कांच कोइन
– संतोष कुमार ‘इहाँ हमरा से बड़का हीरो कवनो बा का ? हम अभिए चाहीं त निमन निमन जाने के ठीक कर दीं’ – किसुन दारु पी के अपना घर के दुअरा पर पैतरा कइले रहलन. आपन मेहरारू के हांक लगावत कहलें – ‘का...
Read More– नीमन सिंह बात १९८० के बरसात के समय के ह. हमरा खेत में धान रोपे खातिर बेड़ार में बिया उखाड़े लागल मजदूर बिया उखाड़त रहले सन. बगल में भिंडा रहे पोखरा के एक तरफ, दोसरा तरफ मुरघटिया रहे. मजदूरन में एगो मजदूर ६ फीट लमहर बाकिर...
Read MorePosted by Editor | सितम्बर 2, 2013 | कहानी, पुस्तक चर्चा, साहित्य |
– ओमप्रकाश अमृतांशु कला-साहित्य कवनो भाषा में होखे ओकर महत्व सबसे उपर होखेला. साहित्य समाज...
Read More– केशव मोहन पाण्डेय जमाना बदलऽता, एकर लछन शहर से दूर गाँवो-देहात में लउकऽता. अब ठेंपों छाप लोग के बात-व्यवहार में जमाना के नवका रूप झलकेला. सुन्नर बाबा ढेर पढ़ले ना रहले, बाकीर ऊ करीकी अक्षर के भँइस ना समुझस. पतरा-पोथी के...
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