Category: कविता

धरती के चुनरी रंगाई

– ओमप्रकाश अमृतांशु कि आरे झुरू -झुरू बहेला फगुनवा , सगुनवा लेइके बा आईल. लाल -पियर शोभेल गगनवा , धरती के चुनरी रंगाईल. {1} आमवा से अमरित टपके , चह-चह चहके चिरइयाँ. महुआ सुगंध में मातल, कुकू -कुकू कुकेले कोइलिया . कि आरे...

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फागुन के उत्पात: भइल गुलाबी गाल

– मनोज भावुक हई ना देखs ए सखी फागुन के उत्पात । दिनवो लागे आजकल पिया-मिलन के रात ॥1॥ अमरइया के गंध आ कोयलिया के तान । दइया रे दइया बुला लेइये लीही जान ॥2॥ ठूठों में फूटे कली, अइसन आइल जोश । अब एह आलम में भला, केकरा होई होश...

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अब त चिरईओ ना बोले

– डा॰ कमलेश राय सबरे भोरे अब त चिरईओ ना बोले. अब त चिरईओ ना बोले सबेर भोरे. सगरो बिछल अस कारी रइनिया सकुचि सकुचि उगे सुरुज किरिनिया फुलवा पँखुरओ ना खोले, सबेरे भोरे अब त चिरईओ ना बोले. उजरि गइल सब महुआबारी, निबियो ना...

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भउजी माने झगरी

– प्रकाश उदय भउजी माने झगरी पानी माने मछरी – ना धइला खतिरा बूड़ि बूड़ि पोखरा नहइला खतिरा. मारे-मारे उपटी भईयो जी के डपटी छोड़इला खतिरा. “बाचा बाटे” कहि के छोड़इला खतिरा. सरदी में हरदी पियाई जबरजस्ती दवइया...

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गज़ल

– शशि प्रेमदेव जेकरा पर इलजाम रहल कि गाँछी इहे उजरले बा! फल का आस में सबसे पहिले ऊहे फाँड़ पसरले बा! दूर से ऊ अँखियन के एतना रसगर लगल, लुभा गइलीं हाथ में जब आइल त देखलीं कउवा ठोढ़ रगड़ले बा. प्यार से बढ़ि के दोसर कवनो ताकत...

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