संघतिये जब घात करे लागे : आधुनिकता के आड़ में बिलात संस्कार
- टीम अंजोरिया

संघतिये जब घात करे लागे : आधुनिकता के आड़ में बिलात संस्कार

आज के आधुनिक ज़माना में रोजे अखबार भा टीवी पर लैंगिक समानता (Gender Equality) आ महिला अधिकारन के बड़-बड़ बात सुने के मिल जाला। बाकिर पिछला चार-पाँच साल का दौरान कुछ अइसन खौफनाक घटना सामने आइल बाड़ी सँ, जवना से समाज के मति मरा गइल लउकत बा। कलयुग के अइसन रंग लउकत बा जहाँ कवनो स्त्री अपन पति, लिव-इन पार्टनर भा मंगेतर के जान के दुश्मन बन जात बिया। एकरे से सवाल उठत बा कि आधुनिकता का आड़ में विलात संस्कारन का चलते अब संघतिये घात करे लागल बा़ी सँ। अइसन घटनन के महज साधारण अपराध ना मान के एकरा के हमनीं के सदियन पुरान पारिवारिक संस्था आ पवित्र विवाह परंपरा पर बहुत बड़ संकट का रूप में देखे चाहीं।

आईं, समाज के झकझोरे वाली अइसन घटनान के उदाहरण का साथे एह संकट आ एकरा समाधान पर विचार कइल जाव:

हमेशा औरतने के पीड़ित माने वाला गलतफहमी

अगर रउरो मन में कवनो गलतफहमी होखे कि हमेशा – हमार जोर हमेशा पर बा – औरते लड़िकी पीड़ित होली सँ, त एकरा के निकाल दीं। मरदे मानुष औरतन का खिलाफ शारीरिक हिंसा आ मानसिक उत्पीड़न करत रहेलें आ औरतन के अइसनका उत्पीड़न से संरक्षण मिले के चाहीं। हाल फिलहाल में कई गो अइसन वारदात सामने आइल बा जहवां कवनो औरत अपना पति / लिव-इन पार्टनर / मंगेतर के दर्दनाक मौत दे दिहलसि. सबले हाल के घटना में एगो लड़िकी अपना मंगेतर के गहिर खाई में एह चलते गिरवा दिहलसि कि ऊ हकलात रहुवे आ गंजा रहुवे।

जेकरा साथे जनम जनमान्तर के संबंध बनावे के बात होत रहुवे संघतिया बनि के ओकरे घात क दीहल जात बा। दिमाग पर जोर डलला का बावजूद कवनो अइसन घटना इयाद नइखे पड़त जवना में कवनो मरद कवनो औरत के एह तरह से हत्या कइले-करवले होखे। हँ लव जिहाद वाली जोड़ियन में अइसनका वारदात कई बेर सामने आइल बा। बाकिर हमार लेख भातरीय परिवार के सस्था आ भारतीय संस्कृति पर केन्द्रित बा। दोसरा संस्कृतियन के घटना एह लेख के हिस्सा नइखे बनावे जोग।

विवाह परंपरा आ पारिवारिक संस्था पर आइल संकट

एह सब वारदातन का पीछे हमनीं के सामाजिक ढाँचा के टूटन बा। ‘हम’ का जगहा ‘मैं’ के अहंकार बा। विषयांतर का तौर पर बतावल चाहत बानी कि शायद एही चलते भोजपुरी में ‘मैं’ होखबे ना करे। भोजपुरी में हमेशा ‘हम’ के बात होला भा ‘हमहन’ आ ‘हमनी’ के। अइसने आधुनिकता के गलत मतलब निकालत DINK (Double Income No Child) के प्रचलन देखे के मिलत बा। आज के पीढ़ी में सहनशीलता खतम हो गइल बा। जब बाल बच्चा करहीं के नइखे त घर परिवार बनवला के जरुरते का बा? विवाह कवनो व्यापार भा कन्ट्रेक्ट ना होला। कम से कम हिन्दू परिवारन में। ई दू गो परिवारन के मिलन होला। बाकिर आज विवाह संस्था अहंकार के भेंट चढ़ रहल बिया।

सोशल मीडिया आ दिखावा के जिनगी

रील आ सोशल मीडिया के नकली चकाचौंध देख के लोग अपना असली जिनगी के साथी से अतना बेसी उम्मीद पाल लेता, आ जब ई पूरा होखत नइखे लउकत त एकर आपराधिक अंतो करे में हिचकिचाहट नइखे लउकत। पहिले जब विवाह के फैसला परिवार के बड़-बूढ़ लेत रहलन तब पारिवारिक पृष्ठभूमि पर जोर रहत रहुवे। आ ‘बाँसगांव के मुनमुन’ में आइल ई अंश दोहरावे के मन कर जाता –

बाकिर बिआह के जवन बाजार सजल रहल तवना में मुनमुन फिटे ना हो पावत रहुवे. इंजीनियर लड़िका ला इंजीनियरे लड़की चाहत रहे. डाक्टर ला डाक्टरे लड़की के मांग होखे. केहू एम.सी.ए. लड़की मांगे त केहू एम.बी.ए.. आ इंगलिश मीडियम त सभका चाहते रहे. आ एने मुनमुन में एहमें से कुछऊ ना रहल. दहेजो विकराले मंगाव. लागे कि केहू धरती से आसमान के दूरी नापत होखो, दहेज के मपना अइसने रहल. मुनक्का राय कहसु ‘जस-जस सुरसा बदन बढ़ावा तास दुगुन कपि रूप दिखावा/सोरह योजन मुख ते थयऊ तुरत पवनसुत बत्तीस भयऊ.’ ऊ कहसु, ‘हे गोस्वामी जी रउरा त सोरह योजन के सुरसा का आगा पवन सुत के तुरते बत्तीस के बना दिहनी बाकिज हम एह दहेज के सुरसा का आगे कहां से दुगुन रूप देखाईं ? आ कहां से ले आईं इंगलिश मीडियम, इंजीनियर, डाक्टर, एम.सी.ए., एम.बी.ए.?’

