-(स्व.) केदारनाथ सिंह

#गाँव #संस्मरण #भोजपुरी

(संस्मरण)

हमार गाँव

पर किस तरह मिलूँ
कि बस मैं ही मिलूँ,
और दिल्ली न आए बीच में
क्या है कोई उपाय!
-‘गाँव आने पर’

जहाँ गंगा आ सरजू ई दूनो नदी क संगम बा, ओसे हमरे गाँव के दूरी लगभग आठ किलोमीटर होई। दूनो नदी क बीच में पड़ला के वजह से एह इलाका के ‘दोआब’ कहल जाला। एक तरह से ई इलाका उत्तर प्रदेश आ बिहार के सीमा-रेखा पर बा, बाकिर सांस्कृतिक दृष्टि से ए इलाका के संबंध बिहार से अधिका बा, खाली नाता-रिश्ता ना, बल्कि खान-पान आ बोलियो-बानी बिहारे से अधिक मिलेले। एह क्षेत्र के भोजपुरी गाजीपुर आ बनारस के भोजपुरी के अधिका निकट पड़ेले जवन अपने बनावट में आरा जिला के भोजपुरी के अधिका निकट ह। हमरा गाँव से चार किलोमीटर दक्खिन गंगा बाड़ी आ करीब-करीब ओतने उत्तर सरजू। कहल जा सकेला कि ई दूनों नदी के माटी-पानी से ई इलाका बनल बा। पहिले जब बाँध ना बनल रहे त जुलाई-अगस्त के महीना में ई दूनो नदी मिल के एक हो जात रहल। हमरा इयाद में ऊ छोटकी नदी बहुत गहराई में कहीं आजो मौजूद बा जवन हमरा चबूतरा के सामने बहेले आ एक ओर जहाँ ओकर एक छोर गंगा से मिलेले त दूसर सरजू से। शायद एही वजह से नदी के साथ हमार मन के बहुत गहरा जुड़ाव बा।

जवना गाँव में हम पैदा भइल रहनी ओकर नाम ह चकिया। एकर ठीक-ठीक इतिहास त हमरा पता ना बा, बकिर एक सम्बन्ध में कई तरह के कहानी सुनल जाले जवने के सार इहे ह कि एह गाँव के मूल निवासी कहीं बाहर से आइल रहें आ नदी के किनारा देख के इहें बस गइलें। पहिले जब आवागमन के साधन कम रहे त एह नदी क उपयोग व्यापारिक काम खातिर होत रहे। धीरे-धीरे एकर उपयोग कम होत गइल आ हालत ई बा कि नदी अब नाममात्र के नदी रह गइल बा। कभी केहू के एह विषय पर खोज करे के चाहीं कि देश के दूरवर्ती भाग में बहे वाली अइसन असंख्य नदियन के आज का हालत बा। सभ्यता के विकास के साथ-साथ नदी काहें सूखत जात बाड़ी स? ई हमनी के समय के एगो बड़ा सवाल बा, जवना के उत्तर हमनी के खोजे के चाहीं।

लगभग पचास साल पहिले चकिया छोड़ले रहलीं, हालाँकि चकिया से सम्बन्ध अभिनो छूटल नइखे, बीच-बीच में जात रहीलें, बाकिर अब गइला पर बुझाला जइसे कवनो परदेसी लेखा भा जादे से जादे कवनो मेहमान लेखा। ई स्थिति बहुत तकलीफदेह होले आ एकरा दंश से बचल मुश्किल होता। सब गाँवन के तरह हमरो गाँव ऊ नइखे रह गइल जवन हम छोड़ले रहलीं। हवा-पानी से लेके विचार-व्यवहार तक बहुत बड़ बदलाव देखल जा सकेला। एगो बहुत प्रत्यक्ष बदलाव त ईहे बा कि गाँव क आबादी बढ़ कइल बा, साक्षरता बढ़ गइल बा, लेकिन सबसे बड़ विडम्बना ई बा कि गाँव के जवन तथाकथित शिक्षित वर्ग बा शायद उहे सबसे अशिक्षितो बा। असल में जवना तरह से ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा के विकास हो रहल बा, ई बुनियादी दोष ओकरे में निहित बा, बाकिर इहाँ ओ प्रसंग के विस्तार में गढ़ले के जरूरत नइखे।

