खेती खातिर बहुत जरूरी होला ‘मृगडाह’
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

आइल भोजपुरिया चिट्ठी

खेती खातिर बहुत जरूरी होला ‘मृगडाह’

लइका गरमी से ऊबि गइल रहन स। साँझि खा खेले जाए के भी ना मिलत रहे। छोटका के त मए देंहि में अम्हौरी हो गइल रहे। ओकरा दिन भर उघारहीं रहे के मन करत रहे। देंहि चुनचुनात रहे। काकी कहली कि अतने में परेशान हो गइलऽ लोग, अभी अउर भयंकर गरमी आई। बड़का नतिया टोकलसि- “दादी, आप नौतपा की बात कर रही है?” दादी बतवली- “ना, नौतपा त तबे चढ़ि जाला, जब सूर्य रोहिनी नक्षत्र में प्रवेश करेले। एकरो से अधिका गरमी बढ़ेले मृगडाह में।”

अब छोटका नतिया के मुँह खुलल- “मृगडाह क्या होता है दादी?”

दादी कहली कि मृगडाह में सबसे अधिका गरमी पड़ेला। अब एहसे अधिका जानकारी लभेरने अंकल दीहें। उनुके से विस्तार में सुनऽ लोग।” अतना सुनते लभेरन चौकी पर पालथी मारिके बइठि गइले आ उनुकर सीमित श्रोता समाज शांत भाव से उनुका ओरि मुँह कइके सुने खातिर तेयार हो गइल। लभेरन बोले शुरू कइले।

‘मृगडाह’ शब्द सुनिए के भीषण गर्मी के बोध होखे लागेला। लोक-ज्योतिष अउर कृषि-परंपरा में मृगडाह का तपन के बरखा आ खेती खातिर बहुते शुभ आ जरूरी मानल गइल बा। मृगशिरा नक्षत्र में जब सूर्य के प्रवेश होला, तब मौसम के तापमान भयंकर रूप धारण कइ लेला। कहल जाला कि एह घरी घाम में अतना गरमी होला कि खरउरिया नाचे लागेला। मिरिगा के बुझाला कि सामने पानी बा, ऊ दउरत-कूदत आगे बढ़ल जाला पानी का लोभ में बाकिर ओकर झुराइल कंठ अउर झुराते जाला, पानी ना भेंटाला ओकरा। एही भ्रम के नाँव मृगतृष्णा हटे। पियासल मिरिगा पानी खातिर छछनत एह पख में डहा जाला, एही से एकरा के मृगडाह कहल जाला। ईहो कहल जा सकत बा कि ‘मृगडाह’ मृग आ दाह- दू सबदन के समस्त रूप हटे। एकर माने ई भइल कि जवन गरमी मिरिगो के अपना दाह से झुलसा दे, ओकरे के मृगडाह कहल जाला। घाघ आ भड्डरी एह नक्षत्र के बहुत चर्चा कइले बाड़न।

आजु-काल्हु त तनिके गरमी में लोग छपिटाए लागतारन आ भगवान से मनावे लागतारन कि जलदी बरखा होखो। जो तनिका बरखा हो गइल त खुश हो जातरे, बाकिर ई नइखे बुझात कि ओकर केतना खराब असर हमनी का खेती पर परी। घाघ लिखत बाड़न-
जेठ मास जो तपै निरासा,
तौ जानो बरखा की आसा।

माने जो जेठ में खूब तेज गरमी परे लागे त नीमन बरखा के उमेदि कइल जाए के चाहीं।

घाघ त अतना कहले बाड़न कि
रोहिनी बरसे, मृग तपे, कछु दिन अदरा जाय।
कहे घाघ सुनु घाघिनी, स्वान भात नहिं खाय।।
माने रोहिणी में बरखा होखे, मृगशिरा में तेज गरमी पड़े आ अइसहीं अदरो में कुछ दिन निकल जाय, त बुझिहऽ कि धान के उपज एतना नीमन होई कि कुकुरो भात खात-खात ऊबि जाई।

भारतीय कृषि लोक में ई मान्यता बा कि जेठ आ मृगशिरा के बरियार गरमी धरती के पकावेले, तबे जाके बादल आकर्षित होखेलन स आ तबे जमिके बरखा होला आ धान के खूब उपज होला। ई मौसम के स्वाभाविक क्रम हटे। लोक के जवन अनुभव बा, ओहिजा गरमी आ बरखा में कवनो विरोध नइखे, केहूँ खराब नइखे, दूनो के आपन अलग-अलग जगह बा। ई दूनो अपना संतुलित प्रभाव में लोक के रक्षा करेला।

लोगन के त ईहो मान्यता बा कि मृगडाह का भयंकर गरमी से खेती के नुकसान पहुँचावेवाला जतना कीड़ा होले सन, ऊ मरि जाले सन। एही से जब ओकरा बाद झमझम बरखा होला त निमनाह उपज होले।

घाघ त खुलेआम कहतारे कि जो मृगशिरा अपना पूरा सुभाव में रहिके धरती के तपा दे, त फेरु आवे वाली फसल के केहूँ रोकिए नइखे सकत।
तपे मृगसिरा जेठ मँझारी, सावन भादो बरसे भारी।
कहै घाघ सुनु घाघिनि रोय, अन्न न खाए कतहूँ कोय।।
माने जेठ का महीना में जब मृगशिरा नक्षत्र खूब तपेला, त सावन आ भादो का महीना में झमाझम बरखा होला। घाघ अपना मेहरारू घाघिनि से कहतारन कि अइसना में केहूँ के अन्न के रोना ना रोवे के परेला, सभके मन हरियरे लउकेला।

घाघ के कहनाम बा कि अतने ना, मृगशिरा के घाम का सङे-सङे ओह घरी चले वाली हवा के दिसो आगे के खेती सुनिश्चित करेले। जो जेठ का महीना में मृगशिरा नक्षत्र खूब तपत होखे आ हवा पुरुआ ना होके पछिआ चलत होखे, त बूझि लीहऽ कि मानसून एकदम समय पर आई आ बरियार आई।
तपै मृगसिरा जेठ के माँहीं, पवन चलै पर पूरब नाहीं।
कहै घाघ बरखा की आसा, दूरि करहु मन को बिस्बासा।।

कृषि विज्ञान खातिर मृगडाह कतना जरूरी बा, एकरा जानकारी खातिर घाघ के हई सूत्र जबरदस्त बाटे। मृगशिरा का तपला आ अदरा का गलला के ई संतुलित रूप अद्भुत बाटे-
तपै मृगसिरा अदरा गलै, तब खेती के थम्हा चलै।
माने जब मृगशिरा तपी आ अदरा बरसी, तबे खेती के खंभा मजबूत होई, माने धान के नेंव परी।

बड़का नतिया बोललसि- “अंकल, इसके बाद कौन नक्षत्र आएगा?”

लभेरन बतवले- “अदरा आई। एहमें पानियो परेला।” अब जाके लइकन का जान में जान आइल।

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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030

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