–डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल
#भोजपुरिया चिट्ठी #फगुआ #फूहरपन #गीत-गवनई #डॉ-रामरक्षा-मिश्र-विमल
तीन गो चिट्ठी एके साथ
three letters in one
(एगो फिल्मी गाना हवे – ‘ना तुमसे हुई ना हमसे हुई, दोनों से मुहब्बत हो ना सकी।’ रउरा इयाद ना करवनी, विमल जी भेजनी ना, आ हम सोचत रह गइनी कि का पता फगुआ का रागरंग में हो सकेला कि विमल जी व्यस्त होखीं। बाकिर जब फगुओ बीत गइल आ कवनो चिट्ठी ना आइल त पूछहीं के पड़ल। आ जबाब में विमल जी के बुझाइल ना। उहां के कहनी कि हमरा लागल कि हम भेज दिहले बानी आ रउरा कतहीं व्यस्त होखब।
से एही विभ्रम में तीन हप्ता के चिट्टी एके साथ दे देत बानी। – अंजोरिया प्रकाशक)
सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-29
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
रंग अबीर में धूम मचाके के नहवाई गाँव

काकी अतना ना देश-दुनिया आ समाज खातिर सोचेली कि जब देखीं, परेसाने रहेली। जब ले लभेरन आइल बाड़े, ऊ फगुए पर परल बाड़ी। लभेरन टोकले- “अब फगुआ के टाइम आइल बा, त फगुआ गवइबे नु करी?” काकी के कहनाम रहे कि फगुआ त पहिलहूँ गवात रहे, आजु कवनो नाया से थोरे गवाता! पहिले कतना नीमन भजन गवात रहे फगुआ में!
मुरलीवाले प्यारे, खेलत होरी।
रंग अबीर के धूम मचल बा खेलत संग किशोरी।
ओह घरी साल भरि पहिलहीं से बहरवाँसू लोग के होली में गाँव जाएके तेयारी शुरू हो जात रहे। विमल जी का एगो गीत के लाइन देखऽ, ओहमें एकर बिंब साफ-साफ लउकता-
फगुआ आई डंफ सेंकाई रोज ठोकाई ताल
रंग अबीर में धूम मचाके के नहवाई गाँव?
अब त अइसन-अइसन गाना चारू ओरि बाजता कि कान पाकि गइल बा। लोगो में त केहूँ रोके-टोकेवाला नइखे लउकत!
लभेरन कहले- लोगन का बारे में त अब मतिए सोचीं। पहिले के लोग का बाति के कीमत रहे, ऊ लोग मुँहे पर सब कुछ बोल देत रहन बाकि आजु-काल्हु के लोग मिठबोलवा हो गइल बा। पहिले गाँव-घर में आ परिवार में मालिक होखत रहन आ साफ बोले-बतियावे में बिसवास राखत रहन। ओह घरी फूहर गाना लिखे-गावेवाला मिल जइते त कँड़ा जइते। अब त जेकरे के देखीं मालिके बुझाता। दिन प दिन कानूनो अतना कड़ा होत जाता कि अब केहूँ मुँह खोले में सोचता।
काकी कहली- ऊ त ठीक बा बाकिर जब चारू ओरि होली का नाँव पर फूहर गाना गंध मचवले बाड़े सऽ त ऊ केकरा घर के बेटी-बहिनी सूनत नइखी स? हम त देखऽतानी कि ओही प नया-नोहर बेटी-पतोहि रीलो बनावतारी सन। अब केहूँ मान में कहाँ बा?
जाए दीं काकी, एह घरी पूरा दुनिया में कम ज्ञान आ कल्पित आधुनिकता के जइसन अफरा-तफरी मचल बा, ओहमें एह तरह के स्थिति अनासे नइखे आइलि, ई त आवहीं के रहे। तबो एकदमे से सभ गड़बड़ाइए गइल बा, अइसनो नइखे। आजुओ होली में भजन गावे के परंपरा खतम नइखे भइल। जब गाँव में गोल में बइठि के लोग गावेलन त ऊहे कुल्हि गावेलन आ मन से झूमिके गावेलन। हे गीतन के जमाना कबो खतम होई?
बृज में हरि होरी मचाई।
इतते आवत नवल राधिका, उतते कुँवर कन्हाई।
हिलि-मिलि फाग परस्पर खेलत, शोभा बरनि न जाई ।
काकी चिंता प्रकट कइली- का अब खाली फुहरे गाना लिखाता, नीमन लीखल बने हो गइल बा?
