भोजपुरी के पहिल नाट्यशास्त्र

–डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

#भोजपुरी नाट्यशास्त्र # डॉ नर्वदेश्वर रॉय

भोजपुरी के पहिल नाट्यशास्त्र

Bhojpuri-Natya-Shashtra

भोजपुरी के लोक-साहित्य- जइसे बिदेसिया, लौंडा नाच, चैता, सोहर का अलावे संस्कार गीत, गाथा साहित्य आदि त सदियन से जीवंत बा, बाकिर लोक-नाट्य का शास्त्रीय पक्ष पर काम ना के बराबर भइल बा। कबो कभार कवनो भूमिका भा कवनो लेख ओगैरह में एकर आंशिक सादर्भिक चर्चा लेखक के औपचारिक मजबूरी से ज्यादा नइखे मानल जा सकत। डॉ. नर्वदेश्वर राय के ‘भोजपुरी नाट्यसास्त्र’ एह कमी के पूरा करता। ई ग्रंथ लेखक के भारतीय आ पाश्चात्य परंपरा में नाटक का शास्त्रीय पक्ष पर भइल कामन का शृंखला में भोजपुरी का ओरि से कइल गइल अद्भुत स्थापना का रूपो में प्रतिष्ठित करत बा।

‘भोजपुरी नाट्यसास्त्र’ के कुल 11 अध्यायन में बाँटल गइल बा, जवन नाटक का जनम से लेके मंचन तक का हर तकनीकी पहलू के समेटत बा। एकरा अध्याय 1 से 3 तक में नाटक के परंपरा, परिभाषा आ तत्त्वन पर चर्चा कइल गइल बा। एह प्रकार से ए अध्यायन में ग्रंथ का सैद्धांतिक पक्ष पर काम लउकता। अध्याय 4 से 6 तक एह ग्रंथ के रचनात्मक पक्ष हटे। एहमें वस्तु-विन्यास, पात्र-योजना आ संवाद-योजना के गहराई से समझावल गइल बा। अध्याय 7 आ 9 में ‘नाट्य रस’ आ ‘नाट्य रूढ़ि’ जइसन जटिल बिसयन के भोजपुरी लोक-संवेदना का सङे जोड़ि के प्रस्तुत कइल गइल बा। ई एह ग्रंथ के सौंदर्यशास्त्रीय पक्ष हटे। अध्याय 8, 10 आ 11 एकर प्रायोगिक आ तकनीकी पक्ष हटे। एहमें रंगनिर्देश, नाटक के प्रकार आ रंगमंच के बनावट पर प्रामाणिक जानकारी दिहल गइल बा।

एह ग्रंथ का मौलिकता का बारे में डॉ. राय स्पष्ट करत कहतानी- “हमरा देखे से अबे भोजपुरी में कवनों मौलिक नाट्यसास्त्र नइखे आइल आ नाटककारो लोग कहीं गंभीर विचार करत नइखे लउकत। ए तरह के ई पुस्तक ‘भोजपुरी नाट्यसास्त्र’ पहिले बेर आइलि बा।” (पृष्ठ संख्या 33)

पहिल अध्याय ‘नाट्यसास्त्र के परम्परा’ में लेखक संस्कृत से लेके हिंदी आ भोजपुरी तक के नाट्य परम्परा के जोड़त बाड़े। अपना विवेचन में भरत मुनि का ‘नाट्यशास्त्र’ के आधार मनले बाड़े, बाकिर ऊ ओहिजे ठहर नइखन जात आ वर्तमान तक के यात्रा करतारे। एकरा शुरुआत में स्पष्ट रूप में भारतीय काव्यशास्त्र का परंपरा के सम्मान लउकत बा। आचार्य भरत, आचार्य धनंजय (दशरूपक), आ आचार्य विश्वनाथ का शास्त्रीय मतन के लेखक भोजपुरी में जइसन सहज व्याख्या कइले बाड़े, ऊ निश्चये प्रशंसनीय बा। एकरा सङहीं लेखक आधुनिक दृष्टिओ के अनदेखा नइखे करत। ऊ पूरा गंभीरता का सङे अरस्तू के त्रासदी सिद्धांत, मार्क्सवाद, फ्रायड के मनोविज्ञान, आ ‘एब्सर्ड ड्रामा’ के (असंगत नाटको के) चर्चा कइले बा। एहसे साफ-साफ पता चलत बा कि एह ग्रंथ में खाली पुरान नियमन के दोहराव नइखे, बलुक एहमें आधुनिक वैश्विक रंग-चेतना का सङे भोजपुरी के संवादो परिलक्षित होता।

