रमबोला
– डॉ. हरीन्द्र हिमकर
दुसरका सस्करण के साखी
तुलसी का चिन्तन विस्तार के सहेजल-समेटल आसान नइखे, बाकिर कवनो एगो कोर पकड़ के ‘रमबोला’ के भाव-लोक के आनन्द लिहल जा सकेला। ‘रमबोला’ एही तरह के प्रयास का प्रतिफल का रूप में सबका सोझा बा।
‘रमबोला’ के प्रथम संस्करण के प्रकाशन के प्रेरणा बहिन गिरिजा शर्मा के रहे आ प्रूफरिडिंग आ प्रेस से संबंधित पूरा भार प्रसिद्ध कवि मदन कश्यप उठवले रहलें।
प्रकाशन का बाद ‘रमबोला’ से हमार पहचान बनल आ एकर मोल हमरा तब समझ में आइल जब खुद सच्चिदान्नद हीरानन्द वात्सायन ‘अज्ञेय’ जी ‘रमबोला’ के हमरा स्वर में टेप कइके अपना संकलन में जगह दिहली। पं. विष्णुकान्त शास्त्री, स्व. पं. गणेश चौबे, स्व. पूर्णवासी राय, डॉ प्रमोद कुमार सिंह, गुरुवर डॉ अवधेश्वर अरुण, कविवर पाण्डेय कपिल, डॉ सरिता बुद्धू जइसन अनगिनत देशी -विदेशी विद्वानन के सनेह-सराहना एह काव्य से जुड़ल बा।
डॉ ब्रज भूषण मिश्र के शोधपरक नजर पड़ला का बाद भोजपुरी साहित्य के विद्यार्थियन का बीच ‘रमबोला’ के सरुप खुलल। दोसरका संस्करण के प्रकाशन खातिर मूल प्रेरणा बनलीं ओम प्रकाश सिंह जे डॉ रणजीत कुमार राय, डॉ अजय कुमार का माध्यम से ‘रमबोला’ के खोजत ‘रमबोला’ के भोजपुरिका डॉटकॉम (अंजोरिया डॉटकॉम कुछ दिन ले एहू नाम पर उपलब्ध रहल। पिछला दिने एह काव्य के खोजत लिंक पर नजर गइल त देखनी के ई सामग्री कहीं भुला गइल बा। एहसे एकरा के दुबारा अंजोरिया डॉटकॉम पर डालल जात बा। काहे कि ई भोजपुरी साहित्य के एगो थाती हवे। – प्रकाशक-संपादक) पर डाल के अंजोरा में ले अइलीं. बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में अइला का बाद पत्नी डॉ अनीता सिन्हा, शिष्य कमलेश कुमार, कृष्ण कुमार सिंह, रितुराज, बृजमोहन सिंह, पुत्री संज्ञा सुपात्रा, पुत्र विशाल रंजन, मानस रंजन आ अभिषेक रंजन का प्रेरक बनला पर शायर गुलरेज का माध्यम से ई संस्करण मैथिलि भाषा का कोख से प्रकाशन चलावे वाला हिन्दी-मैथिली के साहित्य साधक अजित आजाद का हाथ में प्रकाशन खातिर गइल। अजित जी ‘रमबोला’ से जुड़ के ‘रमबोला’ छाप रहल बाड़न।
हमरा भरोसा बा ‘रमबोला’ से साहित्य प्रेमियन के जियरा जुड़ाई। हियरा के दियरा जरी।
- हरीन्द्र हिमकर
अक्षर के फूल

पलना के सोहर, अँचरा के लोरी
अगना के मंगल, दुअरा के कीर्तन,
गाँव के गमक सनाइल गीतन के रस
सबके-सब हमरा रोआँ-रोआँ में भीनल बा।
दईया, माई आ बहिन के आवाज जस के तस
कान में रेंग रहल बा।
ककहरा से लेके कॉलेज तक के गुरु लोग के
मान, मन का भोर ना परी।
साथी-संघाती लोग के बेहवार, भाव का भुक्खड़ के
पेट भरले बा।
गाँव का घूरा से शहर का रोड़ा तक
चिकन-रूखर जे बा, जीनगी सभकर गुलाम बा।
‘फुलवारी’ त बड़का विद्वानन के ह, बाकि
भोजपुरी-भारती का चरण में चढ़ावे ला,
फूलल बिन फूलल अक्षर के फूलन के
जोर-नार के जवन माला बनवले बानी
अपने लोग के आशीष पावेला
अपने सभन का सोझा
आपन ‘रमबोला’ लेके खाड़ बानी।
केकरा के सँउपी!
