डाँड़ में दम ना बगइचा में डेरा

– टीम अंजोरिया

#विधायक #मुख्यमंत्री #राज्यसभा-सांसद #नीतीश-कुमार

डाँड़ में दम ना बगइचा में डेरा

weak cannot live in an orchid

अब मथैला देख के रउरा में से कुछ लोग के लागी कि हम जुबान पर चढ़ल कहाउतन मे फेर बदल काहे कर दिलें? त कुछ लोग के इहो लाग सकेला कि ना बढ़िया बदलाव बा आ एह तरह के बदलावन के स्वागत होखे के चाहीं। एक त भोजपुरिहा मनई अइसहीं भोजपुरी का पाछा लट्ठ ले के पड़ल रहेलें। कुछ लोग श्लील आ अश्लील भोजपुरी के शिकायत ले के खड़ा हो जाला त कुछ लोग नीमन आ बाउर ले के। मशहूर उर्दू कलमकार शहादत हसन मंटो पर एक बेर अश्लीलता के मुकदमा अदालत ले चहुँप गइल रहुवे।

नवीन रांगियाल के लिखल लेख से मंटो के लिखल कहानी “खोल दो” के एगो अंश पेश बा –

कमरे में कोई नहीं था। एक स्ट्रेचर था, जिस पर एक लाश पड़ी थी। सिराजुद्दीन छोटे-छोटे कदम उठाता उसकी तरफ बढ़ा। कमरे में अचानक रोशनी हुई। सिराजुद्दीन ने लाश के जर्द चेहरे पर चमकता हुआ तिल देखा और चिल्लाया-सकीना

डॉक्टर, जिसने कमरे में रोशनी की थी, ने सिराजुद्दीन से पूछा, क्या है?
सिराजुद्दीन के हलक से सिर्फ इस कदर निकल सका, जी मैं…जी मैं…इसका बाप हूं।

डॉक्टर ने स्ट्रेचर पर पड़ी हुई लाश की नब्ज टटोली और सिराजुद्दीन से कहा, खिड़की खोल दो।

सकीना के मुर्दा जिस्म में जुंबिश हुई। बेजान हाथों से उसने इज़ारबंद खोला और सलवार नीचे सरका दी। बूढ़ा सिराजुद्दीन खुशी से चिल्लाया, जिंदा है-मेरी बेटी जिंदा है?

 

बतावल जाला कि मंटो पर नाहियो त आधा दर्जन बेर अश्लीलता के मुकदमा चलावल गइल रहल. एगो मुकदमा में मंटो के कहना रहल कि – औरत की छाती को छाती नहीं कहूं तो क्या कहूं?

एकरा के हम कतनो रेघरियाईं कमे रही कि भोजपुरी आम आदमी ( जे श्लील ना होला) जियवले रखले बा। ना त भोजपुरी लिखनिहारन के भरोसे भोजपुरी के नामेलेवा लोग अंगुरी पर गिनाए जोग रह जइतें. अगर लाखों लोग भोजपुरी साहित्यो में रुचि राखेला त ओकरा पाछा भोजपुरी के आम आदमी के भाषा होखल बड़हन कारण बा। भोजपुरी फिलिमन के सफलता से जरतवाही में पड़ल हिन्दी फिल्मकार भोजपुरी के अतना बदनाम करा दिहलें, कि भोजपुरी सिनेमे के जान निकल गइल। अगर भोजपुरी एह श्लील लोगन के भाषा रहीत त आजु देश दुनिया में एक ना हजारों अखबार, पत्र पत्रिका, चैनल चलत रहीत। भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका कहाए वाली पाती के लाखों ग्राहक रहतें। दुनिया में भोजपुरी में शुरु भइल पहिलका वेबसाइट अंजोरिया डॉटकॉम पर देश दुनिया से लाखों भोजपुरिया आवत रहतें। तीस पैंतीस करोड़ लोग से बेसी के भाषा कहाए वाला भोजपुरी के एकाधो फिसदी लोग भोजपुरी वेबसाइटन के देखत-पढ़त रहीत। बाकिर ना। एहिजा त हालात अइसन बा कि भोजपुरी के लिखनिहारो कवनो पत्रिका में छपल आपन रचना छोड़ बाकी रचनन ओरि ताकबो ना करसु।

विख्यात हिन्दी साहित्यकार दयानंद पाण्डेय जी के उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं के एगो अंश-

