लेखक: Editor

आजकल रोज हम अखबार पढ़ेनीं

– ऋतुराज आजकल रोज हम अखबार पढ़ेनीं अखबार में आइल लेख दू-चार पढ़ेनीं। चोरी, हत्या, गरीबन के लूटल होखेला रोज कुछ बलात्कार पढ़ेनीं।। आजकल रोज हम अखबार पढ़ेनीं अखबार में आइल लेख दू-चार पढ़ेनीं। तेज हो रहल विकास पढ़ेनीं उठ रहल...

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दलित-विचार : बीचो के एगो राह होला

– देवेन्द्र आर्य दलित विचार का बारे में राजनीतिक सोच जतने व्यावहारिक, साफ आ मकसद वाला लउकेला, साहित्यिक सोच ओतने अझुराह, भकुआइल, ठहरल आ भेड़चाल वाला बा. अम्बेडकर से लगवले कांसीराम-मायावती तक के राजनीतिक नजरिया साफ बा कि...

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टटका खबर (सोमार, 24 अगस्त 2015)

चीन आपन मुद्रा युआन के भाव का गिरवलसि कि दुनियाभर के शेयर बाजारन में हाहाकार मच गइल बा. ग्रीस के संकट से अबहीं बाजार उबरियो ना पवले रहुवे तबले सामने आ गइल चीन के बुलबुला. चीनी सामान के त गारंटी पहिलहूं ना रहुवे बाकिर अब लागत बा...

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लोकजीवन के “बढ़नी”

– डाॅ. अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा. आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार के व्यक्त करे क टोन आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं. उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका उनका गाँव आरा...

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