रसरी रसरी मिल के होला बड़ मजगूत रसरिया हो
A_Behavioural_Study_of_Bhojpurias
इंटरनेट पर भोजपुरी के पहिलका डेग धरे वाला वेबसाइट अंजोरिया के प्रकाशक होखला का नाते अपना अनुभव से हम बहुते निराश रहेनी। भोजपुरी के बड़हन बड़हन विद्वानन से निहोरा कर के थाक गइनी बाकिर केहू का लगे समय नइखे कि ऊ भोजपुरी के एगो मानक वर्तनी बनावे का कोशिश में शामिल हो सकसु। परिणाम ई बा कि जेकरे जइसे मन करत बा तइसे भोजपुरी लिख रहल बा भा अपना हिन्दी रचना के भोजपुरिया के परोस दे रहल बा. एहिजा ई रेघरियावल बहुत जरुरी बा कि कवनो दोसरा भाषा में लिखलका के भोजपुरी में उल्था भा अनुवाद कइला में आ ओकरा के भोजपुरिया दिहला में बहुते अन्तर होला।

अनुवाद स्वागतजोग होला आ एकरा के बढ़ावा देबे के चाहीं कि हर विधा में भोजपुरी के रचना – मौलिक ना सही त अनुवादे सही – मिलल करे। प्यार मोहब्बत के चरचा, खेत-खरिहान पर लिखल, कवितई, गीत-गवनई भोजपुरी के जियवले त राख सकेला बाकिर एकरा के आधुनिक युग का नवहियन जोग बनावे में सहायता ना करि सके।
एकरा से पहिले कि हम समाधान के सोचीं आईं पहिले ई त जान लीहल जाव कि समस्या का बा। भोजपुरी के सबले बड़ समस्या अपना के बहुते बड़हन आ दोसरा के नालायक समुझल बावे। एगो भोजपुरिया दोसरा भोजपुरिया के बड़ाई तबले ना करि सके जबले ऊ उनुकर बड़ाई ना कइले होखे। तू हमार पीठ थपथपावऽ हम तोहार पीठ थपथपा देब। तू हमरा के सम्मानित करऽ हम तोहरा के सम्मानित कर देब। ई लेनदेन वाला बीमारी भोजपुरी के स्वास्थ्य बिगाड़ रहल बा। पोखरी में मछरी तबले नव नव कुटिया बखरा लगावे वाला मैदान में आ गइल बाड़ें।
जब अंजोरिया डॉटकॉम शुरु कइले रहीं तब कवनो दोसर वेबसाइट भोजपुरी में ना रहुवे। भाषा आ व्याकरण से भवह-भसुर के नाता रहला का चलते हमरा पते ना चले कि का सही बा आ का गलत। तब एगो पुरनिया से सलाह मिलल कि जवन बोलेलऽ तवने के लिखे के आदत डाल लऽ, बहुत हद ले काम निकल जाई। बाकिर अगर हम गलते बोलत होखीं त गलते नू लिखब आ तब गलते के बढ़ावा देत जाएब।
अंजोरिया डॉटकॉम के प्रकाशन का शुरुआत में हिन्दी के फॉण्ट सुलभ ना रहुवे। जे लिखनिहार रहे सेकरा टाइप करे ना आवत रहे आ जे टाइप करे ओकरा ला लिखल मुश्किल रहल। वेबसाइट पर त कुछ उपाय निकालल संभव रहुवे बाकिर पत्रिका आ किताब लिखेवालन का सामने बड़का मुसीबत रहल। टाइपिस्ट गलती पर गलती करत जाव आ ओकरा के समुझावल बहुते मुश्किल होखल करे कि भोजपुरी में सही कइसे लिखल जाला। तबहियों भोजपुरी में पत्रिका छपत रहली सँ आ किताब प्रकाशित होखत रही सँ। अक्सरहां जे लिखे ओकरे छपवाहूं के पड़े। आ खरीद के पत्रिका भा किताब पढ़ला के त सपनो देखल मुश्किल रहुवे। अबहियों हालात वइसने बा। भोजपुरी के कवनो लिखनिहार से पूछ लीं कि ओकरा कतना परेशानी आइल आपन किताब छपवावे में। तब का मुकाबले अब कुछ आसान हो गइल बा छापल-छपवावल। ह्वाट्सअप आ फेसबुक पर देवनागरी मे लिखे के सुविधा हो गइला का चलते बहुते आसानी हो गइल बा। वेबसाइट ला वरदान बन के आइल यूनिकोड फॉण्ट। अब ई ना सोचे के पड़े कि पढ़े वाला का कंप्यूटर पर देवनागरी के फॉण्ट बा कि ना? बा त कवन फॉण्ट? हँ कीबोर्ड जरुर कइ तरह के बाड़ी सँ जवना चलते एक तरह का कीबोर्ड पर काम करे वाला दोसरा की बोर्ड पर काम ना कर पावे।
आ भोजपुरी के सबले बड़का समस्या बा कि एहिजा दोसरा के बरदाश्त करे के सुभावे नइखे, प्रशंसा कइल त दूर के बाति बा। सगरी लिखनिहार एह घरी फेसबुक पर बूके में व्यस्त रहेलें। बिना ई सोचले कि जवन आजु पोस्ट कइनी तवन कुछ दिन बाद केहू के कइसे मिली। लमहर लमहर पॉडकॉस्ट हो रहल बाड़ी सँ बिना एह बात के धेयान रखले कि आजु का जमाना में ढेरदेर ले एके जगहा पर पाठक-पाठिका के रोकल बहुते मुश्किल बा। अधिकतर लोग रील देखे आ देखावे में व्यस्त बा। अपना के बड़का लिखनिहार समुझे-मानेवाल कवनो लिखनिहार दोसरा का वॉल पर कुछ बढ़िया लिखे से परहेज करेलें। आ छोटका लिखनिहारन के त केहू पूछनिहारे नइखे।
