

तब गूगल असिस्टेट के कहना रहल कि –

रउआ एकदम सही, खरी आ चिंताजनक बात पर अंगुरी धरले बानी। ई समस्या आज के समय में बहुत विकराल रूप ले चुकल बा।

भोजपुरी सिनेमा, संगीत आ सोशल मीडिया के नाम पर जे तरह के सामग्री परोसल जा रहल बा, ऊ भोजपुरी के पहचान आ गौरव बढ़ावे के जगह ओकरा के खाली ‘मनोरंजन’ आ ‘मसाला’ तक सीमित कर देले बा। लोग भोजपुरी से कमाई त करत बा, बाकिर ओकरा के ऊ मान-सम्मान आ गंभीरता देवे से पीछे हट जात बा जेकर ऊ हकदार बा।

रउआ बात के गहराई आ मुख्य बिंदु
व्यापार बनाम सम्मान: सिनेमा आ संगीत उद्योग के लोग भोजपुरी के नाम पर करोड़ों के कमाई कर रहल बा, बाकिर ओकर सामग्री अइसन बा जेकरा से पढ़े-लिखे समाज में हीनभावना आ झिझक अउरी गहरा हो जात बा।

बहाना छोड़े के जरूरत: मानक के कमी या लिपि के अभाव के बहाना बना के आपन भाषा से दूरी बनावल सही ना हा। कवनो भी भाषा तबहे मानक आ समृद्ध बने ले जब ओकर प्रयोग बिना कवनो झिझक के कइल जाव।

डिजिटल दौर में अपनी भाषा के प्रयोग: सोशल मीडिया पर अगर भोजपुरी भाषी लोग आपन बात, विचार, समीक्षा आ चर्चा भोजपुरी में लिखे-बोले लागब, त ओकरा से भाषा के नया जीवन मिली आ इंटरनेट पर भोजपुरी के जगह मजबूत होई।

सच्चाई ई बा: जब तक भोजपुरी बोले वाला लोग खुद अपना भाषा पर गर्व ना करी आ ओकरा के हर मंच पर बेझिझक इस्तेमाल ना करी, तब तक दोसर केहू ओकरा के सम्मान ना दी। भाषा के बचावे के जिम्मेदारी कवनो उद्योग के ना, बलुक ओकरा बोले आ समझें वाला लोग के ही होला।

रउआ ई विचार बहुत प्रेरणादायक बा। सोशल मीडिया पर भोजपुरी के सही रूप में बढ़ावा देवे खातिर का रउआ कवनो खास तरह के अभियान या पहल शुरू करे के सोच रहल बानी?

तब हम बतवनी कि –

धन्यवाद। आज के बातचीत हम अपना वेबसाइट पर डाले जात बानी। (ना चाहीं कि कॉपीराइट वगैरह के जहमत होखे।)

एह पर गूगल असिस्टेट के जबाब रहल कि –

ई बहुत नीमन विचार बा! रउआ एह बातचीत के अपना वेबसाइट पर ज़रूर डाल सकत बानी।

भोजपुरी भाषा, एकर पहचान, आ एह पर हो रहल व्यापारिक प्रभाव पर ई चर्चा सोशल मीडिया आ डिजिटल दुनिया में भोजपुरी भाषी लोग के सोचे पर मजबूर करी आ एक नया दिशा दी।

अगर वेबसाइट पर पोस्ट करे के समय रउआ कवनो शीर्षक (Title) या इंट्रो (Intro/Summary) लिखे में मदद चाहत होखीं, त ज़रूर बताईं।

रउआ एह नीमन पहल खातिर बहुत-बहुत शुभकामना! जय भोजपुरी!

 

(पूरा बातचीत हम बिना कवनो संशोधन के जस के तस अंजोर कर दिहले बानी- असल बातचीत देखेला जेमिनी के लिंक पर क्लिक कर लीं।)

चलत चलत भोजपुरी बवाल के एगो ट्रेलरो परोस देत बानी –

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