धोबी के कुक्कुर, घर के ना घाट के
- - डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-50
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

धोबी के कुक्कुर, घर के ना घाट के

काकी बड़ा असमंजस में परि गइली, जब पड़ोस का लछुमन जी के बड़की लइकी उनुका से पुछलसि कि ‘कुतका’ के माने का होला। ऊ छठवाँ क्लास में पढ़त रहे आ ओकरा के एगो खास कहाउत पर लिखे खातिर प्रोजेक्ट मिलल रहे। काकी ओकर संदर्भ जानल चहली त ऊ एगो एगो यूट्यूब वीडियो देखा दिहलसि। अब त काकी का देंहि में आगि लागि गइल। ऊ कहली कि हमनी का छोट रहलीं जा, तब बाबा आ मइया से ई कहाउत कइ बेरि सुनले बानी जा- धोबी के कुक्कुर, घर के ना घाट के। कुतका त कबो ना सुने के मिलल। तब ऊ लइकी बोललसि- अतना दिन पहिलहूँ जब ईहे कहाउत रहे तब त कुत्ते सही होई, कुतुका ना। अब तक काकी के बड़का नतियो आ गइल रहे। ऊ पुछलसि- “दीदी, कवना कहाउत के बात हो रहल बा?”
दीदी बतवली- “धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।”
ओकरा बात के कवनो ओर-छोर ना बुझाइल। अतने में लभेरन आ गइले।
अब त गेना लभेरन का पाला में चलि गइल। काकी भनभनात लभेरन से पुछली- “का हो लभेरन, जे तनी ढेर पढ़ि-लिखि जाला ऊ अइसहीं अंट-शंट रिसर्च करत रहेला का? अब धोबी का कुतका प तनी तूहूँ ग्यान छाँटि ल।”
लभेरन कहले- “राउर खिसियाइल सही बा, बाकिर रिसर्च कइल भा अनुमान कइल भा कल्पना कइल कवनो खराब चीज थोरे हउए! ओकरा पर विद्वान लोग तर्क-वितर्क करेलन आ अंत में सही बात भा तथ्य उभरि के आवेला।”
काकी कहली- “त हे लइकिया का प्रोजेक्ट पर एकर प्रभाव पड़ल कि ना? एकर मास्टर त एकरा के कुछु ना बतवले। मानि लऽ, जो ऊहो एह वीडियो के देखले होइहें आ ओकरा आधार पर एकर नंबर काटि लीहें तब का होई?”
लभेरन मुसुकइले आ तनी गंभीरो हो गइले- “ना, ठीके कहतानी। कवनो नाया बात आवेले त शुरू में तनी नीच-ऊँच त होइबे करेला।”
काकी फेरु बोलली- “तहरा का लागऽता?”
लभेरन कहले- “हमरो कवनो ओरि से ‘कुतका’ ठीक नइखे लागत। ‘कुत्ता’ शब्द पहिलहूँ रहल बाटे। भोजपुरी आ अवधी में त कुक्कुर कहाला आ कहाउतो में ऊहे बा। एकरा बारे में एक आदिमी के एगो वीडियो सोशल साइट पर खूब घूमऽता। ऊ सज से समुझवले बाड़े आ एकरा आधार का रूप में हितोपदेश के एगो कथो बतवले बाड़न। सभसे पुरान प्रमाण गोस्वामी तुलसीदास का कवितावली के कवित्त लागता, जवना में एह कहाउत के उल्लेख मिलता आ ओहमें ‘कुत्ता’ का जगहा ‘कुक्कुर’ मिलता। लागऽता, बाद में ऊहे कुक्कुर कुत्ता हो गइल होई। गोस्वामी जी के समय सोरहवीं शताब्दी का अन्त अउर सतरहवीं शताब्दी का शुरू तक के मानल जाला। अब पत्रकार जी सोरहवीं शताब्दी का पहिले के कवनो ऐतिहासिक भा साहित्यिक प्रमाण प्रस्तुत करिते तन नू मानल जाइत?”
अब त प्रोजेक्ट वाली लइकी काँपी-कलम उठाके लभेरन का भीरी बइठि गइलि आ चहकत बोललसि- “चाचा, कवितावली के ऊ कवित्त बताईं ना!”
लभेरन लिखावे लगले- “कवितावली का पुरनका संस्करण में कूकुर आ गीताप्रेसवाला संस्करण में कूकर मिलऽता।
राग को न साज न बिराग योग याग
जिय कायर न छाँड़िदेत ठाटिबो कुठातको।
मनोराज करत अकाज भयो आजु लगि
चाहे चारु चीर पै लहै न टूकु टाटको।
कियो करतार बड़े कूर को कृपालु अति
पायों नाम पारसु हौं लालची बराटको।
तुलसी बनीहै राम रावरे बनाई, नतो
धोबी कैसों कूकुर न घरको न घाटको॥
बड़का नतिया पुछलसि- “एह कहाउत के माने का होला?”
लभेरन बतवले- “जे दू गो जगहि भा दू गो काम का बीचे उलझि जाला, ऊ कतहीं के ना रहि जाला, ओकरा के केहूँ ना पूछे।” अब छोटका पलखत पवते बोललसि- “अंकल एकर कहानी बताईं ना!”
लभेरन बतावे लगले।
एगो राज में धोबी रहत रहे। ओकरा भीरी एगो गदहा आ एगो कुक्कुर रहे। धोबी गदहवा के त माने बाकिर कुकुरा पर तनिको ध्यान ना देइ। एक दिन राती खा एगो चोर घर में ढुकि गइल। कुकुरा चोर के देख लिहलसि, बाकिर भुँकलसि ना। गदहवा ओकरा के टोकलसि त ऊ जबाब दिहलसि कि हमार मालिक हमरा के कुछ जनबे ना करेला। हमरा के खाहूँ के ना देला, त हम काहें के भूँकीं? ऊ ऊफरि परो।
गदहवा के ई ठीक ना लागल। ऊ कहलसि कि मालिक के आफति से बँचावले सेवक के धर्म हटे। तब कुकुरा धिरवलसि कि हमरा काम में दखल जनि द, ना त ठीक ना होई। बाकिर, गदहवा ओकर बात ना मनलसि आ जोर-जोर से रेंके लागल। ओकर आवाज सुनते धोबिया काँची नीनी उठि गइल। ऊ अगल-बगल देखलसि आ जब कवनो चोर के ना पवलसि त गदहवा के सोटा से अतना ना पिटलसि कि गदहवा मरि गइल। अब बतावऽ लोग कि जब असली बात के पता चलि गइल होई त ऊ धोबी कुकुरा का बारे में का सोचत होई? अब कुक्कुर त कतहीं के ना रहले- ना घरे के ना घाटे के!
काकी चएन के साँस लिहली- बतावऽ हतना त सोचलहूँ ना रहलीं जा हमनी का!
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