जइसे कि बाबू साहब लोक कवि से पूछले कि “जब आप एतना बढ़िया लिखीले आ मौलिक तरीका से लिखीले त कवि सम्मेलनन में काहे ना जाईं ? तब जबकि रउरा के लोक कवि कहल जाला.”
“ई कवि सम्मेलन का होखेला ?” लोक कवि खुल के पूछलन.
“जहवाँ कवि लोग आपन कविता जनता का बीचे सुनावेले, गावेले.” बाबू साहब बतवले.
“अच्छा अच्छा समुझ गइनी.” लोक कवि कहले, “समुझ गइनी. ऊ रेडियो टीवीओ पर आवेला.”
“त फेर काहे ना जाईं आप ओहिजा ?” बाबू साहब के सवाल जारी रहे, “ओहिजा बेसी सम्मान, बेसी स्वीकृति मिलीत. खास कर के रउरा राजनितिक कवितन के.”
“एक त एह चलते कि हम कविता नाहीं गीत लिखीले. एह मारे ना जाइले. दोसरे हमरा के कबो बोलावलो ना गइल ओहिजा.” लोक कवि जोड़ले, “ओहिजा विद्वान लोग जाला, पढ़ल-लिखल लोग जाला. हम विद्वान हईं ना, पढ़लो-लिखल ना हई. एहू नाते जाये के ना सोचीला !”
“लेकिन रउरा लिखला में ताकत बा.बात बोलेला रउरा लिखले में.”
“हमरे लिखले में ना, हमरे गवले में ताकत बा.” लोक कवि साफ-साफ कहले, “हम कविता ना लिखीं, गाना बनाइले.”
“तबो, का अगर रउरा के कवि सम्मेलन में बोलावल जाव त आप जाएब ?”
“नाहीं. कब्बो ना जाएब.” लोक कवि हाथ हिलावत मना करत बोललन.
“काहे ?” पत्रकार पूछले,”काहे ना जाएब आखिर ?”
“ओहिजा पइसा बहुते थोड़ मिलेला.” कहि के लोक कवि सवाल टारल चहले.
“मान लीं कि रउरा कार्यक्रमन से बेसी पइसा मिले तब ?”
“तबो ना जाएब।”
“काहे ?”
“एक त कार्यक्रम से बेसी पइसा मिली ना, दोसरे हम गवईया हईं, कविता वाला विद्वान ना.”
“चलीं मान लीं कि रउरा के विद्वानो मान लिहल जाव आ पइसो बेसी दिहल जाव तब ?
“तबहियो ना.”
“अतना भागत काहे बानी लोक कवि कवि सम्मेलनन से ?”
“एहसे कि हम देखले बानी कि ओहिजा अकेले गावे पड़ेला, त हमरो अकेले गावे के पड़ी. संगी साथी होखिहन ना, बाजा-गाजा होई ना. बिना संगी-साथी, बाजा-गाजा के त हम गाइये ना पाएब. आ जे कहीं गा दिहलीं अकेले बिना गाजा-बाजा त फ्लॉप हो जाएब. मार्केट खराब हो जाई.” लोक कवि बाति अउरी साफ कइलन कि, “हम कविता नाहीं गाना गाइले. धुन में सान के, जइसे आटा सानल जाले पानी डाल के. वइसहीं हम धुन सानीले गाना डाल के. बिना एकरे त हम फ्लॉप हो जाएब.”
“गजब ! का जबाब दिहले बानी लोक कवि रउरा.” बाबू साहब लोक कवि से हाथ मिलावत कहले.

एह बातचीत से शायद रउरो समुझ जाएब कि श्लील आ अश्लील के फरक का होला। कुछ लोग कहेला कि श्लील भोजपुरी खातिर नीमन भोजपुरी खातिर हमरा हियां आईं। बाकिर हम अंजोरिया पर अइसन कहे से परहेज करीले1 मन त करेला कि लिख दीं कि अश्लील आ बाउर भोजपुरी ला अंजोरिया पर आईं। बाकिर हमेशा साँचो बोलल नुकसानदेह हो जाला।

हर बेर का तरह आजु फेर बहक गइनी आ कहाँ से कहाँ आ गइनी। से लवटत बानी असल मुद्दा पर। भाजपा सोचलसि कि एक बेर नीतीश बाबू के मना लीहल जाव कि ऊ अब राज्यसभा चलि जासु आ बिहार छोड़ देसु भाजपा के मुख्यमंत्री ला। आ ऊ मानियो गइलन। तब हम लिखले रहीं कि – नीतीश के खेला चालू बा। आ आजु फेरु ओही बात के दोहरावत ना रेघरियावत बानीं कि – नीतीश बाबू के खेला अबहीं चालूए बा।

नीतीश बाबू राज्यसभा ला चुनाइओ गइलन, विधानपरिषद से इस्तीफो दे दिहलन बाकिर मुख्यमंत्री के कुरसी छोड़े का मूड में अबहीं लउकतो नइखन। त सोचनी कि पता लगावल जाय कि राज्यसभा सांसद रहते केहू मुख्यमंत्री पदो पर रह सकेला कि ना? जवन जानकारी मिलल तवना का हिसाब से त ना. बिना सांसद विधायक रहले मुख्यमंत्री बनल जा सकेला आ छह महीना ले ओह पर काबिज रहल जा सकेला बाकिर सांसदी आ मुख्यमंत्री एके साथे ना रहल जा सके। अब इहे देखे के बा कि नीतीश बाबू कहिया राज्यसभा सांसदी के किरिया लेत बाड़न। आ ओकरा पहिले मुख्यमंत्री के कुरसी के मोह छोड़त बाड़न कि ना? आ कि कवनो लोचा खोज लिहें अबहीं कुछ दिन अउर एह कुरसी पर विराजमाने रहे के। पता ना का चल रहल बा। लागत त इहे बा कि भितरखाने खींचतान चल रहल बा। निशान्त के मुख्यमंत्री बनवावल चाहत बाड़न बाकिर इहो नइखन चाहत कि उनुका पर वंशवादी होखे के तोहमत लागो।

देखल जाव कि का होखत बा आ कहिया ले होखत बा। काहें कि भाजपा में अबहीं एतना बेंवत नइखे कि ऊ नीतीश के मरजी का खिलाफ कवनो डेग धर सको। आ एही चलते आजु के लेख के मथैला बना दिहनी कि – डाॅड़ि में दम ना बगइचा में डेरा!

आ कहाउत बिगाड़े का दोष से बाँचे ला इहो कहत जात बानी कि का पता इहे कहाउत असल होखो बाकिर कुछ आम भोजपुरिया एकरा के बदल दिहले होखिहें. आखिर बाबा तुलसीदासो जी के दोहा – सकल पदारथ एही जग माही, करमहीन नर पावत नाहीं के लोग बिगाड़ के बना दिहल कि – सकल पदारथ एही जग माही लउकत बा पर ठेकत नाहीं.

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