पहिले हमरा परिवार में खेती-बारी होत रहे, अब ऊ बन्द हो गइल बा। खेती जादे ना रहे, बकिर खाए-पीए लायक हो जाए- ओमें से कुछ खेती आजो बाँचल बा। ओकरा के हम बचा के रखले बानी। एह पवित्र मोह खातिर कि कभी-कभी एही बहाने गाँवे जात रहीं। अब गाँव गइले पर सबसे बड़ समस्या ई होला कि बतियाईं केकरा से। हमरा अपना उमिर के जतना संगी-साथी बाड़े ऊ अपना-अपना काम में व्यस्त रहेलें, आ ओमें से कई लोग बाहर चल गइलें। बहुत लोग त ए दुनिए में अब नइखे। एह समस्या के समाधान हम एह तरह से खोजले बानी कि गाँव में जेतना दिन हम रहेलीं-हिंदी भुला जानी। कभी केहू पढ़ल-लिखल हिन्दी बोलबो करेला त हम धन्यभाग से भोजपुरिए बोले के कोशिश करेलीं। एकर दू गो फायदा बा- जहाँ भोजपुरी के अभ्यास ताजा हो जाला उहें एक बार हिन्दी के एक तरफ रख देला संस्मरण के बाद गाँव के छोट-से-छोट आदमी से बतियइले में कवनो बाधा-व्यवधान ना रह जाला। भोजपुरी के सहज आत्मीयता हमरा एक अहसासो के तार-तार क देले कि हम परदेसी हो गइल बानीं। तबो गाँव के चीज आ अपना सम्बन्ध के बीच जवन एगो अन्तराल आ गइल बा ऊ कई बार साफ दिखाई पड़ेला। ए सम्बन्ध में एगो छोट घटना क जिक्र करब। एगो हमार बचपन के साथी, जेकर एही साल निधन हो गइल ह, हमरा रास्ता में मिल गइल त ए अनचीन्हारपन के अउर तीखा बोध भइल। ओकर नाम जगरनाथ रहे आ आज के भाषा में ओके दलित कहल जाई। त काफी लमहर अन्तराल के बाद मिलला पर हम जगरनाथ से कहनी कि साँझ के तोहसे भेट होखे के चाहीं। साँझ के जगरनाथ अइले, आवते सवाल कइले- ”बताईं कौन काम बा?“ हम जगरनाथ के कौनो काम खातिर ना बोलवलें रहीं, असहीं मिले खातिर बोलइलें
रहीं। बाकिर उनका सवाल के बाद हमरा पहिला दफे ई महसूस भइल कि एतना दिन गाँव से बाहर रहला के बाद खुद गाँव के लोगन से हमार संबंध चुपचाप बदल गइल बा। ई ए गो आघात नियन रहल लेकिन एकरा बावजूद हम लगातार ई कोशिश करत रहलीं आ आजुओ करीलें कि गाँव जाईं त ओकरा चौहद्दी में ओसहीं प्रवेश करीं जइसे आज से पचास साल पहिले
करत रहीं। लेकिन ई पचास बरस के टाइम के नकारल ना जा सकेला, अब त कई बार गइला पर ईहो सोचे के पड़ेला-जइसन अपना एगो हिन्दी कविता में हम लिखले बानीं- /आ तो गया हूँ/पर क्या करूँ मैं?/-गाँव आने पर…/

