समाजवाद के आखिरी किला

– टीम अंजोरिया

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समाजवाद के आखिरी किला

last bastion of socialism

आजु बिहार के मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार के इस्तीफा का साथही भारत में समाजवाद के आखिरी किला, (किला का कहीं आखिरी खम्भा कहीं), ढह गइल। आ समाजवाद अमर रहे कहला से पहिले चलीं भारत के समाजवादी इतिहास का बारे मेंं कुछ चरचा कर लिहल जाव।

भारत में समाजवादी राजनीति के इतिहास बहुते पोढ़ आ बहुआयामी रहल बा। एकरा के एगो राजनीतिक विचारे ना मानि के एकरा के समाज के गरीब पिछड़ा समूहन ला न्याय, बरोबरी, आ हक के लड़ाई लड़े वाला आंदोलनो मानल जा सकेला। भारत में समाजवादी विचारधारा के उद्गम 1920 से 1947 के अवधि में कार्ल मार्क्स आ व्लादिमीर लेनिन के विचारन से पसार से भइल. बाद में भारत के आजादी के आन्दोलन के काबू राखे का कोशिश में अंगरेजने के बनावल कांग्रेस एगो जरिया बनल। आ एह कांग्रेस में हर तरह के विचारधारा वाला लोग शामिल रहुवे। एहिमें से कुछ लोग बरीस 1934 में ‘कांग्रेस सोशलिष्ट पार्टी’ मंच बना लिहल। एह सोशलिष्ट पार्टी के नेतन में जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, आ आचार्य नरेन्द्र देव के नाम रेघरियावे जोग रहल बा।

देश के आजादी का बाद समाजवादी विचारधारा वाला लोग समानतामूलक समाज के स्थापना के सपना देखत कांग्रेस से अलग हो के बरीस 1952 में सोशलिष्ट पार्टी बना लिहल। सोशलिष्टन का बारे में एगो बात बहुते आराम से कहल जा सकेला कि सोशलिष्ट हमेशा डेढ़ गो पार्टी में रहेला। एगो में रहते आपन एक डेग दोसरा पार्टी में बढ़ा के रखले रहेला। सोलिष्ट पार्टी आ एकरा से जनमल कई पार्टियन के इतिहास टूट-फूट से भरल रहल बा। सोपा से प्रसोपा, संसोपा ना जाने कवन कवन नाम से सोशलिष्ट बटोरात रहल बाड़न। एह टूट-फूट में एह दिल के टुकड़ा हजार भइल, कुछ इहां गिरल कुछ उहां गिरल।

साठ के दशक में राममनोहर लोहिया देश में गैर-कांग्रेसवादी वैकल्पिक राजनीति खातिर ‘सप्तक्रान्ति’ के विचार दिहलन। अलग बात बा कि बाद का दिनन में इहे तरह तरह के समाजवादी कांग्रेेसे का साथ मिल के सत्ता के मलाई चाटत आइल बाड़न। बाकिर अतना त जरुर माने के चाहीं कि लोहिया के विचार मानत देश के कई राज्यन में गैर कांग्रेसी सरकार बनल। कुछेक में जनसंघो शामिल रहल। जनसंघ के खासियत ई रहल बा कि ई सट के मारेला, हट के ना। देश के हर पार्टी का साथ कबो ना कबो जनसंघ आ बाद का दिनन में भाजपा रहत आइल बिया। हमाम में सबहीं लंगटा बा आ भाजपो एकरा से अलगा ना हो सके काहें कि उहो त एही समाज के हिस्सा हवे।

लोहिया के प्रभाव से पिछड़ा पावे सौ में साठ का नारा का सहारे देश में पिछड़ा वर्ग के राजनीति शुरु हो गइल आ एकरा साथही शुरु हो गइल एकर पतन के क्रम। पिछड़ा वर्ग के राजनीति करत करत यूपी में मुलायम सिंह यादव आ बिहार में लालू प्रसाद एकरा के अपना परिवारन के मिल्कियत बना लिहलन। जे लोग एह से असहज रहल ऊ लोग अलगा हो गइल। एह लोगन में जार्ज फर्नान्डिज आ शरद यादव जइसन नेतन के नाम शामिल बा। इहे लोग समता पार्टी का नाम से आपन अलगा गोल बनावल आ एही गोल पर गँवे-गँवे नीतीश कुमार काबिज हो गइलन। इहे समता पार्टी बाद में युनाइटेड जनता दल, संक्षेप में जदयू, बन गइल।