लभेरन गंभीर हो गइले- “बिल्कुल ना काकी! गाना में जतना फुहरकम देखतारू, ऊ कवनो गीतकार के लिखल ना हटे। जेकरा ना छंद-ताल के कवनो ज्ञान बा नु अपना संस्कृति-सभ्यता के, ऊहे लोग आजु-काल्हु गायकन खातिर तुकबंदी करतारन आ गंध मचववले बाड़न। जे वास्तव में गीतकार बा, ऊ भद्दा गाना भला लिखि सकता? लीं, होली पर रामरक्षा मिश्र विमल के एगो नवगीत पढ़ीं आ तब बताईं कि भोजपुरी गीतकार कबो गंदा लिख सकऽतारे! गीत में शृंगार रस के पुट बा, होली पर जवन चुहल बढ़ि जाला, ओकर नया-नया बिंब मिली एहमें। अधिकां बात प्रतीके में कहाइल बा। पाठक पढ़ि के आनंदो प्राप्त करी आ ओकरा मनोरंजन का स्तर में कवनो गिरावटो ना आई। देखीं कि फागुन का आवते का-का बदलाव आ जाता!
फागुन का आसे होखे लह-लह बिरवाई।
डर ना लागी बाबा का नवकी बकुली से
अङना दमकी बबुनी का नन्हकी टिकुली से
कनिया पेन्हि बिअहुती, कउआ के उचराई।
बुढ़वो जउवन राग अलापी, ली अङड़ाई
चसमो के ऊपर भउजी काजर लगवाई
बुनिया जइसन रसगर हो जाई मरिचाई।
छउकी आम बने खातिर अकुलात टिकोरा
दुलहिन मारी आँखि, बोलाई बलम इकोरा
जिनिगी नेह भरल नदिया में रोज नहाई।
अपना भाषा का स्वीकृत मर्यादा में जब कुछऊ लिखाई त ऊ सभका खातिर ग्राह्य होई आ जो व्यंजना में कहल जाई त सोना में सोहागा! बाकिर अतना सोचिके के लिख सकेला- ई बात गवनिहारो लोगन के त जाने के नू चाहीं! अपना गायन का घमंड में भा कंपनी का दबाव में गायको लोग के बाँचेके चाहीं! ओइसे, साँच पूछीं त हमरा त ईहे लागता कि अब लौंडा नाच आ नौटंकी के जमाना रूप बदलिके फेरु आ गइल बा। बिना कवनो महिला नचनिया के कवनो गायक गावे खातिर तेयारे नइखन होत आ जो तनी ऊहो डाँड़ ना हिलवले भा डाँड़ में डाँड़ ठेकाके तनी भँड़इती ना कइले त उनुका लागता कि कुछु खाली रहि गइल, पता ना फेरु बोलइहें सन कि ना! सभ केहूँ भरते शर्मा ना नु हो जाई!
काकी बोलली- “ई त एकदम सही कहलऽ। हमनी किहाँ फागुन हुलास के परब मनाला आ सावन करुणा के महीना।” लभेरन बीचे में लोकि लिहले- विमल जी अपना एगो गजल (सूतल सनेह…वाला) में एकर प्रयोग कइले बाड़े, भरत शर्मा जब ओकरा के 1989 में टी सीरीज खातिर गवले रहन त ऊ सुपरहिट भइल रहे-
फागुन कहाँ गइल, ना कुछऊ लगल पता
सावन बा आँख में अब आके समा गइल।
केहूँ कइसे कहि सकत बा कि नीमन आ साहित्यिक गीत-गजल गवला से पब्लिक भागे लागी?
