सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-41
bhojpuria-chitthi-41
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
सभके पाँड़े मति बुधि देले
अपने पाँड़े ढिमिलिया खाले

आजु छुट्टी के दिन रहे आ लइकन के मन रहे खूब कहनी सुने के। काकियो एक से एक कहनी सुनावत रहली। लइकन के मन जानवर आ चिरई के कहनी से उबियाइ गइल रहे। लभेरन के आवते ऊ खड़ा होके आ कुरता पकड़ि के आत्मीय आग्रह करे शुरू क दिहलन स- “अंकल, आप भी कहानी सुनाइए ना…आदमी की कहानी।” लभेरन कहनी कहे शुरू कइले।
एगो पंडीजी रहले। ऊ रामायन का साथ-साथ धार्मिक कथा-कहानी सुनावे खातिर भी जानल जात रहन। उनुकर लोकप्रियता देखते बनत रहे। एक दिन के बात हटे कि पंडीजी चौकी पर आसन मारिके एकादशी का बारे में बतावत रहलन। बोलते-बोलत ऊ बैगन के बारे में बतावे लगलन। ऊ बतवले कि एकादशी के बैगन ना खाएके। एकादशी का दिने खइला पर पाप लागेला। श्रोता लोगन में पंडिताइनो रहली। पंडीजी दू किलो बैगन बजार से ले आइके घर में रखले रहन। अब त पंडिताइनि ना आव देखली नु ताव, मए बैगन उठाके घूरा पर फेंकि अइली। पंडीजी घर लवटते अपना मेहरारू से कहले कि आजु बैगन के भरता आ कलउँजी खाएके मन करऽता। पंडिताइन कहली कि आजु एकादशी हटे। रउएँ नु कहलीं हा कि एकादशी के बैगन ना खाएके, पाप लागेला। हम त मए बैगन आसठि पर बीगि अइलीं। अब त पंडीजी कपारे हाथ ध लिहले- ई का कइलू पंडिताइन? चउकी के बात चउका में ना ले आइल जाला।” काकी के दूनो नतिया थपरी पीटि-पीटि के हँसे लगलन स। काकी से ना रहाइल त टुभुकि दिहली-
सभके पाँड़े मति बुधि देले
अपने पाँड़े ढिमिलिया खाले
अब त लइकन के एगो अउर विषय मिल गइल। ऊ दादी से पूछले सन- “इसका क्या मतलब हुआ दादी?” दादी कहली- “एकर माने भइल कि उपदेशक जी सफलता खातिर सभका के मति आ बुद्धि बाँटत फिरेलीं, बाकिर अपने हर मोड़ पर असफले रहींले।” अतना कहिके काकी लभेरन ओरि देखली। अब लभेरन बोले लगले- “ई कहाउत खाली केहूँ का व्यक्तिगत व्यवहार पर कटाक्ष ना करेले, बलुक एकर प्रहार सत्ता, नेतृत्व आ समाज का हर ओह वर्ग पर होला, जे दोसरा के राहि देखावे के दावा त करेला बाकिर अपने गड़हे में गिरत रहेला।”
लभेरन आपन बात आगे बढ़वले- “एकरा पीछे एगो कहानी बा। एगो पंडीजी रहन। ऊ गाँव-गाँव घूमिके लोगन के चोरी-बइमानी से दूर रहे के उपदेश देत रहन। उनुकर कहनाम रहे कि दोसरा का धन-संपत्ति पर तनिको लोभ ना करे के चाहीं, अपना गट्टा से कमाइल धन के भोग करे के चाहीं। एक बेर ऊ प्रवचन देके लवटत रहन। राहि का किनारे एगो गड़हा में उनुका के सोना के कुछ गहना लउकल। उनुकर मन ललचा गइल। ऊ राहि चलत लोगन से आँखि बँचावत गड़हा में उतरे लगलन। बार-बार एने-ओने देखला का कारन उनुकर गोड़ तर बिच परि गइल आ ऊ तड़ से ढिमिला गइले। राह चलत लोग दउरल आ पंडीजी के उठाके आ टाङि के घर पहुँचावल। अब सोना प जेकर नजरि गइल ऊ लेके चलता बनल। लोग पंडीजी के चीन्हि लेले रहल कि ई ऊहे ज्ञानी बाबा हवन, जे भोरे-भोरे लोभ ना करेके प्रवचन देत रहन आ दोसरा के गहना उठावे का लालच में ढिमिला गइले। ओही घरी से ई कहाउत चलि गइल कि “सभके पाँड़े मति बुधि देले, अपने पाँड़े ढिमिलिया खाले।”
काकी कहली- “गाँव-घर में ई कहाउत अक्सर अइसने आदमी खातिर कहल जाला, जे पंचाइत में सभके सलाह देत होखे, भा मुकदमा के रणनीति समुझावत होखे आ नाहीं त राजनीति के बड़हन जानकार बनत होखे, बाकिर जब ओकर ममिला आवे त ऊ खुदे हार जाउ।” फेरु ऊ लभेरन से पुछली कि “समाज आ देश का अउरियो क्षेत्र में अइसन होला का?”
लभेरन बोलले- जी काकी! एहिजा ‘पाँड़े’ खाली जातिसूचक शब्द नइखे, ई त बुद्धिजीवी, सलाहकार, रणनीतिकार भा उपदेशक के प्रतीक हटे। ई कहाउत खाली व्यक्तिगत विडंबना नइखे रहि गइल, ई इतिहास आ राजनीतियो खातिर बरियार व्यंग बन गइल बा। जे सभके बुद्धि देला, ऊहे आदिमी जब अपना प परेला त मात खा जाला। अब देखीं ना, इतिहास में अइसन ढेरे लोग भइल, जे दोसरा के सत्ता दियावल, बाकिर अंत में अपने पराजित भइल, ना त उपेक्षित भइल। स्वतंत्रता आंदोलन में कई गो वैचारिक नेता जन-आंदोलन खड़ा कइले, दोसरा के नेतृत्व दिहले, बाकिर अपने राजनीतिक सत्ता भा सफलता से वंचित रहि गइलन। वर्तमान में त अइसनो लउकता कि चुनावी रणनीतिकार साहेब दोसरा के त जिता देतारे, आ जब उनुकर आपन पाटी चुनाव लड़तिया त साफे हार जातिया।
काकी कहली- ठीके कहतारऽ। संगठन बनावेवाला लोग अंत में संगठने से बाहर कइ दियाले। बाकिर एकर कारन का बा?
लभेरन कहले- एकरा पाछा मानव का सुभाव के गहिराह साँच छिपल बा- “दोसरा के समस्या समुझल आसान बा आ आपन समस्या समुझल कठिन।” कवनो व्यक्ति दोसरा के त निष्पक्ष सलाह दे सकत बा, बाकिर जब आपन बारी आवेला त ऊ भावुक भा अहंकारी हो जाला, ना त ओकरा भुलवना लागि जाला।” काकी संतोष के एगो साँस लिहली।
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


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