केकरा के छोड़ीं!
– हरीन्द्र हिमकर
(साँच कहीं त अंजोरिया के सपना देखला से पहिले के परिचय हवे हमार ‘रमबोला’ से। पिछला दिने बहुत अफसोस भइल जब देखनी कि पुरनका लिंक काम नइखे करत। हार-थाक के एह के दुबारा अंजोर करे के तय कइनी आ एकर शुरुआत क दिहनी। एकही बार में पूरा किताब टाइप कइल संभव नइखे। एहसे एकरा के लगातार अपडेट करत रहब। रउरा सभे आवत रहीं। – संपादक-प्रकाशक}
रमबोला
धरती के रग-रग भइल राग
अदिमी-अदिमी हो गइल नाग
डंसलनि समाज के पोर-पोर
देहिया-देहिया में लगल आग ।
अंगे-अंगे धहकल घिघोर
धरती लिहली अँचरा बिटोर
तब धू-धू-धू सब ओर मचल
रीसे लागल अँखिया करोड़ ।
राजा से रूस गइल रानी
होखे लागल खींचा-तानी
राजा परजा के मेल गइल
शासन कठपुतरी खेल भइल ।
मँहगाई मार गइल बाजी
घर-घर में पइठ गइल पाजी
केहू केहू के ना पूछे
सब बात भइल छूंछे छूंछे ।
माया में भूल गइल भारत
घर-घर में भइल महाभारत
ओछर के बाज गइल डंका
सँउसे भारत लागे लंका ।
अबरी के पेट भइल पतुहा
दुल्लम हो गइल नीन-सतुआ
जूठन पर जूट पड़ल कुत्ता
जनता पर टूट गइल जूत्ता ।
राशन कर गइल हजम शासन
परजा के पेट भरल भाषण
टूटे लागल सब ध्यान धरम
छूटे लागल जब लाज शरम ।
तब गरभे तुलसी अगुताइल
ना जनलसि बतिया ई बाइल
मइया हुलसी मनमोर भइल
बारहो मास बीते आइल ।
लवका लउकल बिजुरी चमकल
सब पात-पात गम-गम गमकल
बन चहक गइल चिरई जहान
बादल फूलल पानी झमकल ।
चन्नन बन झूम-झूम झहरल
पनसोखा रंग पता फहरल
धरती सोहाग के इतराइल
एहवातिन के आँचर लहरल ।
बिजुरी के फूल भरल अँजूरी
लवका के लहक भरल कजरी
छितराइल राग चलल चसकल
जन-गन-मन के कोंचा कसकल ।
पुरवइया मार गइल कनखी
पछेया के उतर गइल सनकी
खेतन के लछिमिन घूम गइल
बाली में सोना झूम गइल ।
छितनार भइल कचनार नार
रंगरेज बनल आइल बहार
कोंचा-कोंचा रस मात गइल
रीसे लागल रस के फुहार ।
बाँझिन के कोख भरल चहकल
अँगना दुआर मह-मह महकल
बनकर चकोर सभकर चेहरा
देखेला भारत के चेहरा ।
तुलसी के जनम भइल जहिया
बनचट छूटल सूझल रहिया
जन-जन के आस आकाश भइल
तुलसी, तुलसी दल दी कहिया ।
जनमत मइया सुरधाम गइल
हुनकर सभ काम तमाम भइल
बापो ना बंस दरस पइलें
माटी-माटी सब जतन कइल ।
दुध मुँहे मुँह में दाँत भरल
मुँह से जय राम-राम उचरल
अचरज सभका भारी भइलें
अजबे रचना बिधना कइलें ।
पुनिया के फल पावल चुनिया
तुलसीदल पावल ई दुनिया
पोसत-पालत सगेयान भइल
तुलसी दुतिया के चान भइल ।
मनमउजी-मन बिहरे लागल
सिखे लागल सिहरे लागल
मऊअत से जूझल भाग गइल
जम्हुआइल तुलसी जाग गइल ।
धरती से धरम बिका जाला
सतवादी लोग भुला जाला
मेटे खतिरा दुख पाप-रोग
केहू धरमतमा आ जाला ।
टूअर बन बिलख-बिलख घूमे
