सूई साहु के चभाका

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

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सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-37

आइल भोजपुरिया चिट्ठी

सूई साहु के चभाका

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लभेरन आजु जब काकी किहें पहुँचले त ओहिजा उनुका किरपिन परोसिया पर चर्चा छिड़ल रहे। काकी बतावत रहली कि कइसे ऊ निनानबे में एक जोरिके नमरी बनावे खातिर परोस में केहूँ का घर से नीमक माङि लीहें आ लोगन का घरे जाके उनुका पलानी पर भा छान्ही पर से लउका, नेनुँआ, सतपुतिया, कोंहड़ा तुरवा लीहें। सहिजन का दिन में त उनुका सुतारे हो जाई, ई तरकारी बाँटिए के खाए के हटे। काकी लभेरन से कहली कि लइकन खातिर एगो कंजूस के कहनी सुनावऽ। लभेरन कहनी कहे शुरू कइले।

एगो सूई साहु रहलन। गाँव-जवार में किरपिनाही खातिर प्रसिद्ध रहन। जब कवनो परोजन में भात का बाद दाल चली त पीछा-पीछा घीव चलावे खातिर सूई साहु खोजात रहन। ऊ घीव में सूई डुबाइ के दाल प छिरकत चलिहें आ अतने से खियावे आला के संतोष हो जाई कि कुछ बरबाद ना भइल। सूई साहु के गुजरला का बाद उनुकर बेटा गद्दी सम्हरले। कहल जाला कि ऊ पाँत में घीव सूई से ना चलावत रहन, बलुक सभका सामने घीव के बन्न शीशी हिला देत रहन। एक बार एक आदमी बोलल कि घिउआ तनी देबो करीं, त ऊ कहले रहन कि पहिले वाला जमाना गइल, अब सूई साहु के चभाका ना मिली।

अतने में काकी के बड़का नतिया बोललसि कि कवनो कंजूस मक्खीचूसो से बड़ होला का? तब लभेरन कहले कि बिलकुल। किरपिन त ऊ हटे, जेकरा पइसा खर्च करे में रोआई छूटेला बाकिर एगो ‘सोम’ होला, जेकरा भीरी सब कुछ होला तबो ओकरा किहाँ दलिदरे समाइल रहेला। हमरा टोला में एगो पुरनिया रहन जे कवनो परबो-तेवहार प पुड़ी-पुआ ना खासु। उनुकर बनिहार आ नोकर-चाकर तक पुड़ी-पुआ खूब घिंचिहें सन बाकिर ऊ अपने दोहथी खइहें। कहिहें कि ना बँचाइबि त धन बिला जाई।

जे किरपिन होला ऊ अपना सुख-सुविधा पर त खरच करबे करेला बाकिर जब दोसरा प खरच करे के बारी आवेला भा दोसरा के दान देबे के होला त पीछे घसकि जाला। जे सोम होला ऊ अपनो प खरच ना करेला। ऊ धनपति कुबेर हो जाई तबो भिखारिए नियन लउकी। ऊ धन के भोग ना करेला, खाली बार-बार देखिके खुश होला आ एही खातिर पाई-पाई जोरत रहेला।

तब काकी के छोटका नतिया नधिया गइल कि अंकल, सोम अउर सोमी के कहानी सुनाईंं ना! लभेरन सुनावे शुरू कइले।

बहुत पहिले के बात हटे। एगो गाँव में एगो ‘सोम’ रहत रहे। ऊ अतना किरपिन रहे कि रात के दीओ ना जरावत रहे, काहेंसे कि तेल खतम हो जाइत। ओकर बियाह एगो अइसना मेहरारू से भइल, जे किरपिनाही में ओकरा से दू हाथ आगे रहे, माने बिछलहरुआ प ठढ़कुआ। एहसे लोग ओकर नाँव ‘सोमी’ ध दिहले। एक दिन सोम के मन भइल कि कुछ मीठा खाइल जाउ। ऊ गुर ले आवे खातिर बजार चलल। रस्ता में ओकरा याद आइल कि एहसे त पइसा खरच हो जाई। ऊ अधरस्ते से घरे लवटि आइल। ऊ सोमी से कहलसि कि आजु मन त कुछ मीठा खाए के रहल हा बाकिर पइसा बँचावे खातिर हम गुर ना किननी हा। सोमी बोललसि- “रउआँ त खाली पइसे बँचवलीं हा, हम त रउरा याद में खूब रोवलीं हा बाकिर एको बून लोर ना गिरे दिहलीं हा, ना त पियास लागि जाइत आ पानियो खरच करे के परित।”

अब तक बड़को नतिया के सवाद लागि गइल रहे। ऊ पुछलसि- फेर अंकल! लभेरन आगे बढ़ले।

एक बार सोम के धोती फाटि गइल। ऊ सोमी से कहलसि कि तनी सुई-डोरा ले आवऽ आ सी द। सोमी मूँड़ी हिलवलसि, “ना बाबा ना! सुई में डोरा डलला से सुई खिआ जाई आ डोरवो घटि जाई। एहसे नीमन त ईहे बा कि रउआँ धोती के फटलका जगहिया के हाथ से पकड़ि के चलीं। अतना पर त सोम अपना मेहरारू का समझदारी पर अतना ना खुश भइल कि अब छाती उतान कइके चले लागल।

अतना सुनिके दूनो नतिया ताली पीटि-पीटि के जोर-जोर से हँसे लगले सन। तब काकी कहली कि अब हम सुनावऽतानी सोम-सोमी पर एगो कविता। सब केहूँ काकी के मुँह एकटक देखे लागल। काकी सुनवली-
सोमी बोले सोम से, काहें मनवा मलीन।
की कछु गाँठ से गिरत है, की काहू कछु दीन।।
ना कछु गाँठ से गिरत है, ना काहू कछु दीन।।
देखलीं दीहत आन के, एहिसे मनवा मलीन।।

छोटका नतिया कहलसि कि एकर माने का भईल? काकी अरथ बतावे लगली।

सोमी अपना मरद सोम से पुछलसि कि आजु तोहार मन मधिमाइल काहें बा? का तोहरा चेट से कहीं पइसा-रुपया गिरि गइल हा आ कि केहूँ के कुछ पइसा दे देलऽ हा? तब सोम जबाब दिहले कि ना हमरा चेट से कहीं पइसा-रुपया गिरल हा आ नूँ हम केहूँ के कुछ पइसा देलीं हा। हम त एक आदमी के देखलीं हा कि ऊ दोसरा के कुछ रुपया देत रहल हा। ई देखला का बादे से हमार मन उदास बा। अतना पर त नतियन का सङे-सङे लभेरनो हँसे लगले- कहीं भला, धरती पर अइसनो अइसन आदमी होखेले!


संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030

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