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सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-30
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
फागुन के महीना आइल ऊड़े रंग गुलाल

लभेरन आजु काकी के बहुत व्यस्त देखलन। बातो करेके फुरसत ना रहे उनुका। रेंड़ का डंटा में सरसो के लहिवट लगाके मूँज का रस्सी के तीन गो बान्ह लगावे सिखावत रहली लइकन के। हर बान्ह बन्हला का बाद ‘होलरि होलरि’ कहल जाला आ तिसरका बान्ह बन्हला का बाद ‘होलरि होलरि’ कहिके ओकरा के एगो कोना में खड़ा क के राखि दिहल जाला। लइका बहुत उत्साह में रहलन स। उहनी के होलरि खेले जाए खातिर तेयार करत रहली काकी। “रास्ता में एक सङे ‘होलरि होलरि’ करत जइह लोग आ ओहिजा जाइके परिक्रमा कइला का बादे होलरि खेलिह लोग। झीलीवाली पोटली होलिका दहन में डालि दिह लोग। एक बात अउर, तिसिवट आ नीम के पतई जरूर सेंकि के ले अइह लोग, ओकरा के खाइल बहुत जरूरी हटे।”
एगो लइका पुछलसि- “होलरि में चारू ओरि लहिवटे बन्हाला?” काकी बतवली कि धान के खेती करेवाला लोग पेटाढ़ी बान्हेलन। आसानी से जरे खातिर फसल का डाँटी के प्रयोग होला। एगो लइका जानल चहलसि कि झीली का होला? तब काकी कहली कि अब अतना बात लभेरने बतइहें। तब लभेरन बतावे शुरू कइले।
झीली
झीली के संबंध हमनी का स्वास्थ्य से बड़ुवे, एकरा से शरीर के बाहरी परत शुद्ध हो जाला। हल्का भूँजल सरसो आ हरदी में सरसो तेल मिलाइ के जब पीसल जाला त ओही अबटन से घर के हर सदस्य का देंहि के खूब मालिश कइल जाला। मालिश का बाद जवन मइलि निकलेले ओकरे के ‘झीली’ कहल जाला। भरि जाड़ नहाए में जवन कंजूसी भइल रहेला, ओकरे काट ह ई अबटन। एह अबटन के लगवला से त्वचा का ऊपर के मए गंदगी साफ हो जाले। ओह पर से हरदी में त एंटीसेप्टिक गुनो बाटे। मानल जाला कि ई रोग-निवारण के एगो तरीका हटे, एकरा से मौसम बदलला पर होखे वाला चर्म-रोगन से भी बचाव होला।
लइका संतुष्ट भइले सन, बाकिर ओही में एगो अउर लइका आपन जिज्ञासा प्रकट कइलसि-
“तिसिवट आ नीम के पत्ता काहें खातिर सेंकल जाला? एकरा से का फैदा होला?” लभेरन के त बतावहीं के रहे, बतावे लगले।
तिसिवट आ नीम के पतई
एकरो पीछा चिकित्सा विज्ञान बा। ओह घरी खेत में तीसी तइयार होखेला। तीसी भलहीं ढेर रोगन के दवाई हटे अउर नीम चर्म रोग का सङहीं पित्तनाशक भी हटे, बाकिर इहनी के कच्चा ना खाएके चाहीं। नीम के कोमल पतई के शुद्ध घीव में भूँजि के दाल-भात पर खाए में बड़ा मजा आवेला।
काकी बोलली कि अब लइकन के होलिका-दहन आ फगुआ का बारे में बताव। लभेरन चौकी प पालथी मारिके बइठि गइले आ शुरू हो गइले।
होलिका-दहन, होली के हुड़दंग आ फगुआ
कहल जाला कि असुरराज हिरण्यकशिपु के बेटा प्रह्लाद विष्णु भगवान के भक्त रहलन। हिरण्यकशिपु विष्णु के आपन दुश्मन मानत रहन। बहुत समुझवला का बादो जब प्रह्लाद का भक्ति-भाव में कवनो अंतर ना आइल त ऊ कई तरह से उनुका के मरवावे के कोशिश कइलन, बाकिर कामयाबी ना मिलल तब हारि-थाकि के प्रह्लाद के जरावे खातिर अपना बहिनि होलिका के सहायता लिहलन। होलिका के अग्नि देवता से वरदान मिलल रहे। ओकरा बादो उनुका कोरा में बइठल प्रह्लाद बाँचि गइले आ एह गलत काम का चलते वरदान अछइतो होलिका जरि गइली। एही से अधर्म पर धर्म अउर अहंकार पर श्रद्धा का विजय के प्रतीक का रूप में होलिका-दहन मनावल जाला। एकरा से ईहो फैदा हो जाला कि कचरा, सूखल लकड़ी, गोइँठा आदि जरवला से गाँव के बढ़िया सफाई हो जाला आ बतोबरन शुद्ध हो जाला। फगुआ से एक दिन पहिले होलिका जरावल जाले, जवना के ‘सम्मत जरावल’ कहल जाला।
