रमबोला : डॉ. हरीन्द्र हिमकर के कृति
- टीम अंजोरिया

रमबोला

– डॉ. हरीन्द्र हिमकर

दुसरका सस्करण के साखी

तुलसी का चिन्तन विस्तार के सहेजल-समेटल आसान नइखे, बाकिर कवनो एगो कोर पकड़ के ‘रमबोला’ के भाव-लोक के आनन्द लिहल जा सकेला। ‘रमबोला’ एही तरह के प्रयास का प्रतिफल का रूप में सबका सोझा बा।

‘रमबोला’ के प्रथम संस्करण के प्रकाशन के प्रेरणा बहिन गिरिजा शर्मा के रहे आ प्रूफरिडिंग आ प्रेस से संबंधित पूरा भार प्रसिद्ध कवि मदन कश्यप उठवले रहलें।

प्रकाशन का बाद ‘रमबोला’ से हमार पहचान बनल आ एकर मोल हमरा तब समझ में आइल जब खुद सच्चिदान्नद हीरानन्द वात्सायन ‘अज्ञेय’ जी ‘रमबोला’ के हमरा स्वर में टेप कइके अपना संकलन में जगह दिहली। पं. विष्णुकान्त शास्त्री, स्व. पं. गणेश चौबे, स्व. पूर्णवासी राय, डॉ प्रमोद कुमार सिंह, गुरुवर डॉ अवधेश्वर अरुण, कविवर पाण्डेय कपिल, डॉ सरिता बुद्धू जइसन अनगिनत देशी -विदेशी विद्वानन के सनेह-सराहना एह काव्य से जुड़ल बा।

डॉ ब्रज भूषण मिश्र के शोधपरक नजर पड़ला का बाद भोजपुरी साहित्य के विद्यार्थियन का बीच ‘रमबोला’ के सरुप खुलल। दोसरका संस्करण के प्रकाशन खातिर मूल प्रेरणा बनलीं ओम प्रकाश सिंह जे डॉ रणजीत कुमार राय, डॉ अजय कुमार का माध्यम से ‘रमबोला’ के खोजत ‘रमबोला’ के भोजपुरिया डॉटकॉम (अंजोरिया डॉटकॉम कुछ दिन ले एहू नाम पर उपलब्ध रहल। पिछला दिने एह काव्य के खोजत लिंक पर नजर गइल त देखनी के ई सामग्री कहीं भुला गइल बा। एहसे एकरा के दुबारा अंजोरिया डॉटकॉम पर डालल जात बा। काहे कि ई भोजपुरी साहित्य के एगो थाती हवे। – प्रकाशक-संपादक) पर डाल के अंजोरा में ले अइलीं. बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर बिहार विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में अइला का बाद पत्नी डॉ अनीता सिन्हा, शिष्य कमलेश कुमार, कृष्ण कुमार सिंह, रितुराज, बृजमोहन सिंह, पुत्री संज्ञा सुपात्रा, पुत्र विशाल रंजन, मानस रंजन आ अभिषेक रंजन का प्रेरक बनला पर शायर गुलरेज का माध्यम से ई संस्करण मैथिलि भाषा का कोख से प्रकाशन चलावे वाला हिन्दी-मैथिली के साहित्य साधक अजित आजाद का हाथ में प्रकाशन खातिर गइल। अजित जी ‘रमबोला’ से जुड़ के ‘रमबोला’ छाप रहल बाड़न।

हमरा भरोसा बा ‘रमबोला’ से साहित्य प्रेमियन के जियरा जुड़ाई। हियरा के दियरा जरी।

  • हरीन्द्र हिमकर

 

अक्षर के फूल

पलना के सोहर, अँचरा के लोरी
अगना के मंगल, दुअरा के कीर्तन,
गाँव के गमक सनाइल गीतन के रस
सबके-सब हमरा रोआँ-रोआँ में भीनल बा।
दईया, माई आ बहिन के आवाज जस के तस
कान में रेंग रहल बा।
ककहरा से लेके कॉलेज तक के गुरु लोग के
मान, मन का भोर ना परी।
साथी-संघाती लोग के बेहवार, भाव का भुक्खड़ के
पेट भरले बा।
गाँव का घूरा से शहर का रोड़ा तक
चिकन-रूखर जे बा, जीनगी सभकर गुलाम बा।
‘फुलवारी’ त बड़का विद्वानन के ह, बाकि
भोजपुरी-भारती का चरण में चढ़ावे ला,
फूलल बिन फूलल अक्षर के फूलन के
जोर-नार के जवन माला बनवले बानी
अपने लोग के आशीष पावेला
अपने सभन का सोझा
आपन ‘रमबोला’ लेके खाड़ बानी।
केकरा के सँउपी!
केकरा के छोड़ीं!

– हरीन्द्र हिमकर

(साँच कहीं त अंजोरिया के सपना देखला से पहिले के परिचय हवे हमार ‘रमबोला’ से। पिछला दिने बहुत अफसोस भइल जब देखनी कि पुरनका लिंक काम नइखे करत। हार-थाक के एह के दुबारा अंजोर करे के तय कइनी आ एकर शुरुआत क दिहनी। एकही बार में पूरा किताब टाइप कइल संभव नइखे। एहसे एकरा के लगातार अपडेट करत रहब। रउरा सभे आवत रहीं। – संपादक-प्रकाशक}

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