Category: भाषा

‘प्रेम-कविता’ पर केन्द्रित पाती के अंक

कुछ साथी-सहयोगियन का सुझाव / निहोरा पर जब ‘प्रेम’ पर केन्द्रित कविता पर अंक के बिचार बनल त हम जल्दी-जल्दी भोजपुरी कवियन से संपर्क सधनी. ओइसे त प्रतिक्रिया उछाहे भरल रहे, बाकिर कुछेक भाई लोग अइसनो मिलल, जे या त लजइला लेखा या अजीब...

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बतकुच्चन १५२

फगुआ के दिन नियराइल बा आ साथे साथ चुनावो के दिन नियराइल जात बा. वइसे त नेता हरमेसा से मुँहफट बेलगाम होत आइल बाड़ें बाकिर अबकी का चुनाव में एह बेलगामो प कवनो लगाम लागत नइखे लउकत. सभे अपना विरोधियन के लेवारे में लागल बा. त हमहू...

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नियर आ नियरा के चरचा (बतकुच्चन १५१)

बड़ बूढ़ लोग गलत नइखे कहि गइल कि नियरा के बारात देरी से लागेला. काहे कि अदबद के कुछ ना कुछ अइसन हो जाला कि सगरी इंतजाम आ सोचावट धइले रहि जाला आ काम बिगड़े का कगार प आ जाले. खास क के तब जब पीर बवर्ची भिश्ती खर सभके काम एके आदमी के...

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पत से पतुरिया के चरचा (बतकुच्चन १५०)

बसंत ऋतु से पहिले पतझर आवेला. पुरान पतई झर जाली सँ आ नया नया पतई निकले लागेला त कहल जाला कि बसंत आ गइल. बाकिर आजु ऋतु का बारे में ना बतिया के हमरा पत से पतुरिया के चरचा ले अपना के बन्हले राखे के बा. काहे कि पिछला दू बेर से पत से...

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माङ आ आङन के ङ (बतकुच्चन – १४९)

अब रउरा पतियाईं चाहे मत बाकिर संजोग कुछ अइसन बन जात बा कि पत से पतुरिया के चरचा फेरू पाछा छूटल जात बा. काल्हुए एगो लिखनिहार से बात होखत रहे त उ बात उठा दिहलन ङ के. हिन्दी में ङ के इस्तेमाल खोजले ना भेटाईं. संस्कृत में एकर...

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