ए अनुभव से बचल ना जा सकेला, काहे से कि गाँव के जिन्दगी के एगो जवन आपन लय बा ओकरा साथ शहराती जिन्दगी के लय क संगत बइठावे में कई बार दिक्कत होले। एसे कई दफे ओ अनचीन्हारपन के बोध अवरू तीखा हो जाला जवना के हम पहिले जिक्र कइले रहनीं। लेकिन गाँव के एगो अउरी लय बा जवना के ग्रामीण प्रकृति के लय कहल जा सकेला-ऊहाँ के नदी, नाला, खेत, खरिहान, टोला, कछार, पेड़-पौधा इहाँ तक कि कीड़ो-मकोड़ा में, ईहो लय अब गाँव में ओही लेखा नाहीं रह गइल जवना के हम पहिला दफे गाँव में छोड़ के आइल रहीं। सबसे जादे तकलीफ आज ओ गाँव के नदी के देख के होला जवन हमरा घर के ठीक सामने बहेले। बहेले- ई खाली एगो मुहावरा के रूप में कहल जाला असल में अब ओकर बहाव खतम हो गइल बा।

अपना देश के बहुते नदियन लेखा हमरो गाँव के नदी भरा रहल बिया। ऊ अब नदी से एगो जबदल पानी वाला पोखरा बन गइल बिया जवना में थोड़के भर गति खाली बरसात में आवेले। लेकिन सबसे दुखद बात त ई बा कि आज गाँव के लोगन के स्मृतियो से धीरे-धीरे ऊ नदी हट रहल बिया। अगर हमरा से पूछल जाई कि पिछला पचास साल में हमरा गाँव के सबसे बड़ दुखद घटना भा त्रासदी का रहल बा, त हम कहब – हमरा नदी क मृत्यु!

जइसे माई के गोदी में बच्चा पलेला, हम आ हमार बहुते समउमरी लोग ओ नदी के गोदी में ओहीं लेखे पलल। सँउसे वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद ई केतना तकलीफदेह बा कि गाँव के नदी मर रहल बाड़ी स आ ओ कुल के बचावे खातिर कवनो उपाय केहू के पास ना बा। लेकिन गाँव में सबकुछ एही लेखिन नाही बा। बहुत कुछ टूट बिखर गइल बा, बहुते गीत जवना के
हम लरिकाईं में सुनले रहलीं उहाँ केहू के याद ना बा, शायद बहुत-सा कीड़ों-मकोड़ा अब बहुत कम दिखाई पड़ेलन स, लेकिन ए सबकुछ के साथ-साथ गाँव के जिन्दगी के बाँधे वाली एगो चीज हम अबहियों पावेलीं। ओकरा के ठीक-ठीक नाम देहल हमरा खातिर मुश्किल बा। बाकिर ई बात अबहियो बाँचल बा कि एक आदमी दूसरा आदमी के इहाँ बिना कामो के जा सकेला, कुछ देर हँस-बोल सकेला आ सारी पंचाइती राजनीति के बावजूद एगो अपना गाँव खातिर चिन्तित भा परेशान होइ सकेला। ई बात हमरा के एगो खास ढंग से प्रभावित
करेले आ शायद हम बार-बार गाँव जाईलें त ओही के खोजे खातिर जाईलें। कई बार ई डर जरूर लागेला कि ऊहो कहीं नदी लेखा धीरे-धीरे खतम न हो जाये। ऊ कइसे बचल रही, ई हम ना जानेनी। कबो-कबो ईहो डर लागेला कि अगर नदी ना रही त गाँव के अस्मितो के ना बचावल जा सकेला। एकाध बेर गाँव के कुछ उत्साही युवक लोग नदी के बचावे खातिर उत्सुक
दिखाई पड़ेला त भीतर थोड़ा ढाँढ़स होला कि शायद गाँव के अस्मिता चाहे जतना जर्जर हो गइल होखे, बचावल जा सकेला। फिर ईहो बुझाला कि खाली एगो गाँव के बचावे के सवाल ना ह। एह देश के सगरो गाँव धीरे-धीरे आपन अस्मिता खो रहल बाने स आ एकरा ओर प्रायः सोच-विचार क प्रक्रिया बन्द हो गइल बा।

ई सब परिस्थिति परेशान करेला, लेकिन गाँव अबहियो बार-बार खींचेला त उहाँ कुछ त होई जवन ओ परिवेश में न मिले, जवना में अब रहे खातिर हम आ हमरा जइसन लोग अभिशप्त बा।

भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के जनवरी 2026 अंक से साभार

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