गोतिया भइले बएमान
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-43
आइल भोजपुरिया चिट्ठी

 

आपन जगिया शिवजी अपने सम्हरिहऽ, गोतिया भइले बएमान

आजु लइकन का जिद पर काकी उहनी के चिरई के एगो कहनी सुनावत रहली। एही बीच लभेरनो आ गइले आ सुने लगले।

किसान आ चिरई के कथा

एगो किसान रहे। ओकर गहूँ के फसल पाकिके तेआर हो गइल रहे। खेत का किनारे एगो पेड़ पर चिरईं घोसला बनवले रहे। ओहमें ओकर छोट-छोट बच्चा रहन स। बालि पाकते चिरइया के चिंता भइल कि खेतवाला त कबो फसल काट सकऽता। ऊ अपना बच्चन से कहलसि-
“तहन लोग ध्यान से सुनिहऽ कि खेतवाला का कहत बा। फेरु हमरा के बतइहऽ लोग।”
पहिलका दिने किसान अपना बेटे का सङे खेत देखे आइल आ बोललसि—
“काल्हु पड़ोसियन के बोला लिहल जाई। हमनी सभ आदमी मिल के फसल काटि लिहल जाई।”
साँझ भइल, चिरई घर लवटलि। ओकर बच्चा एक-एक बात बतवले सन।
चिरई मुस्कराइलि आ कहलसि—
“डेराए के नइखे, काल्हु फसल ना कटाई।” सहिए में अगिला दिने कवनो पड़ोसी ना आइल।
दोसरका दिने किसान फेरु अपना खेत प आइल। एह बार ऊ कहलसि-
“हमार पड़ोसी बिसवास करे लाएक नइखऽ सन। अब अपना हीत-नाता के बोलाइबि।”
बचवा फेरु अपना माई के बतवले सन। फेरु चिरइया कहलसि-
“अबहिंयो डर के कवनो बात नइखे। दोसरा का भरोसे काम छोड़ेवाला के काम कबो जल्दी ना होखे।”
ईहो बात सहिए निकलल। दोसरको दिन केहूँ फसल काटे खातिर ना आइल।
तिसरका दिने किसान बहुत परेशान लउकत रहे। ऊ अपना बच्चन से कहलसि-
“केहूँ का भरोसे रहल ठीक ना होला। आपन हाथ जगन्नाथ। काल्हु भोरे-भोरे हमनिये का मिलिके फसल काटि लिहल जाई।”
जब ई बात साँझि खा लइका अपना माई के बतवले सन त चिरई चिंतित हो गइलि। ऊ कहलसि-
“अब त इचिको देर नइखे कइल जा सकत। जब किसान अपनहीं फसल काटे के सोचि लेले बा त काल्हु फसल हर हाल में ऊ काटी।” फेरु त ओही रात ऊ आपन घोंसला छोड़ि दिहलसि आ अपना बच्चन के लेके उड़ गइलि। सहिए में अगिला दिने खेतवाला आपन फसल काटि लिहलसि। एकर माने भइल कि आपन काम पूरा के पूरा दोसरा का भरोसे छोड़ दिहला के मतलब काम होखे में संदेह बा। एह पर लभेरन बोलले- एगो कहाउत कहाला नू!
आपन जगिया शिवजी अपने सम्हरिहऽ,
गोतिया भइले बएमान

 

अब त लइका एकर माने पूछे लगले सन। लभेरन समुझावे लगले। एकर माने ई भइल कि संसार में आपन कहाए वाला गोतिया-देयाद सभ केहूँ हीते-मीत ना होला। जरूरत परला पर ओकर सहजोग लिहल जा सकऽता बाकिर भरोसा अपने गाटा पर होखे के चाहीं। वादा कइके तूरल आजु-कल्हु कवनो नाया बात नइखे। एक त सब केहूँ आपन काम छोड़िके तोहार साथ देबे खातिर ना बइठल रही आ दोसरे अपना स्वार्थ भा लापरवाही का कारन भा डाहे लोग विश्वासघातो कर सकतारे। एही से आपन कवनो जरूरी काम पूरा के पूरा दोसरा प ना छोड़े के चाहीं, ओहमें अपने जरूर लागल रहे के चाहीं। ओइसे गाँव के जीवन बहुत पहिले से आ थोर-बहुत आजुओ सामूहिक सहयोग पर चलेला। खेती, बियाह, पलानी छावल-उठावल, खटिया बीनल, घर उठावल- सभ में लोग भरसक एक-दोसरा के साथ देबे करेलन बाकिर अनुभव त ईहे कहेला कि संकट का बेरा सभ केहूँ साथ ना देला।

काकी लभेरन से कहली कि लइकन के तनी इतिहासो पुरान के बात बताव कि उहनी पर एकर प्रभाव परो। लभेरन कहे लगले। शिवाजी महाराज के कवनो स्थापित साम्राज्य विरासत में ना मिलल रहे, ऊ अपना साहस, संगठन आ रणनीति पर भरोसा कइलन। ऊ अपना बल पर अपना हिंदवी स्वराज्य के स्थापना कइले।

जवन विद्यार्थी खाली कोचिंग भा नोट्स के भरोसे रहेला ऊ कंपटीशन में दूर-दूर तक ना लउके। बढ़िया नंबर खातिर अपने खुदे अभ्यास करे के परेला। जवन व्यापारी बिना जाँच-पड़ताल के खाली कर्मचारियन का भरोसे रहेला, ओकरा बार-बार धोखा मिलेला। राजनीति में त दोसरा का भरोसा के कवनो जगहे नइखे, ओहिजा छने-छने बाजी पलटत रहेले। तोहन लोग के का लागता कि शकुनी पर बिसवास कइके धृतराष्ट्र आ गांधारी सही कइल लोग? जो ऊ लोग अपना बुद्धि के इस्तमाल कइले रहित आ अपना हाथ में शासन के बागडोर रखले रहित त महाभारत ना भइल रहित।

जो केहूँ सोचता कि रिश्तेदार खराब समय में ढाल बनिके खड़ा हो जाई त ई भूल से अधिका कुछ नइखे। जो केहूँ व्यापार में सोचत बा कि ओकर पार्टनरो ओकरे नियन आपन समुझि के मेहनत करी, त ई ओकर भूल बाटे। सीधा आ साफ बात त ई बा कि जो कवनो काम दोसरा का भरोसे रही, ओकरा दूइए गो चीज मिली- टालमटोल आ बइमानी। बैसाखी सोने के काहें ना होखे, ऊ चले में मदत जरूर करी. बाकिर दउरा ना पाई। जवन काम दोसरा के भरोसे होला, ओहमें लोग सीधापन के फायदा उठावे लागेला अउर जब काम बिगरि जाला, त बहाना के लिस्ट पर लिस्ट परोसे लागेला आ ‘सॉरी’ के भजन सुनावे लागेला। एहसे अपना मूल कर्तव्य, अपना विवेक अउर अपना जिम्मेदारी के कबहूँ कभी छोड़े के ना चाहीं।
——————————————-


संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030

0 Comments

Recent Posts