श्रेणी: कविता

पलायन

– संतोष कुमार पटेल बाढ़, सुखाढ़ आ रोटी अजीब रिश्ता बा इनके जवन खरका देलख खरई खरई जिये के विश्वास साथे रहे के आस धकेल देलस दउरत रेल के डिब्बा में जहवां न बइठे क जगहे न साँस लेवे के साँस ऊँघत जागत दू दू रात के आँखिन में काटत...

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एगो मजदूर के दरद

– प्रभाकर पाण्डेय ‘गोपालपुरिया’ नून-तेल-भात कबो, कबो दलिपिठवा, कबो-कबो खाईं हम भुँजा अउरी मिठवा, कबो लिट्टी-चोखा त कबो रोटी-चटनी, कई-कई राति हम बिना खइले कटनी. कबो मिलि जाव एक मुठी सतुआ, कबो-कबो खिचड़ी खिया दे...

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एन जी ओ

– संतोष कुमार पटेल शब्द्कोश के नया शब्द समाज के स्वस्थ/शिक्षित/परिष्कृत बनावे के साधन/प्रसाधन जे कह ल जवन कह ल बड़ा व्यापक बा ई शब्द जेकर अर्थ भले समझ गइल बिया सरकार बाकिर एकर मरम समुझे खातिर धोवे के पड़ी आंखिन से शरम काहे...

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कलयुगी मेहरारु

– संतोष कुमार पटेल अब सीता सावित्री लक्ष्मी पार्वती जइसन नाम आउटडेटेड हो रहल बा काहे की अब लोग अपना आंख के पानी अपने धो रहल बा. लाज ओइसही बिलाइल जाता जईसे गरम तावा पर पानी के एगो बूंद रेगिस्तान में घडी भर के वरखा अब आँखिन...

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आपन हो जाई अनजान

– नूरैन अंसारी आज जवन नया बा ऊ काल्हुवे पुरान हो जाई. ढेर चुप रहबऽ त आपनो अनजान हो जाई. जले एक में चलत बा घर, चलावत रहऽ, पता ना कब केकरा से दूर ईमान हो जाई. मत करऽ गुमान एतना तू अपना कोठी पर, एक दिन निवास तहरो शमसान हो...

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