– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
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सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-33
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
जब आवत मास चइतवा, माते आलस से मनवा
History of Durga-Puja

गरमी में अचके बरिसात का आगम आ ठंढा बयार से गरम कपड़ा निकाले के परि गइल रहे। दू दिन बाद घाम में तनी गरमी आइल रहे, त खइला का बाद काकी तनी ओठँघि गइल रहली। तले लभेरन पहुँचले। काकी आँखि मीजत बहरी अइली- “तनी हलका उँघाई अस लागि गइल रहल हा।” लभेरन का मुँह से निकलल-
जब आवत मास चइतवा,
माते आलस से मनवा
बढ़ते बइसाख करेला,
धूमिल धुरि से असमनवा।।
काकी कहली- का कहल जाउ, दिनवे अइसन होता। ई कविता के लाइन बड़ा नीमन बिया। कवना कवि के हटे?
लभेरन कहले- “ई डॉ. कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र’ के लिखल हटे। उनका ‘बारहमासा’ कविता में बाटे”। फेरु त फगुआ का बाद चइता-चइती पर बात शुरू हो गइल।
काकी कहली- चइत के महीना कवनो साधारन महीना ना हटे। एह घरी गरमी त बढ़िए गइल रहेले, बाकिर महुआ के गंध आ गऽहूँ के कटाई का हुलास में आदिमी के त छोड़ऽ, कोइलरियो सनकि जाले। गाँव में जब ढोलक-डंफ का सङे झलकुट्टन प एक साथ गवाला- “बोलेले कोइलिया ए रामा चइत मासे” तब लागेला कि चइत का अइला पर सहिए में छाती बिहरि जात होई। “अइले चइत उतपाती ए रामा, बिहरेला छाती” केहूँ अइसहीं ना लिखले होई।
लभेरन के तनी उत्साह बढ़ल। कहले- अतने ना काकी, चइत के कवनो मुकाबला नइखे। एक त बरिस के पहिला दिन आ ओही दिन से नवरात्र शुरू। जेने देखीं चंडी पाठ का सङे उपवास आ फलाहार। केहूँ मानस के नवाह्नपारायण ठनले बा त केहूँ सुंदरकांड। चार दिन बितते छठि के ब्रत आ गइल आ शारदा सिन्हा के गीत बाजे लागल अउर ओहू प साँझि ढरते चइता के सुर फूटे लागल।
काकी हूँ में हूँ त मेरवली बाकिर उनुकर चिंतो मुँह से निकलि गइल- “कुछू होखो, हेह मटिलगनन प प्रकृति के भा परब-तेवहार के कवनो असर त नइखे नु होखेवाला! जब देखीं, जहाँ देखीं पाँकिए में भँइसि नियन लोटियाए लागतारे सन। पता ना इहनी के गंदा गावल कब बन्न होई। ई ठीक बा कि चइता में शृंगार रस के गाना गवाला, बाकिर ओहमें ओह मेहरारुन के बात होला, जे बिरह में मन मधिमवले आङन का कवनो कोना में आँखि पोंछत रहेली सन। फगुआ में मरद के बहरा से ना अइला का कारन ई बिरह ढेर बढ़ि जाला। जेकर मरद घर में बा त ओकरा चानिए बा, उनुका संयोग शृंगार वाला मन के भी कवि लोग खूब भँपले बाड़न आ ओइसनो चइता लिखले बाड़े। बाकिर आजु-काल्हु के छोकड़ा गायक त हदे क देले बाड़न स।”
लभेरन कहले- “जानतानी काकी, ई चइता आदि जवन गीत बाड़े सन नू, ऊहे हमनी का विरासत के बँचवले बाड़न स, ना त देखते बानी कि खेती के का हाल हो गइल बा। रोज नया-नया तरीका आ रहल बा आ लोग धीरे-धीरे समूह में से दूर होत जा रहल बाड़न।”
काकी ओहमें जोरली- “अब फगुओ-चइता कहाँ पहिले नियन गवाता? अब त नरियारे बाबा, काली जी आ मठिया प गावेके नेग हो जाता आ एकरा बाद जे अपना किहाँ विशेष रूप से बोलावल त ओकरा किहाँ गवा जाता। पहिले कतनो थाकि जाउ, भले आवाज बइठि जाउ बाकिर बिना पुछले घरे-घरे गवात रहे।” लभेरन बोलले- अब गाँव में आदमियो कहाँ रहि गइल बाड़े।
छोड़ऽ एह बात के, अब एकर कवनो मतलब नइखे रहि गइल। ई बतावऽ कि दुर्गापूजा के असली समय कवन ह, चइत कि कुआर? दुर्गा जी के मूर्ति त दूनो महीना में धराले!- काकी बोलली।
लभेरन के अब एगो नीमन टॉपिक मिल गइल रहे। चउकी प आराम से पालथी मारिके बइठि गइले आ बोले शुरू कइले-
1757 का पलासी के युद्ध जितला का बाद रॉबर्ट क्लाइव अपना जीत के उत्सव मनावल चाहत रहे। ओह घरी चइत के नवरात्र दूर रहे। तब नबकृष्ण देव (शोभा बाजार राजबाड़ी, कोलकाता) सुझाव दिहले कि माता दुर्गा के अकाल बोधन पूजा (असमय आह्वान) कइल जाउ। एकरा पाछा उनुकर तर्क रहे कि भगवान राम रावण का वध खातिर कुआर में देवी के आह्वान कइले रहन, जेकरा के ‘अकाल बोधन’ कहल जाला। क्लाइव के ई ठीक लागल आ ऊ कुआर में भव्य पूजा आयोजित करवलसि ताकि स्थानीय जनता प्रभावित हो सको। एहिजे से कुआर का दुर्गा पूजा के औपनिवेशिक अउर जमींदारी संरक्षण मिलल आ फेरु त ई शारदीय नवरात्र वासंती पूजो से बेसी लोकप्रिय हो गइल। कुछ इतिहासकार एकर ठीकरा अंग्रेजने का माथा पर फोरले बाड़े। ओह लोग के कहनाम बा कि दुर्गापूजा के अंग्रेजे ‘सोशल नेटवर्किंग’ अउर अपना शक्ति प्रदर्शन का माध्यम से प्रमोट कइलन स, जेकरा चलते चइत वाली पूजा धीरे-धीरे पारिवारिक उत्सव तक सीमित रह गइल आ कुआर के पूजा एगो सार्वजनिक महोत्सव बन गइल। 19वीं शताब्दी का आरंभिक समाचार पत्रन (जइसे ‘समाचार दर्पण’, 1818) में एह बात के लेख मिलऽतारे सन कि कइसे कलकत्ता के ‘बाबू कल्चर’ आ जमींदार कुआर का दुर्गापूजा के अपना प्रतिष्ठा के प्रश्न बना लेले रहे।
काकी एगो लंबा साँस लिहली- बतावऽ, ई हमरा आजु पता चलऽता।
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


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