नया लूगा नव दिन, लुगरी बरिस दिन
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-48

आइल भोजपुरिया चिट्ठी

नया लूगा नव दिन, लुगरी बरिस दिन

आजु काकी के छोटका नतिया मुँह फुलवले रहे। लभेरन से ना रहाइल त पूछि दिहले काकी से कि का बात बा, जे छोटकू बबुआ आजु रूसल बाड़े। काकी बतवली कि इनकर बाबूजी इनका जन्म-दिन पर इनका मन लाएक एगो उपहार भेजले बाड़े- साइकिल। काल्ह दुपहरिए से ई साइकिल का सेवा में लागल बाड़े। ई एह बात के ध्यान जादे राखत बाड़े कि उनुका साइकिल से केहूँ सटो जनि, केहूँ छूओ जनि आ बड़का बा कि रहि-रहि के छू आवता। अतने पर ई रीघि जातरे।

 

लभेरन कहले- “नया-नया पर मए लइकन के अइसहीं मोह लागेला। हमनियो के अपना नया बतुस के मोह लागी बाकिर ऊ कुछे दिन चली, फेरु त दोस्त मित्रन में साझा होखे लागी।”

काकी कहली- “ई जे मुँह फुलाइ के बइठल बाड़े, कइ दिन अइसहीं जोगाइ के रखिहें? नया लूगा नव दिन, लुगरी बरिस दिन। फेरु त आपस में अइसे मिलि के खेली-कूदी लोग कि मए मोह भंग हो जाई।”

तब ले बड़का नतिया पूछि दिहलसि- “मइया, एह कहाउत के माने का भइल?” काकी लभेरन ओरि मुस्कात तिकवली। लभेरन बूझि गइले आ बतावे शुरू कइले –
“नया लूगा माने नया साड़ी आ लुगरी माने बहुत पुरानी साड़ी, जवन रफ इस्तमाल में होले। एकर माने ई भइल कि नया वतुस का प्रति आकर्षण आ ओकर बँचा-बँचा के उपयोग बहुत कमे समय खातिर होला। कुछे दिन बाद ऊहो पुरान होइ के सामान्य उपयोग में आ जाले।”

काकी टोकली- “लइकन के तनी कहानी सुना के समुझाव।”

लभेरन आगे बतावे लगले- “एगो खीसा कहाला कि एगो गाँव में एगो किसान तीज पर अपना मेहरारू के पहिने खातिर एगो नया साड़ी किनलसि। मेहरारू के त जमीन प पाँवे ना परत रहे। तीज का, ऊ छठि में आ बिआहो-शादी में खूब पहिनि के झमकवलसि। साड़ियो अइसन रहे कि जे देखे त देखते रहि जाइ। ओह साड़ी के बड़ाई के ना कइल! समय बीतल आ मोहल्ला में अउरियो मेहरारुन के मरद नया साड़ी खरीद के ले अइले सन आ ओकरा आगा इनका साड़ी के चर्चा बन्न हो गइल, काहें कि अब ऊ नया ना रहि गइल रहे। अब त ऊ ओह साड़ी के कवनो खास अवसर का जगहा अनदीनो पहिरे लगली। कुछ दिन बाद ओह साड़ी के रंग फीका परे लागल। ओकरा पाढ़ि के तार-तार निकलि गइल आ ऊ अब लुगरी बनि गइलि। अब त ऊहे लुगरी रसोई आ आङन से लेके खेत-बधारि अउर गाइ-भइँसि के सानी गोतला तक का घर के सभे काम में आवे लागलि। छव महीना बाद ओकर ननदि ससुरारी से अइली। ऊहो ओह साड़ी के बहुत बखान सुनले रहली। ऊ जिद करे लगली देखावे खातिर- देखाव ना भउजी ऊ सड़िया!

तब भउजी मुस्कुरात कहली- “नया लूगा नव दिन, लुगरी बरिस दिन। अब ऊ लूगा से लुगरी हो गइल बा। हमनी का भीरी अतना सारी थोरे बा कि ओकरा के जोगा के राखबि जा।”
बहुरिया के ई बात सासुओ जी के अतना सटीक लागल कि ऊ धीरे-धीरे पूरा गाँव में फइल गइल आ देखते-देखत कहाउत बनि गइल।”

काकी कहली कि अब त लइकन के लूगो के माने बतावे के परत बा। आजु का समय में एह कहाउत के का भेलू बड़ुए?

तब लभेरन कहले- “अइसे जनि कहीं काकी! आजु लूगा भलहीं साड़ी हो गइल बाकिर लोगन के सोचे-समुझे के तरीका ना नू बदलि गइल? सैकड़न बरिस से चलत कहाउत आपन अरथ थोरहीं खतम क दिहें सन। समय का साथ-साथ उहनियो के संदर्भ बदली आ कहाउत के प्रासंगिकता बनले रही, बस हमनी के ओकर माने बतावत रहे के परी। जो एह कहाउत के खाली नया साड़ी आ पुरान साड़ी का कहानी तक सीमित क दिहल जाई त लइकन के एकरा से का मिली? हमनी के चाहीं कि एकरा पीछे जवन लोकबुद्धि बा, ओकरा के स्पष्ट कइल जाउ। लइकन के एकरा से बहुत सीख मिल सकत बा।

एह कहाउत से ईहो सीख मिलत बा कि खाली नया भइला से कवनो सामान के कीमत निश्चित ना होखे। एकरा सङे ईहो कि अपना चीजन के सँभारि के राखल जाई त ऊ ढेर दिन तक काम में आ सकतिया। आजु के उपभोक्तावाद बार-बार नया खरीदे के आदत लगावे का पक्ष में बा बाकिर ई कहाउत ओकरा खिलाफ संतुलित दृष्टि देत बिया। आजु का संदर्भ में एकरा के Reduce, Reuse, Recycle का भावना से भी जोड़ल जा सकत बा। मतलब, संसाधन के सदुपयोग का पक्ष में बिया ई कहाउत।

काकी कहली- “चलऽ ठीक बा। बाकिर जो आजु के लइका एह कहाउत के अर्थ ई निकाल ल सन कि नया चीज खरीदले बेकार बा, तब का होई?”

लभेरन कहले- “तब त तनिको सही ना होई, संदेसे गलत चलि जाई। एकरा से जवन सही सीख मिली, ऊ ईहे कि नया बतुस लिहल गलत ना होखे, बाकिर खाली नयापन देखिके कवनो चीज का कीमत के अंदाज ना लगावे के चाहीं। जवन सामान पुरान, उपयोगी अउर टिकाऊ बा, ओकरो सम्मान करे के चाहीं।

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