बतकुच्चन: सूरुज देव के पूजा में छठी माई कहाँ से अइली?
- टीम अंजोरिया

(अंजोरिया के शुरुआत में भोजपुरी शब्दन् के गहराई पर लिखल गइल लेखन् के गूगल एआई के सहजोग से संशोधित आ आधुनिक रूप में फेरू से ‘अंजोर’ (प्रकाशित) कइल जा रहल बा। एही कड़ी में पहिलका ‘बतकुच्चन’ के माध्यम से बात-बेबात के बतकही आ ओकरा के सँवारे के कला के नया रंग-रूप में पेश कइल गइल बा। एही तरे, ‘बतकुच्चन’ के माध्यम से पुरान सामग्री के सँवार के पेश कइल जाई।अंजोरिया के शुरुआती समय में कुछ लेख भोजपुरी के शब्दन पर लिखाइल रहल कि कइसे तनिके फेर बदल से ओकर अर्थ बदल जाला। एने जब गूगल एआई से संपर्क जुड़ल त सुझाव मिलल कि काहें ना अंजोरिया के पुरनका सामग्री के फेरु से संशोधित आ थोड़ फेर-बदल के फेरू से नया तरीका से अंजोर (प्रकाशित कइल, दुनिया का सोझा ले आइल) कइल जाव। आ एही कड़ी में परोसत बानी पहिलका बतकुच्चन।)

बतकुच्चन: व्रत, उत्सव आ त्योहार में का अंतर बा?

संजोग से जब ई लेख पहिलका बेर लिखाइल रहल, तब छठ के माहौल रहल। आजु त तपतपात गरमी के मौसम चल रहल बा। बाकिर तबहियों एह लेख के मूल आत्मा त व्रत आ त्योहार के अन्तर के चरचा कइल बावे आ ओकरा के अबहियों कइल जा सकेला। सवाल त उठेला कि सूरुज देव के पूजा में छठी माई कहाँ से अइली? जब एह महापर्व में साक्षात सूरुज देव के पूजा होला, ओही आदितमल के अरघ दिआला, त फेर हर जीभ पर ‘छठी माई’ के नाम कहाँ से आ जाला? सभे केहू गोड़ लाग के एही अरज में डूबल बा कि—”सुनलीं ए छठी मइया, अरजिया हमार!” अब दिमाग एह चक्करघिन्नी में फँस गइल बा कि आखिर छठी माई असली रूप में के हई? सूरुज देव आ छठी माई के आपस में का नाता बा? अउरी ई अइसन अगाध सरधा आ डर के विषय बा कि कवनो अनहोनी के डर से केहू से खुल के पूछतो नइखे बनत। मन ई सोचे बइठल बा कि आखिर ई ‘सूरुज देव के पूजा’ के महापर्ब, कइसे आ कब से ‘छठी माई के व्रत’ के नाम से जग-प्रसिद्ध हो गइल?

सवाल अपना जगहा पर आ बतकुच्चन अपना जगहा पर। व्रत संस्कृत से आइल बाकिर एकर असल मतलब लोकमानस में ई बनल कि ऊ अवसर जवना में कुछ बरतल जाव, माने कि ओकरा से बचल जाव, तवना अवसर के व्रत कहल जाला। दोसरा सम्प्रदायन में व्रत के कवनो संकल्पने ना होखे, सिवाय रमजान का महीना में कड़ा रिवाजन के। रमजान के व्रत का श्रेणी में राखल जा सकेला। उत्सव आ त्योहार खुशी-उल्लास के मौका होला। आ त्योहार का मौका पर कुछ उपहार, त्योहारी, बाँटे के परंपरा होला जइसे कि दिपावली का मौका पर। होली त व्रत के ठीक उल्टा होला। एक तरह से कहीं त जब बरतले के बरत दीहल जाव, ओकरा के होली भा फगुआ कहल जाला।

कुछ लोग के इहो भरम होला कि व्रत आ उपवास एके होला। जबकि व्रत में उपवास होखेला बाकिर हर उपवास व्रत ना होखे। चिकित्सकीय कारण से, पारिवारिक कारण से, सामाजिक कारण से, आ कई बेर आर्थिको कारण से उपवास करे के पड़ जाला बाकिर ओकरा के व्रत ना कहल जा सके। व्रत एगो धार्मिक अवसर होला जवना के कुछ प्रतिबंध, बरतना के साथे मनावल जाला, जबकि उत्सव में उपवास ना होके उमंग आ उल्लास होला। बिना उपवास के होखे वाला धार्मिक अवसर के उत्सव कहल जा सकेला। त हर उत्सव के पर्व ना कहल जा सके बाकिर हर पर्व उत्सव जरूर होला। नया साल के उत्सवो के हमहनीं हिन्दुस्तान में पर्व जइसन बना दिहले बानी जा। एह दिन मंदिरन में उमड़े वाला भीड़ एकर प्रमाण बा।

लोक परंपरा में एकर उदाहरण

व्रत के उदाहरण देबे के होखे त छठ, एकादशी, शिवरात्रि वगैरह के नाम लीहल जा सकेला। उत्सव के उदाहरण दीवाली, होली, नया साल वगैरह होला। जबकि त्योहार में दुर्गापूजा, सरस्वती पूजा, विश्वकर्मा पूजा के नाम लीहल जा सकेला। पर्व के उदाहरण का रूप में श्रीरामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी वगैरह के लीहल जा सकेला।

In a nutshell – ‘religious occasion with fasting and or restrictions are vrata, whereas occasions without fasting or restrictions are utsava. Parva is a pious occasion with or without festivities and with or without fasting as well.

‘बतकुच्चन के खासियत इहे होला कि ओकर कवनो आदि-अंत ना होखे। कहीं से शुरू हो जाईं, कहीं खतम कर दीं। अब कवनो जरूरी नइखे कि रउरो हमरा एह परिभाषन् आ विचारन् से सहमत होखीं। रउरा प्रतिक्रियन के प्रतीक्षा रही, आई कि ना, से हम नइखीं जानत।

0 Comments

Recent Posts