Category: भाषा

बतकुच्चन – ११

पिछला हफ्ता गोबर पथार के बात निकलल रहे त अबकी खर पतवार दिमाग में आ गइल बा. खर पतवार का बारे में सोचते दिमाग में खरखर होखे लागल जइसे कि मूंजियानी से गुजरत घरी आवाज निकलेला. अइसने खरखर से संस्कृत के एगो शब्द बनल रहे खर्पर. खर्पर...

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बतकुच्चन – १०

आजु पता ना काहे मन अँउजाइल बा. लागत बा कि कंठ में कुछ अटकल बा अँउजार जइसन. आ कंठ का भीतर कुछ अटकल होखे त जान पर आफत बनि जाला कबो-कबो. अलगा बाति बा कि कंठ का बाहर लटकल कंठहार औरतन के सुंदरता बढ़ा देला. कंठ गवनई के सुरो के कहल...

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बतकुच्चन – ९

मैंने कहा. हमने कहा. तुमने कहा, उसने कहा, राम ने कहा. अरे भाई का कहा आ काहे कहा ? आ आजु आप हिन्दी काहे छाँटे लगनी ? सवाल जायज बा. हमरा ई सब कहला का पाछा के मकसद बा भोजपुरी के खास सुभाव का बारे में बतावे के. अगर इहे सब भोजपुरी...

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बतकुच्चन – ८

पिछला हफ्ता के तिकवत तिवई का बाद आजु सोचत बानी कि अकसर आ अकसरुआ के बाति कर लीं. अब अकसरुआ त उहे नू कहाई जे अकसर होखे. बाकिर अकसर त ओकरो के कहल जाला जवन आये दिन होत रहे, बार बार होत रहे. एगो दोसर अकसर ऊ होला से अपना अपना घर के...

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बतकुच्चन – ७

कुछ दिन पहिले एगो साहित्यकार बंधु के फोन आइल रहुवे. उहाँ के जानल चाहत रहीं कि तिवई के मतलब का होला. शब्द के अर्थ ओकरा व्यवहार का तरह बदलत रहेला. अगर अइसनका ना रहीत त आक्सफोर्ड डिक्शनरी हर बेर आपन नया संस्करण ना निकालित. हर कुछ...

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