Category: सतमेझरा

सबले नीमन ठठपाल (बाति के बतंगड़-7)

– ओ. पी. सिंह कहे वाला त कहेलें कि नाम में का धइल बा. चीनी के कवनो नाम दीं ओकर मिठास उहे रहे वाला बा. गुलाब के कवनो नाम दीं ओकर सुगन्ध नइखे बदले वाला, बाकिर अब जमाना बदल गइल बा. अब नाम उहे रह जात बा बाकिर ओकर गुण बदल दीहल...

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भउजी हो!

भउजी हो! का बबुआ? आपन नोटवा भंजा लिहलू कि ना ? हमार नोटवा त कहिये भँज गइल, रउरा अपना कनियवा वाला नोट जल्दी भंजा लीं। का भउजी, तोहरा हमेशा मजाके सुझेला! हम पाँच सौ आ हजरिया नोट का बारे में पूछनी हँ। अरे ओहिजा अबहीं लमहर लमहर लाइन...

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हद, हदस, हदसल, हदसावल, हदसी, हदीस, हादसा (बतकुच्चन – 205)

हद, हदस, हदसल, हदसावल, हदसी, हदीस, हादसा. मामिला बेहद गंभीर बा आ बतकुच्चन करे में मन हदसल बा कि पता ना कब केने से इशरत के अब्बा भा वानी के फुआ सामने आ जइहें घेर बान्ह करे खाति. से हम अपना हद में रहे के भरपूर कोशिश करब. आ कुछ कहे...

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बतकुच्चन – 204

अबकी ढेर दिन बाद संपादक जी से आदेश मिलल कि बतकुच्चन के नया कड़ी भेजल जाव त खुशीओ मिलल आ घबराहटो भइल. काहे कि एने ढेर दिन से कलम उठावे के आदत छूट गइल रहे. अब एकरा के का लुकाईं कि सन्मार्ग में छपल बन्द भइला से मन उदास हो गइल रहे....

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गद्दारी का बहाने बतंगड़ चिन्तन (बतंगड़ – 6)

– ओ. पी. सिंह एह घरी गद्दारी चरचा में बा आ कुछ लोग एकरा के आपन मौलिक अधिकार बतावे लागल बा. अइसनका लोग पाकिस्तान का हित में बतियावल आपन शान समुझत बा. सरसरी निगाह से देखनी त बुझाइल कि एह पर कुछ लिखल भा बोलल बहुते आसान रही...

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