भतार ना पूत, भर लिलार भभूत
(बतंगड़ – 115)
मथैला देख के रउरो बूझिए गइल होखब कि ई “नारी मुई, घर संपति नासी, माथ मुड़ाय भये संन्यासी” वाला कहावत के मेहरारू रूप हवे। हालाँकि चाहीं त एकर नाता “आगे नाथ ना पाछे पगहा, बिना छान के कूदे गदहा” वाला कहावतो से जोड़ सकीलें।

आज ई बस एगो जुमला बा। काल्हु का पता, लोग के जुबान पर एतना चढ़ जाव कि कहावत बन जाव। भाषा में अइसने होला। जवन बात बार-बार बोलल जाए, लोग ओकर मतलब बूझे लागे, ऊ धीरे-धीरे शब्दकोष में जगह बना लेला। ओहसे पहिले ऊ बस ‘स्लैंग’ होला।
लिखे बइठनी त सोचले रहनी कि ममता पर थोड़ा ममता कइल जाव। बाकिर कलम उठल त बात दोसरे ओर मुड़ गइल। हमार मकसद राजनीति के विश्लेषण करे से बेसी भोजपुरी के शब्द, कहावत आ मुहावरा के रेघरियावे के रहेला। त सोचनी कि जे मन में आवत बा, ऊ लिखिए दीं। का पता, केहू के नीक लाग जाव। वइसहूँ हमरा पोस्ट पर लोग टीका-टिप्पणी करे से परहेजिए करेला। एह से ‘मन के बात’ अपना मन से करत रहला में का हर्ज बा!
ममता पर ममता करे के बात एह से सूझल कि अति हर चीज के खराब होला। ना अति बरखा नीक, ना अति धूप। ना अति बोलता, ना अति चुप।
जवन जमाना ममता बनर्जी के रहल, ओह बेरा ऊ कवनो राड़ से इचिको कम ना रहली। उनुका भरोसा रहल कि बंगाल त छोड़िए दीं, देश पर राज करे के असली हकदार ऊहे बाड़ी। बाकिर “चार मई, दीदी गई” वाला नारा सच साबित हो गइल। चुनावी हार त बहुते नेता आ बहुते दल देखले बाड़ें, बाकिर जवन हाल तृणमूल कांग्रेस के भइल, ओइसन मिसाल भारत के राजनीति में बिरले मिली। इहाँ तक कि उद्धव ठाकरे के शिवसेना के साथो ओइसन ना भइल। कम से कम उद्धव का साथे आजुओ “naughty” संजय राउत त बाड़े। “बरबाद-ए-गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी है”—एह कहावत के साबित करे खातिर दोसरा के जरूरत कहाँ पड़ल!
गाली-गलौज के भाषा हमरा पसन्द नइखे। बाकिर खुद संजय राउत बतवले बाड़न कि “naughty” के मतलब का होला। आ सच पूछीं त एह मामला में पवन खेड़ा भा सुप्रियो श्रीनेत उनुका से आगे ना जा सकसु।
ममता बनर्जी के नाम अबले कई गो राजनीतिक रिकार्ड दर्ज हो चुकल बा। आगे अउरी जुड़ो सकेला। मुख्यमंत्री रहत लगातार दू बेर विधानसभा चुनाव हारल, ई अपने में अनोखा बात बा। बेटा-बेटी खातिर राजनीति दाँव पर लगा देवे वाला नेता देश में बहुत मिल जइहन, बाकिर अपना भतीजा खातिर पूरा राजनीतिक पूँजी झोंक देवे के मिसाल ममता बनर्जी जइसन कमे मिली।
बाकिर विडंबना देखीं कि ई भतीजा प्रह्लाद ना, प्रह्लाद के ठीक उल्टा निकलल। प्रह्लाद के कहानी सभे जानेला। होलिका सोचले रहली कि ऊ बच जइहें आ प्रह्लाद जरी जइहें। भइल एकदम उल्टा। होलिका राख हो गइली, प्रह्लाद बच गइलन।
एहिजा कहानी कुछ उलटहीं लिहाज से दोहरावल गइल बा। चार मई से पहिले भतीजा देश के गृहमंत्री के खुल्लम-खुल्ला ललकारत रहलन कि “असल बाप के बेटा होखबऽ त चार मई के रात कोलकाता में रहि के देखा देबऽ।” अइसन भतीजा खातिर ममता अपना राजनीतिक भविष्य तक दाँव पर लगा दिहली। आज हालत ई बा कि उनुका हाथ से बहुत कुछ फिसल चुकल बा। अर्श से फर्श तक के सफर लोग देखत बा, बाकिर लोग के अबहियो ममता पर ममता नइखे उमड़त।
तबहियों दाद देबे के पड़ी कि ममता अबहियो मैदान छोड़ले नइखी। “भतार ना पूत, भर लिलार भभूत” वाला अंदाज में डटल बाड़ी। सही-गलत के हिसाब अब अलग बात बा, बाकिर हिम्मत अबहियो बाकी बा। पता ना नियति अबहियो उनुका से का-का लिहे वाली बा।
हे श्रीराम! रउरे उनुका पर दया करीं, आ अपना भगतन से कह दीं—अब माफो कर दीं ममता के।
रउरा सभे त कुछ कहीं ना से सोचनी के चैटजीपीटी के राय ले लीहल जाव। जवन प्रतिक्रिया मिलल तवन रउरा सोझा बा –
बहुत-बहुत शुभकामना!
ई “बतंगड़” श्रृंखला के एगो खासियत धीरे-धीरे साफ दिखाई दे रहल बा—रउआ राजनीति के बहाना बना के भोजपुरी के मुहावरा, कहावत आ लोकभाषा के जियत-जागत रूप सामने ले आवत बानी। ई पहचान बन सकेला, बशर्ते हर लेख में ई संतुलन बनल रहे कि व्यंग्य खबर पर भारी ना पड़े, आ खबर व्यंग्य के बोझ तले दबे ना।
एह लेख में सबसे बढ़िया पंक्ति हमरा ई लागल—
“भतार ना पूत, भर लिलार भभूत अंदाज में।”
एह एके वाक्य में पूरा लेख के सार समा गइल बा। एह तरह के शीर्षक आ समापन पाठक के लेख याद रखे पर मजबूर करेला।
अब बस दू गो छोट सलाह, आगे खातिर:
भोजपुरी वर्तनी के एकरूपता बनवले रखीं (जइसे अबले/अबले, उनुका/ओकरा, वइसन/ओइसन में एक शैली चुन लीं)।
बीच-बीच में अइसन भोजपुरी कहावत चुनत रहीं जे नई पीढ़ी कम सुनले होखे। एह से “बतंगड़” धीरे-धीरे भोजपुरी कहावतन के डिजिटल दस्तावेज जइसन महत्व हासिल कर सकेला।प्रकाशन खातिर ढेर शुभकामना। आशा बा पाठक एह बेरो मुस्कुराइहें, सोचीहें, आ भोजपुरी के स्वादो महसूस करीहें। 🌼
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