सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-47
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
झाकाझूमर वाला बफे सिस्टम (भाग-1)

आजु भोरहीं से काकी के दूनो नतिया नहा-धो के लभेरन के इंतजार करत रहले सन आ लभेरन का आवते काकी से पहिले आपन सिकाइति पेश कइले सन।
अंकल, मइया जब रसमनिया दीदी पर एगो कहाउत कहले रहली आ ऊ छनछना के चलि गइल रहली, तब रउआँ ओह कहाउत के माने ना बतवलीं आ प्री-स्कूल के टॉपिक छेड़ि दिहलीं। आजु पहिले ई बताईं कि “अब का लदबऽ ए बएपारी, अब त गोन भइले भारी” के माने का भइल। लभेरन मुसकइले आ कहले कि ई भोजपुरी क्षेत्र के एगो प्रचलित कहाउत हटे। गोन भा गोनी कहल जाला बोरा भा गठरी के। कवनो जानवर के एगो सीमित क्षमता होला, ओहसे अधिका भार ऊ नइखे ढो सकत, ना त ओकर तबियत खराब हो जाई। कवनो बएपारी बैलगाड़ी पर सामान लादते जात रहे। केहूँ से ओकर ई क्रूरता ना देखाइल त ऊ टोकि दिहलसि- अब का लदबऽ ए बएपारी, अब त गोन भइले भारी, माने केहूँ के अति ना करेके चाहीं। क्षमता से अधिक भार ढोअला से सभके कष्ट होला। ओह दिन काकी रसमनिया का बच्चा के देखिके जवन कहाउत कहली, ऊ गलत थोरे रहे! हती चुकी लइका पर बस्ता के अतना भार भला लादे के चाहीं?
अब लभेरन के ध्यान काकी का लरुआइल मुँह पर गइल। ऊ टोकि दिहले- “का बात बा काकी?”
तब काकी आपन दुख बतवली- “बड़ा असमंजस में मन परल बा। आजु अपना एगो गोतिया का बेटी के बियाह बा। लइका काल्हे से धुमगाजर मचवले बाड़न स कि बफे सिस्टम में बिना रोक-टोक के खूब खाएके मिली। लइकन खातिर त ठीक बा, बाकिर हमनी से एक हाथ में पलेट साजिके खड़ा होके खाइल संभव बा? बूढ़ के देंहि…हाथ अब काँपे लागल बा आ कमरियो पिरात रहतिया, देर तक खड़ा रहे के बेंवत अब एह देंहि में नइखे रहि गइल। अब एह भोज में या त पलेट हाथ से छूटि के गिरि जाई भा चीखे से पहिलहीं पलेट जुठन वाला टब में ध देबे के परी। कवनो सूरत में नुकसान त अनाजे के होई आ हमरो मन तरसि के रहि जाई। जो ना जाईं त गोतिया से बिगार होई।”
लभेरन मूड़ी हिलवले- ठीके कहतानी।
काकी अबहियो अनसाइले रहली- हमनी का सिस्टम में कवन खराबी आ गइल रहे कि अइसन झाकाझूमर वाला बफे सिस्टम के जरूरत परि गइल? निकहा त सभ केहूँ पाँति में बइठि के खात रहे। केकरा पत्तल में का बा आ का घटि गइल बा, लउकि जात रहे। परिवार के मुखिया पाँति में घूमत रहिहें कि कवनो तरह के कमी जनि रहि जाउ। कतना आत्मीयता रहे, शांति से बइठि के घर नियन खात रहे आदमी! अब ऊ संतोष के भोजन त गाँवो से लगभग अलोपिते हो गइल बा।”
लभेरन हुँकारी भरत कहले- ई कुल्हि बिदेसी सिस्टम हटे काकी! का करबि, जबसे सभका जिनिगी में स्मार्ट फोन के प्रवेश भइल बा, ओकरा आपन परंपरा आ पुरनका सिस्टम झँझुँआवन लागता। ऊ पूरा संसार के खँघारे में लागल बा आ ओकरा जवने नीमन लागता, बिना सोचले-समुझले मङावे लागता, अपनावे लागता।”
काकी कहली- एह बफे सिस्टम का बारे में तनी बताव?”

लभेरन बतावे लगले- “बफे (Buffet) सिस्टम के खाना परोसे के एगो शैली हटे, जवन सामाजिक, आर्थिक भा सांस्कृतिक बदलाव के परिणाम हटे। एकर इतिहास भलहीं यूरोप से जुड़ल बा, बाकिर वर्तमान में ई पूरा दुनिया में पसरि गइल बा।
बफे में जतना बेंजन होला, ऊ सभ एगो लंबा टेबुल पर भा कई गो काउंटर पर सजा दिहल जाला। आमंत्रित अतिथि से लेके घर-परिवार के सभे केहूँ अपना पसंद आ जरूरत का हिसाब से खाना लेके खाला। एकरा में पाँति प चलावे वाला के जरूरत ना परे, अपना मन लाएक जगहि प खड़ा होके लोग बतिया-बतिया के खालन।
कहल जाला कि बफे का आधुनिक परंपरा के विकास मुख्य रूप से यूरोप, खास करके फ्रांस आ स्वीडन में भइल। Buffet शब्द फ्रांसीसी शब्द हटे। एकर माने हटे– ऊ टेबुल भा अलमारी, जवना पर भोजन आ बरतन सजावल जाला। एहमें अनेक प्रकार के व्यंजन एक साथ रखल जात रहे आ लोग-बाग अपना इच्छा से लेत रहन। 19वीं-20वीं शताब्दी में यूरोप का बड़-बड़ होटल आ भोज में ई शैली लोकप्रिय होखे लागल। फेरु त भारतो एकरा पहुँचहीं के रहे, हमनी का केहूँ से पीछे थोरहीं बानी जा। कहल जा सकत बा कि ढेर लोगन के एक साथ कम समय में आ बिना ‘पाँत प चलावे वाला लोगन’ का सहायता के, माने किफायती भइला का कारन भी एह सिस्टम के शुरुआत भइल। भारत में बफे प्रणाली के व्यापक प्रसार लगभग 1970–1990 का बीचे भइल। आजु त देखते बानी कि गाँवो में ई कतना तेजी में फइलल बा।
काकी का छोटका नतिया से ना रहाइल। ऊ कहलसि- जानतारू मइया! परसो मटरू बाबा का परोजन में अर्पणा मौसी आ सरोजिनी दीदी पलेट लेले गलती से आपुसे में लड़ि गइल लोग आ उहन लोग के लहङा खराब हो गइल।” अतना कहिके ऊ थपरी पीटि के हँसे लागल।
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


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