श्रेणी: भाषा

आफत बिपत के चरचा (बतकुच्चन ‍- ११७)

पिछला दस दिन से बस एकही चरचा चलत बा देश भर में आ उ चरचा बा आफत बिपत के. आपदा बिपदा से निकलल शब्द आफत बिपत कुछ लोग संगे विशेषणो का रूप में इस्तेमाल होखेला. जइसे कि आजुकाल्हु एगो नेता के नाम बाकी गोल वाला नेता आ पोसुआ मीडिया ला...

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भोजपुरी सोगहगे बिला मत जाव (बतकुच्चन – ११६)

हालही मे एगो विद्वान लेखक के पढ़त रहनी. उनुका लेख में सोगहग के चरचा आइल त उहाँ के लिखले बानी कि शायद सोगहग के जनम संस्कृत के सयुगभाग से भइल जवना के मतलब होला दुनु हिस्सा समेत पूरा. बाकिर हमार बतकुचनी सुभाव के एहसे तोस ना मिलल आ...

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बुरा जो देखन मैं चला मुझ से बुरा न कोय!

भोजपुरी पंचायत के जुलाई २०१३ के अंक सामने बा आ ओकरा के पढ़त घरी प्रभाकर पाण्डेय के लिखल व्यंग्य रचना के एगो लाइन पर आँख अटक के रहि गइल कि “बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा ना कोय”. फेर याद आ गइल कहीं पढ़ल एगो चरचा. ओह...

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बतकुच्चन – ११५

पिछला कई दिन से अलग अलग गोल आपन आपन गोलबन्दी करावे में लागल बाड़ी सँ. कहीं कवनो गोल के गुल्ला छटक जात बा त कहीं बरिसन से राजनीति का गुल्लक में डालल मेहनत पानी में जात लउकत बा. त हमहुं सोचनी कि काहे ना अबकि गोल, गोली, गोला,...

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आ दुर्रऽऽऽ, हमरा कवन काम बा केहु से कहला के? (बतकुच्चन – ११४)

आ दुर्रऽऽऽ, हमरा कवन काम बा केहु से कहला के? हर गाँव में अइसनका एगो फुआ भा काकी जरूर मिल जइहें जिनकर कामे होला एने के बात ओने चहुँपावल आ गाँव भर के चुहानी घूमल. राजनीति आ मीडियो में अइसनका लोग के कमी ना मिले. ई लोग जवन बात कहे...

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