दुख लाख-लाख आगू जूमे
जरिये से जूझ गइल जग से
हारो लगली तरवा चूमे ।
टेम्हुआइल बाती टेम भइल
छरिआह बिधाता छेम भइल
नवका बिहान होखे लागल
रुप ये चवन्नी नेम भइल ।
तुलसी चन्दा चमके लागल
मलेया गिरी सन गमके लागल
सूखल बन सिहक गइल मन में
सुख के बदरा दमके लागल ।
बिधना के रेखा रंग भइल
तुलसी नरहर्या संग भइल
सोना में सुन्नर गंध बसल
तुलसी मन सोती गंग भइल ।
अंगुरी-अंगुरी के पोर भरल
रोआँ-रोआँ पर रग चढ़ल
रमबोला आज जवान भइल
जइसे पुनिया के चान भइल ।
फूलल मन काई फाट गइल
मधुआ मन मधुबन चाट गइल
गँवई में गुम गोसाई के
मन सिहकल दुनिया पाट गइल ।
रतना रतनार भरल मद में
रंग-रूप चढ़ल अपना हद में
तुलसी के भइली आध अंग
भइली लगाम तुलसी तुरंग ।
रस गंध जवानी के फाटल
सिहकल बेयार भौंरा मातल
डंटी-डंटी पर फूल भइल
तुलसी तुलसी के भूल गइल ।
भूलल तन भूल गइल काया
चिन्ता छूटल, छूटल हाया
छाया अस छाप गइल मन के
चहुँओर भइल माया-माया ।
कुछ रोग जवानी में होला
जब आवेला घर में डोला
दुलहिनी मास भर मुस्काइ
बरमसिया दुलहा गम खाई ।
झबिया-झूमका से भरल देह
सेनूर-सोहाग से बन्हल नेह
सब लाल-लाल पीयर-पीयर
सोहत सूरत मूरत नीयर ।
नेही सनेह कुछ हो जाला
सुध-बुध अदमी सब खो जाला
सब ज्ञान गाछ का फुनगी पर
जीये लागेला सुनगी पर ।
छलके जब काम-कलश तन में
सिमटे दुनिया अँगूठी नग में
आँखिन के रंग बढ़ल होला
नहतर पर घाव चढ़ल होला ।
कनखी के धार दुधारी ह
बिजुरी से भरल कटारी ह
ठेकला से जीउ करछ जाइ
हीरदा में हलचल मच जाइ ।
जब लगी नेह तब ना छूटी
चाहे कतनो गोला फूटी
पल के बिछोह लागी पहाड़
चिन्ता में सूखी हाड़-हाड़ ।
रतना के रतन-जतन एतना
कर सकसि रहत तुलसी जेतना
कइलें पर माया छोड़ चलल
बिन आहि-दाहि मुँह मोड़ चलल ।
भादो में भूत अन्हरिया में
मतवाला बादल करिया में
तुलसी के रतना छितराइल
चल दीहल पपिहरा अगुताइल ।
मन के मरोर मन मुरझाइल
पारा तन के चढ़ उफन गइल
जगले तुलसी अस सपनाइल
सब ज्ञान गरत में दफन भइल ।
तिसना के तिली ताड़ भइल
कसमस-कसमस सब हाड़ भइल
हीयरा के दीयरा अँखुआइल
नेतर के पानी छार भइल ।
मन सुनगल तलफ गइल लहकल
सहकल तुलसी एतना डहकल
आगी-पानी के भेद गइल
बढ़ गइल पाँव बहकल-बहकल ।
मुर्दा-मसान आन्ही-तूफान
कामी का तरवा तर होला
रतिया होला, होला बिहान
कामी के काम पहर होला ।
ओहपार रतन के रतना बा
तुलसी एह पार बिना तरनी
ऊ घर ह भूत-बसेरा जवना
घर के छोड़ गइल घरनी ।
करछूल करेज में घूम गइल
दिल जरल धधा के पर गइलें
झऊँसाइल दिल, लथपथ करेज
रतना का घाट उतरि गइलें ।
रतना के नइहर मेघ तीर
छुवला से पानी बरस गइल
तुलसी चातक खरकटत हीर
पानी-पानी ला तरस गइल ।
