देखते हैं भोजपुरी में क्या होता है?
- ओमप्रकाश सिंह

देखते हैं भोजपुरी में क्या होता है?

हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार दयानन्द पाण्डेय जी केहू के परिचय के मुहताज नइखीं। ई अंजोरिया के सौभाग्य बा कि पाण्डेयजी के लिखल दूगो उपन्यासन के भोजपुरी अनुवाद करे आ ओकरा के अंजोरिया पर अंजोर करे के मौका मिलल। लोककवि अब गाते नहीं के भोजपुरी अनुवाद त कुछ बरीस पहिलहीं छप गइल रहुवे बाकिर बांसगांव के मुनमुन के भोजपुरी अनुवाद किताब का रूप में रउरा सभे का सोझा आवे में कई बरीस लाग गइल त ओकर कारण हमार खराब स्वास्थ्य आ बुढ़ापा के असकत रहल। बाकिर अब ई किताब का रूप में रउरा सभे का सोझा आ रहल बा त एकरा के आपन भरपूर आशीर्वाद दीं सभे।

बांसगांव के मुनमुन के भोजपुरी अनुवाद के किताब का रूप में छपे का मौका पर दयानन्द पाण्डेय जी अपना फेसबुक वाल पर लिखले बानी –

बांसगांव की मुनमुन मेरा बहुत मशहूर उपन्यास है l स्त्री विमर्श पर इस उपन्यास का भोजपुरी अनुवाद अब छपने जा रहा है l अनुवाद किया है डाक्टर ओमप्रकाश सिंह ने l ज़िक्र ज़रूरी है कि डाक्टर ओमप्रकाश सिंह ने बांसगांव की मुनमुन का भोजपुरी अनुवाद अंजोरिया डाट काम पर धारावाहिक रूप में प्रकाशित किया है l आज अभी इस का कवर मिला तो आप आदरणीय मित्रों से साझा कर रहा हूं l भोजपुरी प्रकाशन, दिल्ली इसे प्रकाशित कर रहा है l
भोजपुरी प्रकाशन , सर्व भाषा ट्रस्ट का सहयोगी प्रकाशन है l बहुत आभार केशव मोहन पांडेय जी l भोजपुरी हमारी मातृभाषा है l इस लिए भी बहुत खुशी हो रही है l डाक्टर ओमप्रकाश सिंह ने हमारे एक और प्रसिद्ध उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं का भी अनुवाद किया है l अंजोरिया पर यह भी धारावाहिक रूप से छपा है l डायमंड बुक्स ने लोक कवि अब गाते नहीं का भोजपुरी अनुवाद तीन बरस पहले प्रकाशित किया था l
डेढ़ दशक पहले प्रकाशित बांसगांव की मुनमुन का डंका हिंदी में बहुत बजा है l अनगिन संस्करण छपे हैं l देखते हैं भोजपुरी में क्या होता है l इस लिए भी कि लोक कवि अब गाते नहीं की ही तरह बांसगांव की मुनमुन भी भोजपुरी अंचल की कथा है l भोजपुरी ही ओढ़ती बिछाती है बांसगांव की मुनमुन l भोजपुरी स्त्री के संघर्ष को ही रेखांकित करती हुई गाती मिलती है , बांसगांव की मुनमुन l न्यायाधीश, प्रशासनिक अधिकारी जैसे बड़े-बड़े पदों पर आसीन भाइयों की बहन , एक वकील की बेटी, एक गांव से निकल कर बांसगांव जैसे क़स्बे में पारिवारिक संघर्ष में पस्त एक शिक्षा मित्र कैसे प्रशासनिक पद पर पहुंचती है और फिर एक नए संघर्ष से जूझती है , बांसगांव की मुनमुन की कथा यही भर नहीं है l स्त्री संघर्ष की एक विराट महागाथा है l
कवर कैसा बना है , जानने की उत्सुकता है l

पिछलका उपन्यास लोककवि अब गाते नहीं के ई सवाल कि केने बिया पिंकिया भोजपुरी समाज के झकझोरे वाला सवाल होखे के चाहत रहुवे। बाकिर हमरा अइसने बुझाइल कि एकर जइसन स्वागत होखे के चाहत रहल तइसन भइल ना। अब बांसगाँव के मुनमुन के भोजपुरी अनुवाद किताब रूप में छपे जाए का मौका पर पाण्डेय जी के सवाल एकदम उचित बा कि – ‘बांसगांव की मुनमुन का डंका हिंदी में बहुत बजा है l अनगिन संस्करण छपे हैं l देखते हैं भोजपुरी में क्या होता है l” राउर का राय बा ?

कवर बहुते खूबसूरत बनल बा।

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