एगो, एकगो, आ एकेगो का चक्करघिन्नी में (बतकुच्चन – 198)
एगो, एकगो, आ एकेगो का चक्करघिन्नी में कई दिन से दिमाग में चकोह जस चलत बा आ हम ओहीमें खिंचाइल चलल जात बानी. थाह नइखे लागत कि कइसे एह चकोह से बहरी निकलीं. हिन्दी वाले त एह मामला में एक ही शब्द एक बना के निकल गइलें बाकिर भोजपुरी...
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