ससुरार सुरा के सागर ह
डूबे से आग बुता जाला
पीअल-जीअल से आगर ह
निसूआइल से बूता जाला ।
निसुआइल तुलसी झूम गइल
बड़ विकट राहि होके उतरल
अँगना में अँगना गुम गइल
बाकि जतरा खूबे सुतरल ।
करनीनियाँ करवट का बेरा
रतना परली भूत भाँवर में
अँगुरी-अँगुरी सब सिहर गइल
सुगबुग से पाँव महावर में ।
सपनों में अइसन ना होला
गुुदगुदा गइल केहू आ के
नीनिया के बदल गइल चोला
उठली रतना अस भकुआ के ।
आँखि मलि के पसरा दिहली
जस देखत होखस लाख कोस
ऊ हउवें आ कि सपना ह
टोहे लगली आपन भरोस ।
सपनाइल आँखि, लड़ल चूअल
अँचरा से लाज सरक आइल
नहीरा में मान मसक बाजल
थथमाइल खीस खरक आइल ।
बदले के होला भाग रेख
तब मन गंगाजल हो जाला
बहुरुपिया बिधना बदल भेष
टीपन पर पारस हो जाला ।
तुलसी ठकुआइल कँपस गइल
रतना अस तुनक-तुनक बोलल
हहरल तुलसी-तन हदस गइल
छँट गइल मान, मन के डोलल ।
ऊखी-बिखी लागे लागल
माया के कूहा फाट गइल
रतना उझिलत गइरी गागर
तुलसी सब सागर चाट गइल ।
माटि के देह, नेहि माटी
मेटी ना माटी के पियास
मरघट दुनिया पनघट आकाश
इहँवा कवनो सुख के तलाश
जिनिगी के जोति जगाइ ना
जगति के भूत भगाइ ना
जब नेह राम से ना होई
जाये के बेरिया का होई
कामे ना आइ ई जोई
रोई बेटा, बेटी रोई
जब पकड़ि जम्हु आ के नेटी
केहू ना चिता संग लेटी
ई रूप-जवानी का करिहें ?
ई दरद दिवानी का करिहें ?
परलोक सुधारीं, खुद सुधरीं
दुनिया उधार, सउदा उधरी
छोड़ीं छलचिकनी, जपीं नाम
एगो मन्तर बस : राम-राम ।
धरती के भूत भगावेला
आपन परलोक बनावेला
बाहर-भीतर सब राम-राम
जब राम कहीं, ले लीं सलाम ।
जब परे जवानी से पाला
ना लउकेला ऊँचा-खाला
आगा-पीछा कुछ ना सूझे
नीमन बाउर कुछ ना बूझे ।
ई उमीर ठनाठन लोहा ह
महुअन के गरभल पोआ ह
गाँठल गुमान छाती उतान
ना सही आन, ना सही बान ।
जब लगी ठेस ठकुआ जाई
जरनइली कहीं भुला जाई
जब लउकी जिनिगी के पहाड़
तब जोड़े लागी ताड़-ताड़ ।
लहरी घरनी घहरी तासा
गुमसुम में बिती बरमासा
भोरी-भाथी तब अपना के
दे दी मलेछ सब सपना के ।
सहमल तुलसी अकुलात गात
रतना से रतना पा गइलें
कहके चल दिहले एक बात –
आजू तुलसी सभकर भइलें ।
अबला के भीतर के अबला
परमारथ के पुतली होला
नारी ह फूल लोभावे ला
अबला कचलोह कली होला ।
नारी पथल ह. पानी ह
नारी ह आग जवानी के
जिनगी के कथा-कहानी ह
चमकत सिक्का ह चानी के ।
लजवंती जंगल झाड़ी के
छुवला से जे कुम्हला जाला
कुहूकत कोइल बँसवारी के
गावत-गावत रिसिया जाला ।
नारी माया ह बन्हन ह
हरताल तुतुहिया माहुर ह
नारी मलयागिरी चन्नन ह
जस नीमन ह तस बाउर बा ।
हुलसल हुलसी के पूत
रतना पा के रतना से,
खुलल ज्ञान के सूत
आन लागल एतना जे
चल दिहलें नरनाह