दुसरा अध्याय ‘नाटक के परिभाषा’ में डॉ. राय नटक के साहित्य का सभे विधन से बिल्कुल अलग बतावतानी- “नाटक, जेतना साहित्य के विधा बाड़ी स, ओ सबसे अलगा होला। नाटक के छोड़के कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध जइसन सब विधा दूगो आयाम-सर्जक आ श्रोता वाली होली सन । नाटक में तीन गो आयाम होला- सर्जक, प्रस्तुतकर्ता आ सामाजिक। ए तीनों में से एकहू के निकाल के नाटक नइखे हो सकत।” ( पृष्ठ संख्या 35)

तीसरा अध्याय ‘नाटक के तत्व’ में लेखक नाटक छह तत्वन में से खाली तीन गो पर मोहर लगावतारे- “एतना विचार कइला का बाद ई बाति निकलि के आवतिया कि कथावस्तु, कथोपकथन आ रंगनिर्देस- नाटक के तीन गो तत्व होई। ई तीनों तत्वन में आधुनिक विद्वान् लोग के निर्धारित छहो तत्व वस्तु, पात्र आ चरित्र, कथोपकथन, देसकाल, उदेस आ भाषा-शैली के समाहार हो जाता।” ( पृष्ठ संख्या 54)

चउथा अध्याय ‘वस्तु-विन्यास’ में लेखक वस्तु के कथावस्तु के नाटक के आधारशिला मानत बाड़न- “वस्तु नाटक का बहुमंजिली इमारत के नेइँ ह। तरह-तरह का घटना के मिला के वस्तु बनेले। चरित्र, कौतूहल, संघर्ष, रूढ़ि- ई सभ एकरा में समा जाला।” ( पृष्ठ संख्या 57)

पँचवाँ अध्याय ‘पात्र योजना’ में भोजपुरी नाटक का विकास के निखालिस भिखारी ठाकुर से भइला के डॉ. राय स्पष्ट रूप से नकारत बाड़े- “भोजपुरी नाटक रचना पर जवन प्रभाव परल, ऊ लोकनाटक, संस्कृत नाटक, अँग्रेजी नाटक के रहे आ हिन्दी नाटक का माध्यम से होके आइल रहल। ई कहला में कवनों दुराग्रह नइखे।” (पृष्ठ संख्या 99)

छठवाँ अध्याय ‘संवाद योजना’ में भोजपुरी नाटक का भाषा का संदर्भ में लेखक के ई स्पष्ट अभिमत बा कि संवाद के रचना सावधानी पूर्वक होखे के चाही- “संस्कृत, अरबी-फारसी के सब्द ऊहे होखे के चाही जवन लोक में प्रचलित होखे। अइसन सब्द ओ भाषन का भूमिका के निर्वाह त करबे करी, भोजपुरियों में खप जाई आ दर्सक के कवनों तरह से अस्वाभाविक ना लागी”। ( पृष्ठ संख्या 173)

डॉ. राय के मान्यता बा कि भोजपुरी नाटक में संवाद के मौलिक विकास भइल बा। ऊ दोसरा भाषा का संवादन से बहुत कुछ लिहला का बादो अपना प्रकृति का अनुरूप अपना के विकसित कइले बा। (पृष्ठ संख्या 152) एकरा के अउरी स्पष्ट करत उहाँका लिखतानी कि भोजपुरी नाटकन में छव तरह के संवादन के प्रयोग भइल बा- कथा के विकास करेवाला, चरित्र के विकास करे वाला, तीव्रगति वाला, मन्दगति वाला, सूचक आ काव्यात्मक। अच्छा अच्छा नाटकन में एही तरह के संवाद मिलेला। (पृष्ठ संख्या 158)

सतवाँ अध्याय ‘नाट्यरस’ में लेखक वर्तमान में रस के अप्रासंगिक नइखे मानत- “रस अजुवो पहिलहीं जेतना प्रासंगिक बा। साहित्य में जबले भाव के अभिव्यक्ति होई, तबले रस के स्थिति रही, साहित्य खाली बुद्धी के विरासत नइखे हो सकत। बुद्धी के विरासत विज्ञान ह।” (पृष्ठ संख्या 187)