साँच पूछीं त जीवन में जब रंग भरल होखे तबे ओकर मजा बा, बेरंग लोगन पर दोसरे केहूँ रंग जमावेला। होली रंग के तेवहार हटे, आपन भलाई-नुकसान सोचिके जो रंग खेलल जाई त आनंदे आनंद रही। होली के हुड़दंग माने जहाँ गारी आ गीत के अनुपात बराबर होखे। ई सबेरे से शुरू होई त दुपहरिया तक चलत रही रसदार रंग का साथ। फेरु नहा-धो के साँझि खा अबीर-गुलाल लगावे के काम शुरू होई। देवी देवता पर चढ़वला का बाद बड़-बुजुर्ग का चरन पर आ समउरिया आदि का रूप रंग का साथे अबीर-गुलाल से खेलवाड़ शुरू हो जाला। फागुन के महीना आइल ऊड़े रंग गुलाल! एह दिन घर-घर में पुआ, पूड़ी, गोझिया आदि तर-तरह कके पकवान बनेला।
होली का अवसर पर जवन गीत गवाला ओकरे के ‘फगुआ’ कहल जाला। एकर शुरुआत माघ बसंत पंचमी से मानल जाला। ओही दिने ताल ठोकाला आ तब से भर फागुन गवात रहेला। एकर चरम उत्कर्ष फागुन का पुरनवासी आ चइत के अन्हरिया का परिवा के लउकेला। फगुआ समूह में गावल जाला। एक आदमी आगे से उठावेला आ पाछा से पूरा हुजूम दोहरावेला। ढोलक, झाल आ डफ एकर मुख्य वाद्ययंत्र हटे। सचमुच ई दृश्य सुने आ देखे में बहुत नीक लागेला। होली गायन के शुरुआत भगवान शंकर भा कृष्ण के रस, रंग आ संगीत में डूबल भजन से होखेला। होली खेले रघुवीरा!
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सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-31
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
नेहिया के नन्हका पलउआ झँवाइल

आजु लभेरन बहुत उदास हो गइले काकी के अतना मायूस देखिके। काकी भले बूढ़ हो चलल रही, बाकिर उनुका बोलचाल भा बात-बेवहार उमिरि के असर ना रहे। बाकिर आजु उनुका के अतना चुपचाप आ गुमसुम देखिके लभेरन से ना रहाइल। ऊ पूछि दिहले- का बात बा काकी? कवनो बात भइल बा का?
काकी के जइसे ध्यान भंग भइल। मधिमाइले आवाज में बोलली- ना हो, सभ ठीके बा। जानऽतारऽ लभेरन! अब जुग बदलि गइल बा। जुग पहिलहूँ बदलत रहे बाकिर बाल-बाचा, नाती-पोता के बोली-बेवहार हइसन ना होत रहे। बड़ के आदर आ छोट के परेम कबो बन्न ना भइल आ नु पुरान। अब त लइकन का ठोरे पर जबाब बड़ुए। बुझाता कि हमनिए का अब बच्चा हो गइल बानी जा।
रउआँ ठीके कहतानी काकी! बाकिर ईहो साँच बा कि ओहमें लइकन के कवनो दोष नइखे। आजु पीढ़ी का बीच के जवन बहुत ज्यादा अंतर लउकता, ऊ अनासे नइखे आइल। नैतिक पतन भा संस्कार-हीनता से एकरा के जोड़ल हमरा ठीक नइखे जनात। अब हमनी का बाल-बच्चा पर खाली हमनी के भा हमनी का समाज के भा नाता-रिश्तेदार के प्रभाव पड़ता, अइसन बात नइखे। ई प्रभाव त अब बहुत छोट रहि गइल बा। अब त मए दुनिया एगो गाँव नियन हो गइल बिया आ टीवी, मोबाइल आ कंप्यूटर का माध्यम से ओकर प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ रहल बा। लभेरन अपना बात के स्पष्ट करत बोलले- “पहिले के पढ़ाई परिवार, शिक्षक आ किताब तक सीमित रहे बाकिर आजु के पीढ़ी त जनमे से मोबाइल, इंटरनेट आ सोशल मीडिया का बीचे पललि-बढ़लि बिया। ओकरा पलक झपकते दुनिया भर के सूचना मिल जाता। त ऊ सवाल त दगबे नु करी? अब रउआँ चाहतानी कि परंपरा भा बाप-दादा का बात के चर्चा क के ओकरा के संतुष्ट क दिहीं त अब संभव नइखे। आजु-काल्हु हर भाषा का साहित्य में ई चिंता प्रायः कवनो ना कवनो रूप में लउकतिया।”
काकी के जिज्ञासा बढ़ल- “भोजपुरियो में लिखाइल बा?”
