उपन्यास-सम्राट प्रेमचंद के इयाद में
- टीम अंजोरिया

उपन्यास-सम्राट प्रेमचंद के इयाद में स्व. कवि विजेन्द्र अनिल के लिखल गीत

(रिवरहेड, न्यू यॉर्क, अमेरिका में रहे वाला डॉ कमल किशोर सिंह के सौजन्य से ईमेल से मिलल)

[तर्ज-विदेसिया]

गोरवन के राज रहे, बिगड़ल समाज रहे।
मकरी बीनत रहे जाला मोरे सथिया।

जनता तबाह रहे, सूझत न राह रहे,
देसवा के निकले देवाला मोरे सथिया।

पापी अंग्रेजवन के जुलुम बढ़त रहे,
मदत में सेठ-साहूकार मोरे सथिया।

राजा-महराजा, जमींदार, पटवारी सभे
चूसत रहे जनता के खून मोरे सथिया।

देसवा के पनिया, विदेस के मछरिअन से
आपन मिठासवा गंवावे मोरे सथिया।

विद्या भावऽ संस्कृति देस के बिलात रहे
घुनत रही सुरसती माय मोरे सथिया।

कपिल, कणाद, व्यास, वाल्मीकि, कालीदास
केहू के ना होत रहे पूछ मोरे सथिया।

सूरदास, तुलसी, कबीर के कवित्त-सभ
खोजले प कतों ना भेंटात मोरे सथिया।

हिन्दिया त बनल रहे, चेरिया-लउंडिया हो
अंगरेजी बनल महरानी मोरे सथिया।

देस के किसनवा-मजुरवा बेहाल रहन
केहू नाहीं रहे पूछनिहार मोरे सथिया।

ओही रे समया में कोख के कंवल लेखा,
प्रेमचंद लिहलन जनम मोरे सथिया।

जेकरा ना जिनगी में पनिया भेंटाइल रहे,
ओकरो पियसिया मिटवलन मोरे सथिया।

जेकरा न हूब रहे, ठाढ़ होके चलहूँ के
ओकरो के लठिया धरवलन मोरे सथिया।

तोपवा-बनुकवा के कमवा कलम कइलस,
अंगरेजी राज हिलकान मोरे सथिया।

लोरवा जेकर केहू पोछले ना रहे कबो
ओकरो के नायक बनवलन मोरे सथिया।

होरी, हीरा, घीसू, माधो, गोबर आ धनिया के
सभवा के बीचवा बइठवलन मोरे सथिया।

‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’, ‘गबन’, ‘गोदान’ लिखि के
हमनी के रछिया देखवलन मोरे सथिया।

छपन बरिस के उमिरिया में चलि गइलन,
देस-दुनिया रोवे पुक्का फारि—मोरे सथिया।

बाकी रही कायम हरदम उनकर निसनियाँ हो
ऊ त हवन रोसनी के खान मोरे सथिया।

अबहीं ना देस के बिपतिया घटल बिया
सुखी ना किसान-मजूर मोरे सथिया।

बेलछी, नरायनपुर, पिपरा आ पारस बिगहा
जुलुम के कहता कहानी मोरे सथिया।

दुनिया में बढ़ल आवे, समराजी पंजवा हो
देसवा में मचल हहकार मोरे सथिया।

जहाँ-जहाँ होतबा बिरोधवा जुलुमवा के
उहाँ बाड़न प्रेमचंद ठाढ़ मोरे सथिया।

(28-7-1980)

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