सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-49
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
लइकन के छुई-मुई जनि बनाईं

काकी टीवी पर जबसे मुख्यमंत्री योगी जी के भाषण सुनले रही, लभेरन के फोन क के नकिया देले रही कि जलदी आव। लभेरन के दुआर पर पहुँचते शुरू हो गइली- चलऽ अब नीमन हो गइल। एगो माइक आ कैमरा लेके जबे ना तबे कुछ ढेर हुँसियार लोग स्कूल में पहुँच जात रहले हा आ मास्टर लोग के अपमानित करत-करावत रहले हा कि ई लो स्कूल में लइकन से काम करवावत बाड़न। अब सभकर मुँह बन्न। योगी जी के कहनाम बा कि अइसना शिक्षकन के त सम्मानित करे के चाहीं। स्कूल में लइकन से कबो-कबो काम करवावल जरूरी बा। तबे त ऊ सामाजिक सरोकार के भी समुझिहें सन। अब तूँ ही बतावऽ! मास्टर लोगन के परान त साँसत में परि गइल रहल हा। का बोलसु लोग, का पढ़ावसु लोग, कब के धमकि जाई आ का पूछे लागी- एकर कवनो सीमे नइखे। ऑन कैमरा मुँह से जो कुछ उल्टा-सीधा निकलि गइल त एगो अलगा से आफति…नोकरियो खतरा में। अब बेचारे ओहू लोग के राहत मिलल होई।
लभेरन कहले- “भारतीय कानून का ओरि से बच्चन से शैक्षिक, स्वैच्छिक अउर सुरक्षित गतिविधि करावे में कहाँ रोक बाटे? अपना कक्षा के व्यवस्थित राखल, आपन मेज-कुर्सी साफ कइल, पौधारोपण भा बागवानी में भाग लिहल, स्वच्छता अभियान में सहभागी बनल भा सामूहिक गतिविधियन में सहयोग कइल बाल श्रम में ना आवे। एह तरह का गतिविधि के उद्देश्य त लइकन में अनुशासन, जिम्मेदारी, सहयोग आ सामाजिकता के विकसित कइल होला। ई अपराध थोरे हउवे?
काकी कहली- “पहिले हमनी का स्कूल में सफाई ना करत रहलीं हा जा? सनीचर के त गोबर से लीपत रहलीं हा जा। जो बच्चा अपना कक्षा के सफाई खुदे झाड़ू से क लिहें सन त ऊ कानूनी रूप से गलत हो जाई?”
लभेरन कहले– ना। हर स्थिति में गलत ना होई। गलत आ सही एह बात पर निर्भर करऽता कि झाड़ू लगवावे के उद्देश्य, तरीका आ परिस्थिति का बाटे। जो लइका अपना कक्षा का साफ-सफाई में अपना इच्छा से आ शिक्षण गतिविधि का रूप में भाग लेतारे सन, एहमें सभ बच्चा समान रूप से भाग लेतारे सन, ई कभी-कभार आ बहुत कम समय खातिर होता, एकरा से उहनी के गरिमा, सुरक्षा भा पढ़ाई प्रभावित नइखे होत, त एकरा के अनुशासन, जिम्मेदारी अउर सामूहिक सहभागिता के गतिविधि मानल जा सकत बा। बाकिर जो स्कूल लइकन से रोजे झाड़ू लगवावता, सफाई कर्मचारी वाला काम लइकन से करवावतता भा खाली कुछ खास जाति, वर्ग भा लिंग वाला बच्चन से सफाई करवावत बा भा बच्चा का इच्छा के विरुद्ध भा दंड का रूप में सफाई करवावत बा त ई कानूनी आ नैतिक- दूनों दृष्टि से आपत्तिजनक बाटे आ ई निस्चे बाल अधिकार का विरुद्ध मानल जाई।
देखीं, एहिजा सहभागिता आ श्रम का अंतर के समुझे के परी। मान लीं कि सप्ताह में एक बार पूरा कक्षा के लइका 5–10 मिनट आपन डेस्क व्यवस्थित करतारे सन आ फर्श पर गिरल कागज़ उठा लेतारे सन त एकरा पर कवनो आपत्ति ना होखे के चाहीं, ई सहभागिता हटे। बाकिर, जो स्कूल रोज बच्चन से पूरा कक्षा में झाड़ू लगवा के सफाई कर्मचारी के जिम्मेदारी उहनी से पूरा करावे, त ई बिल्कुल उचित ना कहाई। ई बाल श्रम में आ जाई। एकरा से विद्यालय प्रबंधन के बाँचे के चाहीं।
काकी कहली- का कइल जाउ? आजु-काल्हु के गर्जियनो त बात-बात पर टीचर प कंप्लेन करे खातिर तेआर रहतारन। ओह लोगन के चिंता बा कि हमनी का रोज-रोज यूनिफॉर्म चकाचक क के देतानी जा आ लइका जब घर आवतारन स त पूरा लेटा के आवतारन स।
लभेरन टोकले- लइकन के तनी बाहर का वातावरन में त छोड़हीं के परी। खाली साफ-सफाई आ एसी वाला कमरा में रहला प बाद में बाहर का दुनिया के फेस कइल कठिन हो जाई। हम त सभ से ईहे कहबि कि लइकन के छुई-मुई जनि बनाईं।
त का कइल जाउ? लइकन के धूरि-माटी में खेले खातिर छोड़ि दिहल जाउ?
ना, हम ई कहाँ कहतानी? विश्व स्वास्थ्य संगठन कबो नइखे कहले कि बच्चन के हमेशा ‘कीटाणुरहित’ भा बहुते साफ वातावरण में राखल जाउ। ओकर कहनाम बा कि लइकन के बाहर खेलल, माटी, पेड़-पौधा अउर प्राकृतिक वातावरण का संपर्क में आइल उहनी खातिर फायदामंद बा। एकरा से जहँवा शारीरिक गतिविधि बढ़ी, ओहिजे मानसिक स्वास्थ्य भी नीमन होई। अतने ना उहनी का मन में प्राकृतिक वातावरण से जुड़ाव विकसित होई। एकरा से सामान्य तौर पर इम्मून सिस्टम भी विकसित हो सकत बा, बाकिर एकर मतलब ई तनिको नइखे कि जतने गंदगी में लोटल जाई ओतने अधिका प्रतिरोधक शक्ति बढ़ी, ई गलत होई। ओकर त ईहो कहनाम बा कि हाथ धोअल, स्वच्छ पानी, साफ शौचालय आ सुरक्षित भोजन बहुत जरूरी बा। बच्चन के गंदा पानी, जहरीला पदार्थ भा संक्रमण का उच्च जोखिम वाला वातावरण से बँचावे के चाहीं। WHO के संदेश सीधे-सीधे संतुलन वाला बाटे। ना त बच्चन के घर में बन्न राखीं, नु अस्वच्छ भा असुरक्षित परिस्थिति में छोड़ीं।
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