कांग्रेस नेहरू का जमाने से परिवारवादी बन चुकल रहुवे। नेहरू अपना जिनिगिए में अपना बेटी इन्दिरा गाँधी के कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा के एह जहरवाद के शुरुआत कइलन। बाद का दिनन मेंं त इन्दिरा हर लाज लिहाज छोड़ के कांग्रेस के आपन पारिवारिक मिल्कियत बना लिहली। आ आजुओ कांग्रेस उनुके परिवार के मिल्कियत बन के जारी बिया। ।

मुलायमो सिंह अपना जियते जिनिगी में जब यूपी विधानसभा में बेलगाम बहुमत पवलन त अपना बेटा अखिलेश के मुख्यमंत्री बना दिहलन। अलग बाति बा कि इहे अखिलेश बाद का दिनन में उनुके के बेदखल कर के पूरा समाजवादी पार्टी पर काबिज हो गइलन। बिहार में इहे काम लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल कइलसि। लालू जब चारा घोटाला का बाद जेल जाए लगलन त अपना आइसीएस पत्नी, इंटर्नल कूकिंग सर्विस, राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बना दिहलन। हालांकि लालू के हाल मुलायम वाला ना भइल। राबड़ी का नाम से सरकार उनुके इशारा पर चलत रहल। जइसे सोनिया का इशारा पर मनमोहन सिंह के सरकार। दुनू का लगे ना त वइसन राजनीतिक योग्यता रहल ना अनुभव एहसे कवनो संघर्ष के जरुरते ना पड़ल। बाद में जब नीतीश कुमार भाजपा से अलग हो के लालू का समर्थन से सरकार बनवलन त लालू अपना दुनू बेटन के मंत्री बनवा दिहलन। छोटका बेटा रहला का बावजूद तेजस्वी के उपमुख्यमंत्री बनवा दिहलन। अपना सात गो बेटियन के अपार धन दिहला का बावजूद ओहनी के कवनो राजनीतिक औकात वाला ना बनवलन।

आ अब आखिर में फेरु नीतीश के चरचा। काहे कि इनके काम से एह लेख के मथैला के औचित्य बन पाई। नीतीश कुमार के केहू कतनो बड़ राजनीतिक विरोधी होखो ऊ उनुका पर भठियरपन भा परिवारवाद के अछरंग ना लगा सके। अविवादित रुप से नीतीश कुमार अपना ईमानदारी ला ईयाद राखल जइहें। सब कुछ देखतो नीतीश कबो अपना परिवार के राजनीति में आगे ना आवे दिहलन। अफसोस आखिरी समय में ऊ परिवारवाद के जम्हुआ से बाँच ना सकलन। अब उनुका बाद जदयू के अविवादित नेता उनुकर बेटा निशांत बन गइल बाड़न। आ एरा बाद कहल गलत ना होखी कि देश में समाजवाद के आखिरी खम्भो ढहि गइल।

नीतीश ई काम अपना इच्छा से कइलन कि अपना पार्टी जदयू के बचावे ला कइलन से आवे वाला समय तय करी। शायद नीतीश के लागल कि उनुका बाद जदयू छितरा जाई काहें कि एकरा बड़का नेतन में सत्ता संघर्ष होखे से इन्कार कइल ना जा सके। आ ईमानदारी से कहीं त नीतीश आपन प्रतिष्ठा बचा ले गइलन। ना त अगर ऊ जिद ठान लिहले रहतन त भाजपो का लगे कवनो दोसर राह ना रहुवे कि ऊ निशान्त के मुख्यमंत्री ना बने देव। नीतीश ई काम ना कइलन एहला उनुकर अभिनन्दन।

जब ई लेख लिख रहल बानी तबले खबर आ गइल बा कि भाजपा विधायक दल के नेता सम्राट चौधरी के चुन लिहल गइल बा। सम्राट चौधरी संघ पृष्ठभूमि से ना आवे वाला भाजपा के दुसरका मुख्यमंत्री होखिहन। भाजपा समर्थकन के उमेद बा कि सम्राटो असम के हिमन्ता का तरह अपना के सही साबित कर जइहें। सम्राट चौधरी के चुनाव एहले अचरज वाला बा कि अबकी मीडिया में चलल चरचा का बाँवे ना गइल भाजपा। ना त चतुर सुजान लोग कहबे करेला कि भाजपा आ शेयर बाजार के अगिला चाल के अंदाजा लगावल बेकार होल। शेयर बाजार गैपडाउन खुल के उछाल मार देले आ भाजपा चरचा में आइल सगरी नाम से हटि के कवनो तेसर नाम खोज लेले जिनका बारे में जानकारी जुटावे के पड़ जाला मीडियावालन के।

भाजपो के धन्यवाद कि ऊ मीडिया में चलत आकलन के गलत ना बनवलसि।

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