बबुआ ना त झूठ बोलेला ना साँच का पजरा जाला
Neither a lie nor the truth
हमरा गाँव के एगो बुढ़वा बबुआ जब ना तब पता ना कवना शहर चल जाला। गाँव में कवनो शादी बिआह होखे कवनो परोजन होखे एहसे ओकरा कवनो मतलब ना होला। आ पहिले से बतइबो ना करे। एन मौका पर पता चलेला कि बबुआ त फेरू कतहीं चल गइल बा। फेर कुछ दिन आ कई बेर त हफ्ता गुजार के लवटेला। बाकिर बतावे ना कहवाँ गइल रहल। केकरा किहाँ गइल रहुवे आ कवना काम से। बस लोग अटकरपचीसा लगावत रहेला कि हो ना हो ऊ फलनवा से भेंट करे गइल होखे। अब ‘फलनवाँ’ कई बेर मुखिया जी के दुश्मन खातिर इस्तेमाल करेला लोग। आ ई ‘फलनवाँ’ बहुते बड़का धनपशु हवे। कहत रहेला कि अगिला बेर त मुखिया जी के धूरा चटवाइए देबे के बा। पूरा गाँव के नोट से छवा दीहि एक मकसद ला। बाकिर एह बीच तीन गो चुनाव गुजर गइल आ मुखिया जी के कुछऊ कबाड़ ना पवलसि फलनवां।

बाकिर जानबे करिलें कि एगो भोजपुरी कहाउत हवे कि – ‘परीकऽ ए बिलार एक दिन खइबऽ मूसर के मार’। कुछ लोग ढुका लाग के पता लगावे के कोशिश हमेशा करत रहेला कि बबुआ के कबो सेन्हे पर धरे के बा। बगल वाला गाँव के एगो आदमी त इहाँ ले दावा करत रहेला कि बबुआ के मेहरारू आ दू गो लरिको बाड़न सँ। बाकिर एकर सबूत आजु ले केहू देखा नइखे पवले। हँ एक बेर टिकट चेकिंग का दौरान ऊ कुछ ड्रग्स का साथे धरा गइल रहुवे। तब पुरनका मुखिया जी आपन पँहुच लगा के ओकरा के रिहा करवलन। कहलन कि गाँव के इज्जत के बाति बा। ठीक बा कि बबुअवा गलत करते ना रहे बोलबो करत रहेला। बाकिर गाँव के इज्जत के सवाल बा। से एह खबर के लुकावल तोपलो जरुरी बा। कहे वाला लोग त इहाँ ले कह देला कि एक बेर मँड़ई पर अपना संघतियन का साथे ऊ एगो कन्यो के भोग लगवले रहुवे। बाकिर कमाल देखीं बबुआ के कुछऊ ना हो सकल आ ऊ कन्या परिवार संगे पता ना कहाँ चल गइल।
बाकिर बूढ़वा बबुआ के एगो अउर खासियत हवे। छाती ठोक के दावा करत रहेला कि ऊ कबहूं झूठ ना बोले। आ ओकरा एह ईमानदारी पर हमहूं खुश हो जानी कि ऊ कबो ई दावा ना करे के ऊ साँच बोलत बा। कवनो जरूरी ना होखे के जवन साँच नइखे तवम झूठ होखे आ जवन झूठ ना होखे तवन साँचो होखे। महाभारत के दौरान एह तरह के एगो उद्घोष के जिकिर हमेशा होत रहेला जब युद्धिष्ठिर का मुँह से कहवा दिहल गइल रहल कि अश्वत्थामा मरा गइल पता ना हाथी कि मनई। आ हाथी भा मनई वाला बात ओकरा बाद के सिंहनाद में दबा दिहल गइल। बात चूंकि युद्धिष्ठिर से कहवावल गइल रहल एहसे ओह बात से महाभारत बदल गइल।
अबकी गाँव के एगो नवही घूमे गइल रहुवे। चिल्का लेक में घूमत घरी ओकरा एगो मोटर बोट पर बूढ़वा बबुआ लउक गइल। बबुआ का साथे एगो जवान औरत आ एगो लरिको रहल। देख के केहू के इहे लागी कि महतारी बाप आ बेटा घूमे निकलल बाड़न। आ ऊ मोबाइल से बबुआ के फोटो खींच लिहलसि आ भर गाँव में बाँट दिहलसि। लोग पूछे लागल कि बबुआ ई त बतावऽ कि ई मेहरारू कवन रहुवे आ साथ में जवन लरिका लउकत रहल से तोहार बटा हवे का? आ रउरा सभे त जानते बानीं कि बबुआ कबो झूठ ना बोले से ऊ एह बात पर कुछऊ नइखे बोलत। बाकिर ओकरा घर के लोग सफाई देत फिरत बा कि ऊ बबुआ के दोस्त के बीबी आ बेटा रहले सँ। कमाल के बात बा नू कि दोस्त अपना बीबी के छूट दे दिहलसि कि जो मजा कर!
अब एहिजे अश्वत्थामा वाला प्रकरण फिट बइठ जात बा। दोस्त के मतलब कहीं महिला दोस्त त नइखे ? ई सवाल सवाले रह जाई काहें कि मुखियो जी ना चाहसु कि बबुअवा के कवनो घेराबन्दी होखो। उनका निकहा मालूम बा कि अगर बबुअवा के कुछ हो गइल त ओकरा घर के लोग खास कर के ओकर बहिनिया आफत ढा दी मुखिया जी खातिर।


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