आहि में अलख जगाके
जीतेला संसार
गीत के गन्ध लुटा के
खा के कसम करोड़
चोर मन के समुझावत
नावत सत् के माथ
चित्त के शुद्ध बनावत
कन-कन में आनन्द
कन्द, फल, मूल के आशा
धुरी लगावत माथ
नाथ से लेत दिलाशा
कब होई तम-नाश
आश लागल जन-जन के
कवि-कुल के सरदार,
खड़ा हो गइलें तन के
सिहकत सुधा सुवास
हास के बजत बधावा
लावा-फरुही होत,
बढ़त काटल पछतावा
गावत सीताराम
नवावत जग के माथा
तारे ई कलिकाल
बनावे अमरित गाथा ।
अनुभव सूपा से ज्ञान रकम
फटकत गइलें चालत गइलें
भरि अँजुरी जगति-सीपी में
भगति-स्वाति डालत गइलें।
पढ़ल-पढ़ल गुनल-गुनल
कपड़ा बिनल रूई धूनल
धरती आकाश के अन्तर बा
गुनले में बड़का मन्तर बा।
गुनी-गुन ना गमकी तबले
गम खाई ना सुनी जबले
बड़ सासत सहज सुलभ होला
आतम का परमातम चोला।
गुन-गुन के तुलसी भइल गुनी
बइठल लहका के ज्ञान-धुनी
कन-कन के कादो काछ-काछ
रोपल रमबोला रमगाछ।
जब आँख बड़ेरी पर अंटकल
तब काया के कोआ चटकल
पपनी के पाहुन रुस गइल
मन राम-रसायन चूस गइल।
रूप, रस, राग, गंध का उपर
का बा?
किछ बा जरुर!
बाकी ऊ बउरइला से ना मिले,
मन के कहीं बान्हे के होला,
तन के तूरही के होला।
बादल में फाटल दरार का ओह पार
का बा?
किछ बा जरुर!
बाकि ऊ अँउघइला से ना लउके,
तन के साधे के होला,
मन के सोधे के होला!
मन के चाह जेतना लमहर होला
ओह चाह के पार
कवनो चाह बा?
बा जरूर!
बाकि ऊ छरिअइला से ना मिले,
तन के छोड़े के होला,
मन के छेड़े के होला,
तब कहीं जा के तंत्री जागेला
आ तब लउकेला
एह सब का पार
अपार शांति बा
जहाँ, नेहि, नेहि ना रहे
देहि, देहि ना रहे,
सब आपन होला
सब बिरान होला।
तुलसी तनइलेंं तरि गइलेंं
धरती के अँचरा भरि गइलें
अक्षर-अक्षर से अरथ बढ़ल
अइसन सरधा के रास ढड़ल।
जब टूटति रहे धरम ताला
तुलसी लिहलें कंठी माला
कट गइल हिन्दुअन के फँसरी
अइसन तुलसी बरलें रसरी।
दोहा चउपाई छंद बंद
धरती पर भर दिहल अनंद
सोरठा कवित्त में भाव भरल
भगति-रस भरलस गाँव-गाँव।
सब शास्त्रन के पाट मढ़ल
बेदन पुरान के पाल चढ़ल
तुलसी खे लइलें साध-साध
सुमति नइया बहली अबाध।
करतब से भाग फुला जाला
बिधना का बात भुला जाला
कर्ता करोड़ भर्ता एके
सबके भर देला ले-दे के।
जे कुछ पा के इतरा जाला
ऊ कुछ खो के छितरा जाला
पावल-खोवल दस्तूर इहाँ
लेखा-जोखा भगवान किहाँ।
रतना के पसीजल रीस-खीस
आँखि के माड़ा फाट गइल
मरिचा के पानी परल आँखि
पसरल रग-रग में पाट गइल।
सिसकल मन सुसुकी पर सुसुकी
बेधल सखिया सबके उसुकी
बिरहा के आग भभक आइल
कुछ ना भावे पीअल-खाइल।
भरला भादो सूखल सरेह
बिन आन्हि आँखि परल खेह
काँचे टूटल अंगूर-आम
खट्टा-खट्टा सब हाड़-चाम।
चाबुक सन छरहर भरल देहि
