Category: भाषा

पइसार आ पसार के चरचा (बतकुच्चन – 200)

बात के खासियते होला कहीं से चल के कहीं ले चहुँप जाए के. कहल त इहो जाला कि एक बार निकलल ध्वनि हमेशा खातिर अंतरिक्ष में मौजूद हो जाले. आजु पइसार आ पसार के चरचा करे बइठल हम त पसोपेश में बड़ले बानी कि कहाँ से शुरु कइल जाव. काहे कि...

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सुबरन को ढूंढ़त फिरे कवि कामी और चोर (बतकुच्चन – 199)

भोजपुरी के एगो महान कवि रहलन महेन्दर मिसिर. उनुका के पूरबी गीतन के जनक मानल जाला. मिसिर जी के लिखल पूरबी अपना शृंगार रस का चलते बहुते लोकप्रिय भइली सँ. ओहि गीतन में से एगो गीत रहुवे – अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया रे ननदी,...

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एगो, एकगो, आ एकेगो का चक्करघिन्नी में (बतकुच्चन – 198)

एगो, एकगो, आ एकेगो का चक्करघिन्नी में कई दिन से दिमाग में चकोह जस चलत बा आ हम ओहीमें खिंचाइल चलल जात बानी. थाह नइखे लागत कि कइसे एह चकोह से बहरी निकलीं. हिन्दी वाले त एह मामला में एक ही शब्द एक बना के निकल गइलें बाकिर भोजपुरी...

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भोजपुरी संगम के 75वीं बइठकी

“आजु सत्तन जी हम्मन के बीच नइखीं, आ अपने उहाँ के 75 ले नाइ पंहुचि पवलीं, बाकिर आजु उनके लगावल पेड़ फरत-फुलात बा. आजु हीरक जयन्ती ले पंहुचि गइल बा.” – ई बात गोरखपुर के “भोजपुरी संगम” के 75वीं बइठक के...

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‘हम’ पूजक भोजपुरियन के सेवा भाव

– प्रमोद कुमार तिवारी हमनी के ई बतावत कबो ना थाकेलीं कि भोजपुरी एगो अइसन भाषा हऽ जवना में ‘मैं’ हइए ना हऽ, एहमें खाली ‘हम’ होला. मैं आ हम में सबसे बड़ अंतर तऽ इहे होला नू कि ‘मैं’ खाली अपना बारे में सोचेला, जबकि ‘हम’ सबकर...

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