अठवाँ अध्याय ‘रंगनिर्देस’ में लेखक के कहनाम बा कि नाटक के रंगकर्मी सवख से नाटक खेलेलन। भोजपुरी नाटक का रंगकर्मी के असली काम त दोसर होला। ई एगो सचाई बा कि भोजपुरी रंगमंच के समूचा ढाँचा अबे अव्यावसायिक रंगकर्मियने पर टिकल बा। अइसना में नाटककार का रंगनिर्देस ओतने देबे के चाहीं, जेतना जरूरी बा। जटिल रंगनिर्देस असुविधा पैदा करेला।

दसवाँ अध्याय ‘नाट्य रूढ़ि’ में बतावतानी कि रूढ़ि के नाटक से बड़ा गहिर सम्बन्ध बा। रूढ़ि नाटक के सरूप आ यथार्थता देली स। नाटक के तीन घंटा के भइल आ तीन अंक में समाप्त भइल रूढ़िये ह। जवना देस आ काल के घटना होले, सामाजिक बिना तर्क के ओके मान लेला। आजुवे के घटना नाटक में एही समय घटित ना हो सके। जवन घटित बा, नाटक में ओकर प्रस्तुति होले । ओइसे अबेवहारिक आ अयथार्थ लागी कि दर्सक एके कइसे मान लेई, बाकिर इहे होला। पात्रो खातिर इहे बा। कवनों चरित्र में एगो अभिनेता उतर जाला आ ओकर कल्पना क लिहल जाले । भोजपुरी नाटक के पात्र भोजपुरिये के प्रयोग करी। ऐतिहासिक काल के चाहे बिदेसी पात्र के भाषा भोजपुरी ना ह, बाकिर भोजपुरी नाटक में आवते भोजपुरी बोले लागी। (पृष्ठ संख्या 217)

एह ग्रंथ के एगो बड़ उपलब्धि एकर भाषा बा। लेखक संस्कृत का तत्सम शब्दन के ‘यथावत’ अपनाके भोजपुरी के एगो ‘अकादमिक मानक’ (Standard) रूप देबे के कोशिश करत लउकतारे। लेखक के भाषा-शैली ई बतावे में सफल बिया कि भोजपुरी खाली खेत-खरिहान के भाषा ना हटे, बलुक ई ‘शास्त्र’ भी लिखे के सामर्थ्य राखेले। एगो बात समझ में ना आइल कि तत्सम शब्दन के ‘यथावत’ राखे के आग्रही लेखक पुस्तक के नाँव ‘भोजपुरी नाट्यसास्त्र’ काहें रखले, ‘भोजपुरी नाट्यशास्त्र’ रहे देबे में उनुका का परेशानी रहे।

किताब में लोक-नाट्य (जइसे- डोमकच, नेटुआ नाच आदि) पर तनिका अउरी विस्तार से चर्चा भइल रहित त सोना पर सुहागा होइत। सङही, आधुनिक डिजिटल युग (यूट्यूब आ ओटीटी) का नाटकन पर लोक-नाट्य का प्रभाव के तनिका अउर गहराई से देखे के जरूरत रहे। भोजपुरी के सबसे कमजोर पक्ष ई बा कि कवनो बड़हन प्रकाशक का अभाव में एकर साहित्य आसानी से उपलब्ध नइखे हो पावत, एहसे खाली भोजपुरी नाटकन के विश्लेषण का आधार पर कवनो मौलिक स्थापना के गुंजाइश बहुत कम बनता। एह सब का बावजूद, ‘भोजपुरी नाट्यसास्त्र’ एगो कालजयी कृति बाटे। ई कहे में कवनो अत्युक्ति नइखे कि डॉ. नर्वदेश्वर राय भोजपुरी के ओकर ‘शास्त्र’ लौटा देले बानी।

समग्रतः कहल जा सकत बा कि ई ग्रंथ तथ्यगत रूप से प्रामाणिक, अकादमिक रूप से अत्यंत गंभीर आ भोजपुरी के ‘मानक भाषा’ का रूप में स्थापित करे में सफल बाटे। आवेवाला दिनन में रंगमंच के कवनो विद्यार्थी भा शोधार्थी खातिर एकर अध्ययन अनिवार्य मानल जाई, एहमें कवनो संदेह नइखे।

 

पुस्तक : भोजपुरी नाट्यसास्त्र

लेखक डॉ. नर्वदेश्वर राय

प्रकाशक : मनीष प्रकाशन, वाराणसी-5

मूल्य : 1150 रुपये

पृष्ठ संख्या : 272

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संपादक, सँझवत
देवनगर, पिपरा रोड, पटना-30

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