Category: भाषा

पत से पतुरिया के चरचा (बतकुच्चन १५०)

बसंत ऋतु से पहिले पतझर आवेला. पुरान पतई झर जाली सँ आ नया नया पतई निकले लागेला त कहल जाला कि बसंत आ गइल. बाकिर आजु ऋतु का बारे में ना बतिया के हमरा पत से पतुरिया के चरचा ले अपना के बन्हले राखे के बा. काहे कि पिछला दू बेर से पत से...

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माङ आ आङन के ङ (बतकुच्चन – १४९)

अब रउरा पतियाईं चाहे मत बाकिर संजोग कुछ अइसन बन जात बा कि पत से पतुरिया के चरचा फेरू पाछा छूटल जात बा. काल्हुए एगो लिखनिहार से बात होखत रहे त उ बात उठा दिहलन ङ के. हिन्दी में ङ के इस्तेमाल खोजले ना भेटाईं. संस्कृत में एकर...

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चोलिया प जयहिन्द लिखवली (बतकुच्चन – १४८)

रजवा के बेटिया भइली कंगरेसिया हो रामा, चोलिया पर. चोलिया पर जय हिन्द लिखवली हो रामा चोलिया पर. जानत बानी कि फगुआ के मौसम ह आ ई गीत चइता के ह. बाकिर माहौल कुछ अइसने बन गइल बा आ चरचा में दू गो अइसन मॉडल आ गइल बाड़ी जे अपना अपना...

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गलत आ कि गलती से (बतकुच्चन – १३२)

चुनाव कपारे पर बा आ नेता लोग परेशान हो चलल बा. कबो कुछ गलत बात कह देत बा त कबो गलती से कुछ बात निकल जात बा. आ सोचब त रउरो मान जाएब कि गलत बात कहल आ गलती से कवनो बात कह दीहल दुनु अलग अलग बात होला. हमरा बतकुच्चन में कुछ बात कबो...

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भाखा आ भाखल (बतकुच्चन – १३१)

भाषा के केहू भासा बोलेला त केहू भाखा. ष के उच्चारण आम बोलचाल में ख हो जाला. लिखे में भोजपुरी मे त भासा के इस्तेमाल खूबे होला. खैर आजु हम भासा का फेर में नइखीं. हम त आज भाखा आ कुभाखा का फेर में बानी. ई भाखा भाषा वाली भाखा ना होके...

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