चले त गाड़ी, नाहीं त हाँड़ी
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-52

आइल भोजपुरिया चिट्ठी

 

चले त गाड़ी, नाहीं त हाँड़ी

आजु काकी आ लभेरन बड़ा गंभीर रहे लोग। पड़ोस के मनराखन चौबे आजुओ दाढ़ी बना के झक-झक कुर्ता-धोती पहिनि के शान बघारत गाँव में निकलेले बाकिर लोग मुँह बनाके कतरी काटि जाले। अतने ना, अपना परिवार का लोगन से अनदेखा कइला आ दिन भर हूले-लेले कइला से नकिया गइल बाड़े। काकी लंबा साँस लेत बोलली- चले त गाड़ी, नाहीं त हाँड़ी।
अतने में उनुकर छोटका नतिया बोललसि- एकर माने का भइल मइया?
काकी लभेरन का ओरि इशारा क दिहली।
लभेरन बतावे शुरू कइले।
एह कहाउत के माने ई हटे कि गाड़ी जब तक चल रहल बिया, तबे तक ऊ गाड़ी बिया। जब ऊ चले लाएक ना रहि जाई त ऊ माटी के हाँड़ी हो जाई, जवन एक बार का उपयोग के बाद बेकार हो जाले। बेवहारो में ईहे लउकऽता। केहूँ जब तक काम लाएक बा, माने परिवार भा समाज खातिर उपयोगी बाटे, तबे तक ओकर भेलू बाटे। एगो गाड़ी के अस्तित्व ओकरा ‘गति’ में होला। जब तक ऊ चलेले, तबे तक मूल्यवान रहेले आ रुकते कबाड़ बनि जाले। ओसहीं आदिमियो के सम्मान, पद भा समाज में स्थिति ओकरा उपयोगिता आ कार्य-क्षमता से जुड़ जाले। जब ऊ कवनो काम के ना रहि जाला त समाज ओकरा के भात रीन्हल ‘हाँड़ी’ नियन फरका क देला।
छोटका के संतोष ना भइल। ऊ कबो हाँड़ी देखलहीं ना रहे, एहसे ऊ परेशान रहे। तब लभेरन ओकरा के गूगल में सर्च क के माटी के हाँड़ी देखवले। ऊ बतवले कि ई तनिको ठोकर लगला पर फूटि जाई आ कवनो काम के ना रहि जाई। एकरा में एक बार कवनो बिंजन रिन्हा गइल त दोबारा बनल भोजन भगवान के भोग ना लागि सके, ऊ जूठ कहाई।
अब लभेरन आपन बात आगे बढ़वले।
एह कहाउत से ईहो पता चलता कि संसार में कवनो सामान होखो भा केहूँ के घमंड, एक दिन सबके खतम होखे के बा। गाड़ी चाहे कतनो कीमती भा मजबूत रहल होखे, हर तरह से खराब हो गइला पर ओकरा के कबाड़ी के बेंचला भा फेंकला का अलावे अउर कवनो उपाय ना बाँचेला। ओइसहीं आदमी के अपना वर्तमान स्थिति, ताकत भा संपत्ति पर ना त इतराए के चाहीं, नु घमंड करे के चाहीं। माने एह स्थिति में सावधान होके अपना बेवहार में बदलाव क लेबे के चाहीं।
काकी कहली- “ना, ठीके कहतार। अउरू कुछ?”
लभेरन कहले- जी काकी। आदमी के अपना के कबो रिटायर ना समुझे के चाहीं। जब तक साँस, तब तक आस। लागल रहे के चाहीं, आपन देंहि चलावत रहे के चाहीं।
आरसी प्रसाद सिंह जी का एगो कविता के लाइन बहुत सही लागेले-
यह जीवन क्या है? निर्झर है,
मस्ती ही इसका पानी है।
सुख दुख के दोनों तीरों से
चल रहा राह मनमानी है।
चलना है, केवल चलना है!
जीवन चलता ही रहता है!
रुक जाना है मर जाना ही,
निर्झर यह झड़ कर कहता है!
काकी कहली- “ई त भइल बड़-बूढ़ खातिर बात। अब हेह लइकन खातिर कुछ बताव। इहनी के का करे के चाहीं?”
लभेरन कहले- बहुत सही सवाल उठवले बानी। विद्यार्थी लोगन के भी एह कहाउत से सीख लेबे के चाहीं। विद्यार्थी लोगन के मुख्य काम हटे ज्ञान अर्जित कइल। ऊहन लोग के रोजाना नियमित रूप से पढ़े के अभ्यास करेके चाहीं। पढ़ाई में ब्रेक भा आलस के माने एके होला कि ऊ लोग ज्ञान का दौड़ में पिछड़ि जइहें। अतने ना, ओह लोगन के एहू बात के ध्यान राखे के चाहीं कि अइसन व्यावहारिक कौशल आ नैतिक आचरण सीखसु, जवना से ऊ लोग जीवन भर ‘उपयोगी’ आ सक्षम बनल रहसु।
चाहे विद्यार्थी होखे भा सामान्य आदमी- सभके अपना के लगातार कर्मशील आ अपडेट बनवले राखे के चाहीं, अपना कौशल के तरासत रहे के चाहीं अउर आलस्य आ अकर्मण्यता से बाँचे के चाहीं। जो केहूँ एकर ध्यान ना राखी त समाज आ समय ओकरा के चूल्हा से उतारल ‘हाँड़ी’ नियन अप्रासंगिक मानिके फरका घसका दी। पद, प्रतिष्ठा आ संपत्ति पर घमंड एगो टाइमे तक रहि पावेला, बाद में ओकर भेलू ना रहि जाला, बस बूझीं कि ऊ कउड़ी के तीन हो जाला।
संस्कृत के एगो प्रसिद्ध सुभाषित बाटे-
यावत् वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥
माने, जब तक आदमी कमाए जोग रहेला, परिवारो ओकरा से प्रेम करेला, आदर देला, देंहि थकला पर घरो में केहूँ ना पूछेला। लोको में कहल गइल बा कि काम के बेरा सभे सगा, काम गइल त केहूँ ना। ई कहाउत एकदम यथार्थवादी बिया। संसार में सम्मान स्थायी ना होला, ऊ हमेशा उपयोगिता से जुड़ल होला। आज का युग में नया भाषा, नया तकनीक, नया ज्ञान आ नया कौशल सीखल बहुत जरूरी बा। जे सीखल बन्न क दी, ऊ धीरे-धीरे आउटडेटेड हो जाई। दोसर बात ई कि गाड़ी खाली इंजन से ना चलेले, ओकरा मए पुर्जन के सही रहल जरूरी बा। माने मनुष्य के शरीर, बुद्धि, चरित्र आ बेवहार- सभे स्वस्थ रहे के चाहीं।

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