लभेरन कहले- जी, विमल जी के एगो रचना सुनीं।
टोकला प तनिका में छरके बचनिया
आ मुँह के ललइया फँफाइ
निमन जबुनवा का हरियर गँछिया के
निठुर पवन उधियाइ।
मिठ-मिठ गीत लागे तितकी कँकरिया
सरेहिया नगड़वा पिटाइ
नेहिया के नन्हका पलउआ झँवाइल
देंहिया के बन्हकी धराइ।
मिले ना उजास कबो बतिया बिचरवा में
असहीं उचारेला झकास
तनिको जबनिया में मिले नाहीं लसिया
आ बिखरेला सगरी भँड़ास।
बड़ के आदर कहाँ छोट के दुलरवा
बा अँखिया से सरम बिलाइ
गतरे गतर बा बिरोध के लहरिया
जहरिया गगरिया समाइ।
कवनो सवाल करीं एकहीं जबबवा बा
पिढ़िया के फरक विशाल
कइसे के जोड़ीं दइया उमिरि उमिरिया से
रतिया में एको ना मशाल।
‘सरेहिया नगड़वा पिटाइ’ के का माने भइल?- काकी पुछली।
लभेरन समुझावे लगले। “आजु का पीढ़ी के मधुर गीत पसन नइखे परत, ओकरा धूम-धड़ाका वाला गाना चाहीं, आर्केस्ट्रा चाहीं। अब प्रेम के मधुर भाव उहनी का कल्पना से बाहर हो रहल बा आ ओकर जगह भौतिकता के प्रदर्शन आ शारीरिक संबंध ले लेले बा।”
काकी से ना रहाइल- त ई नीमन बा?
लभेरन कहले- अब नीमन-बाउर का चक्कर में जनि परीं। जब चारू ओर के बान्ह टूटि गइल बा त रोकाई कइसे? एह धारा में त बहहीं के नु परी! एही में जतना हो सके उपाइ निकाले के चाहीं अपना धरोहर के आ धरम के बँचावे के।
पहिले छोटो से छोट किसान का दुआर प कम से कम एगो गाइ आ एक जोड़ी बैल जरूरे रहत रहे। संयुक्त परिवार रहे। समय प लइका-लइकी के बियाह हो जात रहे। कहाँ केहूँ बेरोजगार रहे? जे जवना पेशा में निपुण रहे, ओही में लागि जात रहे। आधुनिकता के दौर आ सरकारी नीतियन के कमाल कि संयुक्त परिवार टूटे लागल, बेरोजगारी जइसन शब्द महत्त्वपूर्ण हो गइल। नोकरी के दबाव बढ़े लागल। नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम के हिस्सा ना रहि गइल। साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका आ पुस्तक गायब होखे लगली सन आ प्रतिस्पर्धा वाली किताब आ पत्रिका ओकर आसन ग्रहण कइली सन। पहिले संयुक्त परिवार में दादा-दादी, चाचा-चाची के बात-बेवहार, लोककथा आ परंपरा से संस्कार मिल जात रहे। अब जब संयुक्त परिवारे ना रहल त संस्कार के बात कइसन? ई काहें नइखीं देखत कि लइका त लइका अब लइकिनियो के बियाह ढेर उमिरि बढ़ला प होखे लागल बा। अब नोकरी, पेमेंट आ स्टेटस महत्त्वपूर्ण हो गइल बा।
काकी, अब मानिके चलीं कि आजु का शिक्षा के लक्ष्य चरित्र-निर्माण नइखे रहि गइल, अब ऊ रोजगार हो गइल बा। “सा विद्या या विमुक्तये” के जगह अब ‘कैरियर आ पैकेज’ ले लेले बा। आजु का पीढ़ी के चिड़चिड़ाहट का पाछा एही तरह के कई गो दबाव काम करतारे सन।
काकी गाल प हाथ ध लिहली। लभेरन फेरु समुझवले- आजु हमनी का एगो बहुत बड़ सांस्कृतिक परिवर्तन का दौर से गुजर रहल बानी जा। अइसना में हमनी के जहाँ अपना मूल के समुझे के परी, ओहिजे आधुनिकता के भी संतुलित करे के परी, भगला से भा माथा पिटला से कुछऊ फरियाए के नइखे।
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


सोचले त रहीं कि एगो छोटहन टिप्पणी लिख दीं बाकिर जब लिखे चलनी त पूरा लेखे बन गइल। एह पोस्ट का बाद के अगिला लेख में पड़ीं फगुआ के फूहरपन के चरचा