मुसुकी पर बरसे नेहि मेह
से सूखल भइल रहेठा सन
मधुमासे मुरझाइल मधुबन।
सिहरत रतना बिलखात भेष
देखत तरहत्थी भाग-रेख
करतूत बिधाता के कइसन
कईनी जइसन पइनी वोइसन।
केकर कपार पर भइल वास
खींचल के मतिया के उजास
सरधा के फेरा कवन बेर
आइल कइसे एतना सबेर।
चिन्ता के चिता लगल धहके
कुछुओ ना ऊ गइलें कहके
कके सिंगार अब का होई
होके उघार अब का रोईं।
जीनगी भर के ई दाग भइल
भरले सोहाग अब आग भइल
केहू हमार पतिआइ ना
हुनका पर दोष लगाई ना।
जात मरद के जमखानी ह
जंगल में मागल खोजेला
ह छरिआह जलम के जाहिल
ढूँढ़ जलम के अउपाती ह।
तूरे में माहिर मनमउजी
टूटे में इस्पात कड़ाकड़
गरजे में ह मेघ आसाढ़ी
ढह जाला ई बात-बात पर।
नारी के कमजोरी सोना
काम मरद के कमजोरी ह
स्वारथ का गड़ही में जलमल
अधराती के बंद कमल ह।
धोखा के बादल ह करिया
माया में उमड़ल छितराइल
छल के ह छरिआह बछेड़ा
पलक गिरत ओझल हो जाला।
शंका के उफनात समुन्दर
जब चाही तूफान मचाई
फाँसे में बकुला बैरागी
टीप नेहि के जल में फेंके।
टूटी तब टेसू सन टहकी
लोर चाट के गीत उरेही
डेग-डेग पर किरिया खाला
धीरज के धरती विशाल ह।
मोह तिलाई के मछरी ह
बिछुड़ी तड़प-तड़प मर जाइ
लाली पर लट्टू हो जाला
लोक लाज से उपर लोभी।
साँस-साँस में आश आकाशी
टूटी नेह धरम पी लेला
आहि अँगोरा ला दम तूरी
पुनिया के पागल चकोर ह।
खटपट होई खाट छोड़ दी
बाट-बाट पर बंसी टेरी
काँचे मन में काँच गड़ी तब
तुलसी पाकल कंठी ले ली।
अबला के गुन ह गम खाइल
माहुर पी-पी के मुसुकाइल
रो-धो के अँचरा साफ कइल
जारल आपन मन, मान-मइल।
जुग-जुग से परल गाँठ मन में
नारी के नरक बना दिहलस
नारी टूटल नर निसूआइल
नारी बरसल नर पी लिहलस।
नारी के फूल कहल तूरल
नर के आदत खानदानी ह
नारी का रग-रग में चिनगारी
नारी सर्बत ह पानी ह।
अबला के आह अलख होला
भर मुँह हँसेला हहरेला
जब टूटेला मन के भरोस
तब आह अँगोरा लहरेला।
खुद जर के नारी जारेला
आपन पियास आपन कलेश
तब जनमेला कवनो तुलसी
रामायण सन लिहले सनेस।
असली-नकली के बनल देहि
माटी पर जामल सुख-सनेह
मरघट के मोह मेटावेला
जब समय सामने आवेला।
भगति भरोस भव तारे के
जगति से मोट उखाड़े के
मन के सब मइल उतर जाला
जहवाँ भगति रस परि जाला।
रंग गइलें राम रमा गइलें
रतना के डाह बुता गइलें
रतना के घर ससार भइल
तुलसी-माला गलहार भइल।
रतना के नेम टेम टहकल
तुलसी के कलम अउर बहकल
मँहकल मह-मह घर धूप-दीया
रतना हो गइली सती-सिया।
आनी-बानी सब बीत गइल
रतना के बिरहा गीत गइल
दुनिया के निहसावल छूटल
चमकल जे भाग रहे फूटल।
लइका के रिझावेला कठपुतरी
छम-छम नाचे बान्हल सुतरी
तस ब्रह्मा के माया धइ पगही