पारिवारिक मध्यस्थता (Family Mediation) के अंत

पहिले घरे-परिवारन में कवनो विवाद होखत रहे त घर के बुजुर्ग लोग बइठ के बात सम्हार लेत रहे। आज ‘न्यूक्लियर फैमिली’ (छोट परिवार) के चक्कर में बुजुर्गन के सलाह बिला गइल बा, आ बात सीधे थाना-कोर्ट ले पहुँच जात बिया।

औरतन के लैंगिक समानता के बात लैंगिक अधिकई में बदलल जा रहल बा। देश के अदालतो जब तब कुछ अइसन फैसला दे देबेली सँ जवना से हालात अउरी बिगड़ल जात बा। दू महीना के शादी का बाद तलाक हो गइल। आ डेढ़ लाख महीना कमाए वाली महिला के गुजारा भत्ता का रूप में साठ हजार कमाए वाला मरद के सजा सुना दीहल जात बा। फेमिली कोर्ट के एगो अइसने फैसला आजु एक्सप्रेशन पर – पुरनका ट्वीटर पर -वायरल बनल बा। कर्नाटक हाई कोर्ट एह फैसला के रद्द कर दिहलसि। बाकिर का सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के फैसला बा बदल ली के कह सकत बा?

जवना खातिर अलगा भइनी तवने मिलल बखरा

पहिले का समय में अधिकतर मामिलन में पुरुष पक्ष महिला पक्ष पर अन्याय आ उत्पीड़न करत मिलत रहुवे से कई गो अइसन कानून बना दीहल गइल जवना से हालात सुधरे का जगहा अउरी बिगड़ गइल। दहेज हत्या, पारिवारिक हिंसा वगैरह का आड़ में कुछ अइसन कानून बन गइल जवना से भोजपुरी के ई कहाउत साँच हो जात बा कि – कवना खातिर अलगा भइनी तवने मिलल बखरा। अदालतन के पश्चिमी सभ्यता आ संस्कृति के प्रभाव में अइला बिना भारतीय परंपरा का आधार पर फैसला देबे के चाहीं। दुर्भाग्य से हमनी के बहुते न्यायाधीश विदेशी विश्वविद्यालयन से शिक्षा ग्रहण कर के आइल बाड़ें आ अइसनका जज लोग के सहज लागेला कि हमेशा औरतन का पक्ष में झुकल लउकस। ना त उनुका आधुनिक होखला पर संदेह होखे लागी।

अदालती फैसला में अनावश्यक झुकाव

कानून बनावल गइल रहे औरतन के सुरक्षा खातिर, बाकिर अब ई कुछ शातिर लोगन खातिर पुरुषन के प्रताड़ित करे के हथियार बन गइल बा। ‘लिव-इन’ आ भरण-पोषण (Alimony) के अजबे गजब फैसला सुने के मिल जाला। आ अइसने फैसलन का चलते कुछ आधुनिक विचार राखे वाली महिला एकरा के धंधा बनवले जात बाड़ी सँ। कुछ रात संगे रहला का एवज में भर जिनिगी के पेंशन के इंतजाम कर लेत बाड़ी सँ।

‘महिला कार्ड’ खेल के मरदन पर मानसिक क्रूरता के अनेके उदाहरण मिल जाई। दहेज वाला केस चला के कई बेर मरदन के जिनिगी तबाह क दीहल जात बा। हालत अइसन बनल जात बा कि लड़िका सब अब बिॅह का नामे से घबराए लागल बाड़ें। ओहनी के लागत बा कि अमूल दूध के पैकेट जब सहज भाव से उपलब्ध बा त भईंस पोसे के जरूरत का बा? कुछ दिन संगे रहला का एवज में भर जिनगी ‘maintenance’ दिहला से नीमन आ सस्ता होखी कि ‘थाई’लैंड घूम आईल जाव। पुरुषन में डिप्रेशन आ आत्महत्या के बाढ़ आ गइल बा। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आँकड़ा गवाह बा कि पारिवारिक कलह आ झूठा केस का चलते आत्महत्या करे वाला शादीशुदा पुरुषन के संख्या महिला लोग से दुगुना हो गइल बा।

ई लेख रउरा एकतरफा लाग सकेला बाकिर एहिजा एक पक्ष के बात कहि के दोसरा पक्ष के बात सुने के मनसो बा। अलग बाति बा कि रउरा सभे आपन राय-विचार साझा करे में सकुचा जानी कि कहीं राउर अमूल्य विचार जगजाहिर मत हो जाव। स्पैमर्स से परेशान होके अंजोरिया पर छपल लेखन पर टिप्पणी कइल रोक दीहल गइल बा। बाकिर अगर रउरा कुछ कहे के बा त anjoria@rediffmail.com पर ईमेल कर के आपन राय निश्चिन्त भाव से भेज सकीलें। कोशिश रही कि जतना जल्दी हो सके ओह राय के एह लेख का साथे जोड़ दीहल जाव।

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