भोजपुरी के कुछ ग्रुप ह्वाट्सअप पर अइली सँ आ कुछ में हम शामिलो भइनी। बाकिर टीक कतहीं ना पवनी। कारण कि हर ग्रुप का पीछे कवनो ना कवनो बड़का धनपशु के मौजूदगी रहुवे। उनुका बरदाश्ते ना होखे कि केहू उनुकर आशीर्वाद मंगले बिना कुछ लिख कइसे लेत बा। अधिकतर जगहा से हमार पोस्ट एडमिन का तरफ से डिलीट कर दीहल गइल आ एक बेर जहाँ डिलीट हो गइल तहवां टीकल मन माने ना।
तेइस बरीस के अपना प्रकाशन कार्य में दावा से कह सकीलें कि कवनो लिखनिहार के कबो निराश नइखीं कइले। जेकर रचना आइल सभकर प्रकाशन कइनीं। जबले फिलिमन से जुड़ल सामग्री मिलत रहल तबले त रोज कुछ ना कुछ अंजोर हो जाइल करे। बाकिर जब फिलिमन के बहाव थिराए लागल त नया रचनन के अकाल पड़े लागल। कई बेर निहोरा कइला का बादो जब महान लिखनिहारन के आशीर्वाद ना मिलल त मजबूरन कुछ दोसरे तरह के सामग्री अजोर करे लगनी। बाकिर अधिकतर आगन्तुक त एगो चुमा दिहले जइह हो करेजवू भा लगावेलू जब लिपस्टिक जइसन गाना सुने आवेलें। उनुका पसन्दे ना आवे कि कवनो बढ़िया रचना पढ़े के कष्ट करीं।
इहो देखले बानी कि जिनकर रचना अंजोरिया पर अंजोर होखेला उहो दोसरा के रचना देखे के समय ना निकाल पावसु। कवनो रचना पर आपन प्रतिक्रिया दीहल त दूर के बाति बा। हर बेर कमेंट डिसएबल करे के पड़ जाला काहें कि काम वाला टिप्पणी आवे भा ना बाकिर स्पैमरन के दर्जन भर कमेंट जरुर आ जाई। अब लागल रहऽ ओहनी के डिलीट करे में।
पता ना अबहीं ले कवनो शोध एह विषय पर भइल बा कि ना कि भोजपुरियन के सुभाव आ पसन्द का बा। A Behavioural Study of Bhojpurias जइसन विषय पर शोध होखे के चाहीं। पता त लागो कि का चाहत बा लोग आ जवन चाहत बा तवना का पाछा कारण का बा।
हमरा लागत बा कि समस्या के चरचा त हो गइल बाकिर अब समाधानो के चरचा होखे के चाहीं।
धारावाहिक रुप में भोजपुरी के तीन चार गो उपन्यास अजोर कइला का बाद अब धारावाहिक रूप से एही पर काम शुरु करे जात बानी। अगिला लेख में कोशिश करब कि A Behavioural Study of Bhojpurias पर कुछ लिखे के कोशिश करीं। जानत बानी कि रउरा लगे समय के बहुते कमी बा बाकिर कबो कबो एनियो एक नजर डाल लीहल करीं।
आखिर में आजु के मथैला पर। बहुत पहिले एगो कविता पढ़ले रहीं – रसरी रसरी मिल के होले बड़ मजगूत रसरिया हो। आजु इयाद नइखे पड़त कि केकर कविता रहल, कवना पत्रिका में छपल रहल. अगर रउऱा इयाद होखे त बतावे के कृपा करब। कई धागन के मिला के जवन रसरी बनेला तवन बड़ मजगूत होखेला। अगर हर भोजपुरिया आपना निजी राग-द्वेष भुला के भोजपुरी खातिर सोचे काम करे के एकाधो घंटा निकाल लेव त बहुते काम हो सकेला।
एकाध गो प्रकाशक लोगन से बात कर रहल बानी कि उनुकर प्रकाशित किताबन के अंजोरिया के पाठक-पाठिका ला छूट का साथे आ डाकखर्च का बिना उपलब्ध करावल जा सके। अगर रउरो कवनो भोजपुरी किताब प्रकाशित कइले बानी त ओकरा बारे में जानकारी साझा करीं। किताब के कवर, लेखक/लेखिका के नाम, प्रकाशन के साल, किताब के दाम, कतना छूट दे सकीलें वगैरह के जानकारी दे दीं त बहुते बढ़िया होखी। एह काम ला अंजोरिया के कवनो कमीशन नइखे देबे के। जवब छूट दे सकीलें सीधे गाहक के दे दीं। कवनो तरह के चरचा भा सुझाव ला anjoria@rediffmail.com पर आपन ईमेल भेज दींं।


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