नचवावें हमें जगही-जगही।
गत्तर-गत्तर निछत्तर नाचे
सब देव मुनि समहर नाचे
तुलसी नचले आ खूबे नचलें
केतना जुग के पतरा बँचले।
मउनी बाबा का मठ पर के चउपाल रोज
तुलसी के राम-कथा सुने ला जम जाला
अदननन बाबा के अलाप सुन के सभकर
रोआँ सिहरेला मन के चिन्ता थम जाला।
गौरी काका के मीठ राग बँसुरी पर के
ऊ झाल-झिलिम, ऊ ढोल-ढाक, ऊ हरमुनिया
बरिसन से गठत रहल किरतनियन के गफला
धरती से पाप भगा के पोसेला पुनिया।
सावन अँजोर सतमी तुलसी के जलम दिन
मठ पर जमात साधुन के जमघट लाग गइल
‘भए प्रकट कृपाला’ के अलाप सुनते सँउसे
भगतन के मंडल ताल लगावत जाग गइल।
करिआ कुच-कुच ऊ रात अन्हारी देश-धरम
हुलसी के रेती कोख दिहल कचनार धान
बदरी चीरत चहँकल अँजोर चानी-चानी
ऊजर धप-धप भूइयाँ का अँचरा नया चान।
सब गावल गीत सुनत मन मठुआइल मुरकल
उखना भइलें तबसे सुन-सुन दरसन भईया
ई गीत पुतरिया नाच चली कबले आखिर
असली तुलसी के तोहनी का पइब कहिया।
रमबोला, राम-भगत, कवि तुलसी, तापस रहलें
ठीक बात!
धरती के धरम बँचावे ला अइलें धरती पर
ठीक बात!
हुनका अइले से भगति के गंगा गर्हुअइली
ठीक बात!
कामी रहलें, ठोकर खइलें, साधु भइलें
सब ठीक बात!
रामायण राम-रसायन दिहलें हमनी खतिरा
ठीक बात!
हमनी रामायण पढ़त-मरब तर जाएब सभनी
ठीक बात बा!
बाकि एगो बात बुझाइल ना केहू के,
तनिका धीरज धरीं सुनी सभनी ऐहू के
ऊ रामचन्द्र के राज भुलाइल बा कहवाँ
का अबहीं ले ना भइल इहाँ के धरम हान
कब होई ऊ अवतार भठाई ऊँच-खाल
कब होई सभका घर से अगहनुआ बिहान?
कब दूध मतारी के पी के लइका ढेकरी
कब कवनो तुलसी का घर ही होई काशी
कब कवनो हुलसी टेटनस भइले ना मरिहें
कहिआ ले ई सतमी होई पुरनवाँसी?
कब शेर-सियारी एक घाट पानी पीहें
कबले बयार पानी मिलिहें सब का सुगमे
कबले मधुआ लंका धधकी माटी होई
माटी ऊगली सोना कहिआ, कवना जुग में?
कबले ठिकदारी चली धरम के धरती के
कबले किसान का घर से सीता हरन चली
कबले सीता का कंचन-मोह रही
कबले रावन घर रास, राम घर मरन चली।
तबले उजाड़ होते जाई हमनी के घर
तबले उचत होके तुलसी घर से भगीहें
तबले कविता ऊसर के भाषा ना बूझी
जबले कवि तुलसी पेट जाँत के जम्हुआई।
कतना तुलसी के जलम भइल तबसे अबले
कतना तुलसी के चाट गइल माघी पाला
कतना रतना रोटी से आगा ना सोचल
कतना हुलसी के गरभ भूख के भीख भइल।
एही माटी-पानी के तुलसी रम बोला
एही बयार में हीरदा हुनकर भइल साफ
हमनी के राम-रसायण देके चलि दिहलें
हमनी का ई रामायण ले के का कइनी?
ऊ राम रमल बाड़ें हमनी का रग-रग में
ऊ रमबोला रोआँ-रोआँ से चिचियाता
हे जनक जाल छोड़ऽ धरती के दरद हरऽ
हे महाबीर अब त लंका लगिचाइल बा।


0 Comments