टैग: भोजपुरी

लोक कवि अब गाते नहीं – १७

(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) सोरहवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं कि कइसे आपन दलाली वसूले का फेर में गणेश तिवारी अपने पट्टीदार फौजी तिवारी का खिलाफ पोलदना के हथियार बनवलन. बाकिर जब बाद में...

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पइसवा जात कहां बा

– जयंती पांडेय राहुल गांधी अपना चुनाव प्रचार में कई हाली कहले कि गांव के विकास के खातिर जवन रुपिया आवे ला तवना में से दसे पइसा मिले ला बाकी गायब हो जाला. काफी सोचला पर ई पता ना चलल कि के खा जाला. मन में 90 पइसा हजम करे...

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साल २०२५ में कहल जाई : एगो लोक भाषा होखत रहुवे

बाजार के दबाव में तिल-तिल कर के मरत भोजपुरी भाषा के दुर्दशा लेके हम कुछ समय पहिले एगो उपन्यास लिखले रहीं “लोक कवि अब गाते नहीं.” इंडिया टुडे में एकर समीक्षा लिखत मशहूर भाषाविद् अरविंद कुमार तारीफ के पुल बान्हत एगो...

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जनभाषा के राजसत्ता कबहियो राजभाषा के दरजा ना देव : नीरन

“जनभाषा कबहियो शासन के भाषा ना होले. राजसत्ता कबहियो जनता के भाषा के राजभाषा के दरजा ना देव. फेर भोजपुरी त लोकभाषा हिय, संवेदना आ प्रतिरोध के जनभाषा. ऊ सरकार के मुँह ना जोहे. अगर संविधान के अठवीं अनुसूची में एकरा जगहा नइखे...

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पाकिट में दाम नईखे तऽ राउर कवनो मान नइखे

– जयंती पांडेय ‘एगो कहावत बा कि पाकिट में दाम नइखे तऽ राउर कवनो मान नइखे। गांव में कहल जाला कि मरद के मरद रुपिया हऽ ना तऽ सब मरद के मर्दानगी बेकार. काल कई जगहि चुनाव के रिजल्ट आइल. बड़े बड़े ज्ञानी लोग कहल कि भ्रष्टाचार के...

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