खाली उपदेश से कुछु ना होई
- lडॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-51
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

खाली उपदेश से कुछु ना होई

काल्हु काकी बड़का नतिया के स्कूल से ले आवे खातिर अपने गइल रहली। स्कूल का गेटे पर दू गो लइकन के जब ऊ अश्लील इशारा करत मुस्कराके बतियावत देखली त देंही में आगि लागि गइल। मन कइल कि ओहिजे उहनी के दू तबड़ाक लगा दीहीं बाकिर ई सोचिके तेवर नरम कइली कि हमरा अनका का बच्चा के डाँटे-बोले के अधिकार कहाँ बा? एहिजा त अपने बाल-बच्चा के बोले में दस बार सोचे के परऽता। ऊ घरे त लवटि अइली, बाकिर राष्ट्र आ नई पीढ़ी का चिंता से उनुकर माथा फाटत रहे।
पह फाटलि। लभेरन के इंतजार होखे लागल। संजोग से लभेरनो आजु भोरहीं भोरे चहुँपि गइले। आवते काकी अपना मन के भँड़ास निकलली-
“आजु का बच्चन के ई का हो गइल बा हो कि स्कूलो में पलखत पावते गंदा बात करे शुरू क देतारे सन?”
लभेरन कहले- “काकी, एह तरह का बात पर अब केहूँ नइखे खिसियात, अब ई आम बात हो गइल बा। रउरा ढेर पइसा हो गइल बा भा पड़ोसी आ रिश्तेदारन का देखादेखी रउआँ लइका-लइकी के पढ़े खातिर बाहर भेंज देतानी आ एक बेरि जाके तनी खोजो-खबर नइखीं लेत कि ऊ का करतारे सन। लइकिन का होस्टल में लइका-लइकिनि के जवन अजूबा करनी अखबार आ टीबी से देखे के मिलता, ओकरा बादो अउर कुछु बाँचि जाता का कहे के? आजु का कुँआर लइकिनि आ बियहल मेहरारुन से आजु के युवा पीढ़ी कतना घबराइल बिया, ई नइखीं देखत? लइका त अब बियाहे करे से डेरातरन स। ई बहुत बड़ आफति बा कवनो माई-बाप खातिर। अउर त अउर जंतर-मंतर पर ककरोचन का धरना-प्रदर्शन के समाचार रउआँ ना देखे के मिलल हा? जवन हमनी का सपनो में नइखीं जा बोल सकत, ओह से ज्यादा गंदा आ अश्लील पोस्टर लेके कई गो लइकी ओहिजा हँसि-हँसि के आ इशारा कइ-कइके नाचत-गावत रहली हा सन। उहनी के केहूँ माई-बाप ना होई का?”
काकी कहली- “तूँ ठीके कहतार। बाकिर ऊ त तनी बड़ हो गइल बाड़ी सन नू? हई छठवाँ-सतवाँ क्लास के लइका ‘लवणेन भुज्यम्’ कहि-कहि के अश्लीलता के आनंद लेतारे सन त एकरा बाद अब कवन दिन देखल बाँचल बा?” फेरु ऊ आपन जिज्ञासा प्रकट कइली- “लोग कहतारे कि आपन प्रधाने मंत्री ई संस्कृत श्लोक एगो भाषण का दौरान सुनवले रहलन।”
लभेरन तनी मुसुकइले आ फेरु कहे शुरू कइले-
“पहिले त ई जानि जाईं कि एह श्लोक के पूरा रूप का हटे आ ओकर माने का हउवे।
पूरा श्लोक हटे-
अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रं न्यायेन राज्यं लवणेन भोज्यम्।
धर्मेण हीनं खलु जीवितं च न राजते चन्द्रमसा विना निशा॥
जइसे अंगन (हाथ-पैर आदि) का बेगर देंहि अधूरा होले, जइसे बिना आँखि के मुँह नीक ना लागे, जइसे न्याय का बेगर बिना कवनो राज्य भा शासन टिक ना सके, जइसे नीमक बीनू भोजन फीका लागेला, ओइसहीं धर्म का बिना मनुष्य के जीवन ओइसन बेजान लागेला, जइसे चंद्रमा का बेगर राति सून लागेले।
एही सुभाषित श्लोक के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी 30 जुलाई 2022 के पहिल अखिल भारतीय जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) सम्मेलन का उद्घाटन सत्र में उद्धृत कइले रहन। उनुकर कहनाम एकदम साफ रहे कि “जइसे शरीर के शोभा अंगन से, मुँह के शोभा आँखिन से आ भोजन के सार्थकता नीमक से होले, ओइसहीं राज्य के सार्थकता न्याय से होले।” अब बताईं एहमें गलत का रहे? संदर्भ न्याय के रहे, सुभाषितो के संदर्भ न्याये-प्रणाली रहे, ईहे नु पढ़ल-लिखल आदमी के पहचान होला? आ जेकर लक्ष्ये राष्ट्र-धर्म होई, ऊ त अपना भारतीय संस्कृति के धरोहर वाला सुभाषित सुनइबे नु करी?”
तब काकी पुछली- “अतना नीमन बात वाला श्लोक के लोग अश्लील आचरण से काहें जोरे लगले?”
लभेरन बतवले- “ओकरा मूल में बाटे संस्कृत के विरोध। अङरेजी राज का स्थापित भइला से पहिले संस्किरिते हमनी का जीवन में रचल-बसल रहे। अङरेज एह भाषा के जाहिल कहिके एकर पढ़ल-पढ़ावल बन्न करा दिहले सन आ अङरेजी के हमनी का दिल-दिमाग में अइसे पइसा दिहले सन कि अब सभ पलटि गइल। अब अङरेजी पढ़ल लोग विद्वान आ संस्कृत पढ़ल गँवार लागे लगले। अब रउएँ बताईं कि देश के प्रधान मंत्री संस्कृत के श्लोक पढ़िके निकलि जाई आ स्मार्ट लोग ओकरा के छोड़ दी? अब अतना त तय बा कि उनुकर त ई बकलोल लोग कुछु ना बिगारि पाई, बाकिर उनुका कहनाम पर ओही ध्वनि के कुछु गंदा भा द्वयर्थी मीम बनाके सोशल साइट पर वायरल त करिए नु सकत बा? ऊहे भइल। रील के अभ्यस्त लोग खासकर के नया पीढ़ी ओहके हाथोंहाथ लोकि लिहलसि। अपने त मजा लेबे कइलसि आ दोसरो के शेयर क के गंगा नहान के पुन्न पावे लागल। अब एकरा बाद के प्रभाव त रउरा समनहीं बा।”
काकी चिंतित भइली- “अब हमनी के का करेके चाहीं?”
लभेरन कहले- फेरु पीछे लवटे के परी। लइकन के बेद-पुरान के कहानी सुनाईं, संस्कृत पढ़ाईं, संस्कृत आ अपना भाषा के महत्त्व समुझाईं। एकरा अलावा अब कवनो उपाइ नइखे लउकत, खाली उपदेश से कुछु ना होई।”
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