Category: भाषा

एगो, एकगो, आ एकेगो का चक्करघिन्नी में (बतकुच्चन – 198)

एगो, एकगो, आ एकेगो का चक्करघिन्नी में कई दिन से दिमाग में चकोह जस चलत बा आ हम ओहीमें खिंचाइल चलल जात बानी. थाह नइखे लागत कि कइसे एह चकोह से बहरी निकलीं. हिन्दी वाले त एह मामला में एक ही शब्द एक बना के निकल गइलें बाकिर भोजपुरी...

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भोजपुरी संगम के 75वीं बइठकी

“आजु सत्तन जी हम्मन के बीच नइखीं, आ अपने उहाँ के 75 ले नाइ पंहुचि पवलीं, बाकिर आजु उनके लगावल पेड़ फरत-फुलात बा. आजु हीरक जयन्ती ले पंहुचि गइल बा.” – ई बात गोरखपुर के “भोजपुरी संगम” के 75वीं बइठक के...

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‘हम’ पूजक भोजपुरियन के सेवा भाव

– प्रमोद कुमार तिवारी हमनी के ई बतावत कबो ना थाकेलीं कि भोजपुरी एगो अइसन भाषा हऽ जवना में ‘मैं’ हइए ना हऽ, एहमें खाली ‘हम’ होला. मैं आ हम में सबसे बड़ अंतर तऽ इहे होला नू कि ‘मैं’ खाली अपना बारे में सोचेला, जबकि ‘हम’ सबकर...

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फार, फारल भा फरला से लगवले फरिअवता भा फरिआवल के चरचा : बतकुच्चन – 197

फार, फारल भा फरला से लगवले फरिअवता भा फरिआवल के चरचा करे चलनी त नीर-क्षीर विवेक के बात धेयान में आ गइल. कहल जाला कि हंस नाम के पक्षी में अतना ज्ञान होला कि ऊ पानी आ दूध के अलग क के दूध त पी बाकिर पानी छोड़ देला. एही से कहल जाला...

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केकरा पर करीं हम गुमान रामप्यारे !

– शिलीमुख उनइस बरिस पहिले हम प्रसिद्ध कवि चन्द्रदेव सिंह क एगो रचना पढ़ले रहलीं. साइत 1997 में “पाती” अंक -२३ में छपल रहे. बरबस आज ओकर इयाद आ गइल बा त रउवो सभे के पढ़ा देत बानी – केकरा प’ करब s गुमान...

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