अलम्म
– रामरक्षा मिश्र विमल भिनसहरा, करीब तीन बजे. साफ-साफ मुँह अभी नइखे चिन्हात केहूँ के अँजोरो. चन्दा आपन लुग्गा-फाटा बन्हली मोटरी अस आ कान्ही प धइके निकलि गइली पिछुवारी मिहें. नइहर से थेघ पहिलहीं टूट गइल रहे, एहसे फुआ ओरि डेग...
Read More– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” रातिभर दुनु परानी सुति ना पउवींजा. करवट बदलत अउर एन्ने-ओन्ने के बाति करत कब बिहान हो गउए, पते ना चलुवे. सबेरे उठते मलिकाइन चाय बना के ले अउवी अउर कहुवी की जल्दी से तइयार होके आफिस चलि जाईं....
Read More– डा॰ सुभाष राय जाड़ा जब हाड़ ठिठुरावे लागेला त सगरो गाँवन में कउड़ा के बहार आ जाले. दुवारे से थोरिक लम्मे घर भर क कूड़ा जोरि के रखि दिहल जाला अउर सूखल रहेट्ठा तोरि के ओकरे उप्पर डारि दिहल जाला. फेरू ओके बारि के पास-पड़ोस...
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